​वैशाली में रूढ़ियों की अर्थी: पांच बेटियों ने पिता को दिया कंधा, समाज की उस सोच को दिखाया आईना जिसमें बेटों को माना जाता है मोक्ष का द्वार

वैशाली। बिहार के वैशाली जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने सदियों पुरानी उस सामाजिक जकड़न को झकझोर कर रख दिया है, जहाँ माना जाता है कि पिता की अंतिम यात्रा को केवल बेटा ही सहारा दे सकता है। वैशाली थाना क्षेत्र के नया टोला गांव में जब पांच बहनों ने एक साथ अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया, तो श्मशान की ओर बढ़ते उन कदमों ने केवल एक शव को गंतव्य तक नहीं पहुँचाया, बल्कि उस रूढ़िवादी धारणा का भी अंतिम संस्कार कर दिया जो बेटियों को बेटों से कमतर आंकती है। 79 वर्षीय तारणि प्रसाद सिंह के निधन के बाद उनके आंगन में जो दृश्य दिखा, उसने वहां मौजूद हर चश्मदीद की आंखों को नम कर दिया। यह घटना अब केवल एक परिवार के निजी दुख की कहानी नहीं रही, बल्कि पूरे वैशाली और आसपास के इलाकों में चर्चा का एक ऐसा विषय बन गई है जो समाज को अपनी सोच बदलने के लिए विवश कर रही है।

जब परंपरा और प्रेम के बीच खड़ा हुआ असमंजस

​नया टोला के रहने वाले तारणि प्रसाद सिंह का निधन लंबी उम्र के पड़ाव पर पहुँचने के बाद हुआ। उनके पीछे उनकी 75 वर्षीया पत्नी ललिता देवी और पांच बेटियां—पूनम सिंह, नीलम सिंह, माधुरी, माला और चांदनी का भरा-पूरा संसार है। तारणि सिंह ने अपने जीवनकाल में अपनी पांचों बेटियों को न केवल उच्च शिक्षा दिलाई, बल्कि उन्हें इस काबिल बनाया कि वे समाज के हर क्षेत्र में सिर उठाकर जी सकें। उन्होंने कभी भी बेटे की चाहत में अपनी बेटियों के अधिकार और उनके स्नेह को कम नहीं होने दिया।

​हालांकि, जब उनकी मृत्यु हुई, तो गांव और परिवार के कुछ हलकों में इस बात को लेकर एक मौन असमंजस की स्थिति बन गई कि अंतिम संस्कार की रस्मों को कौन निभाएगा। हिंदू समाज में यह मान्यता अत्यंत गहरी है कि पिता के शव को कंधा देना और मुखाग्नि देना पुत्र का ही अधिकार और कर्तव्य है। पुत्र न होने की स्थिति में अक्सर दूर के रिश्तेदारों या पट्टीदारों को बुलाया जाता है। नया टोला में भी कुछ पलों के लिए यह सवाल हवा में तैरने लगा था, लेकिन तारणि सिंह की बेटियों ने इस असमंजस को पल भर में समाप्त कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि जिस पिता ने उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, उनके अंतिम विदाई के हकदार उनसे बड़ा कोई और नहीं हो सकता।

श्मशान की राह पर साहस का सफर

​जैसे ही तारणि प्रसाद सिंह की अंतिम यात्रा शुरू हुई, वहां मौजूद लोग तब दंग रह गए जब पूनम, नीलम, माधुरी, माला और चांदनी ने अर्थी के चारों कोनों को अपने कंधों पर उठा लिया। श्मशान घाट की ओर बढ़ते हुए इन पांचों बहनों के चेहरों पर पिता को खोने का गहरा गम तो था, लेकिन साथ ही एक संकल्प की दृढ़ता भी थी। गांव की गलियों से गुजरते हुए इस दृश्य ने रूढ़ियों की उस दीवार को ढहा दिया जिसे ढहाने के लिए अक्सर बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं।

​कंधा देने के दौरान बेटियों की आंखों से आंसू तो गिर रहे थे, लेकिन उनके पैर नहीं डगमगाए। उन्होंने समाज की उस धारणा को खुली चुनौती दी जिसमें लड़कियों को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर समझा जाता है। यह दृश्य देखकर गांव के बुजुर्ग और युवा सभी स्तब्ध थे। सालों से चली आ रही रस्मों के बीच यह एक ऐसा क्रांतिकारी मोड़ था, जिसने यह साबित किया कि कर्तव्य निभाने के लिए जेंडर नहीं, बल्कि जज्बा और फर्ज की भावना मायने रखती है। श्मशान तक का वह सफर वैशाली की मिट्टी में एक नई परंपरा के बीज बो रहा था।

बेटियां भी बेटों से कम नहीं: माधुरी की हुंकार

​इस पूरे घटनाक्रम के बाद मृतक की पुत्री माधुरी ने जो बातें कहीं, वे समाज के लिए किसी घोषणापत्र से कम नहीं हैं। माधुरी का कहना है कि लोग लड़कियों को अक्सर कमजोर और बोझ समझते हैं। समाज में आज भी लड़कों को ज्यादा महत्व दिया जाता है और यह माना जाता है कि दुनिया केवल बेटों से ही चलती है। लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि जिस बेटे को वे इतना महत्व दे रहे हैं, उसे जन्म देने वाली भी एक औरत ही होती है।

​माधुरी ने धार्मिक संदर्भों का उदाहरण देते हुए कहा कि जब एक औरत भगवान राम को जन्म दे सकती है, तो वह अपने पिता की अर्थी को कंधा क्यों नहीं दे सकती? उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि उनके पिता ने पांचों बहनों को पढ़ाया-लिखाया और उनकी शादियां करवाकर अपना पिता धर्म पूरी ईमानदारी से निभाया। ऐसे में जब उनके पिता का अंतिम समय आया, तो एक संतान के रूप में अपना फर्ज निभाना उनकी जिम्मेदारी थी। उन्होंने समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि भेदभाव की यह दीवार गिरनी चाहिए क्योंकि लड़कियां अगर ठान लें, तो वे कुछ भी कर सकती हैं।

फर्ज और जज्बे की नई मिसाल

​नया टोला की इन पांचों बेटियों—पूनम, नीलम, माधुरी, माला और चांदनी—ने मिलकर जो संदेश दिया है, उसकी गूँज वैशाली थाना क्षेत्र के बाहर भी सुनाई दे रही है। समाज अक्सर लड़कियों की क्षमता पर संदेह करता है, लेकिन इन बहनों ने यह दिखा दिया कि संकट और दुख की घड़ी में वे किसी भी बेटे से कहीं अधिक मजबूती से खड़ी हो सकती हैं। पिता की अर्थी को कंधा देना उनके लिए केवल एक रस्म नहीं थी, बल्कि अपने पिता के प्रति उनके उस अगाध प्रेम और सम्मान का प्रकटीकरण था, जिसे उन्होंने वर्षों तक अपने भीतर संजोया था।

​ग्रामीणों का कहना है कि यह घटना लड़का और लड़की के बीच बढ़ते भेदभाव को कम करने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी। गांव के कई लोगों ने दबी जुबान में यह स्वीकार किया कि उन्होंने पहले कभी ऐसा साहस नहीं देखा था। यह दृश्य देखकर श्मशान में मौजूद हर शख्स भावुक था क्योंकि उन्होंने एक परंपरा को टूटते और एक नई मानवीय संवेदना को जन्म लेते देखा था। नया टोला की बेटियों ने यह साबित कर दिया कि मोक्ष का द्वार केवल बेटा ही नहीं खोलता, बल्कि वे बेटियां भी खोलती हैं जो अपने माता-पिता के अंतिम समय में उनके साथ चट्टान की तरह खड़ी रहती हैं।

रूढ़ियों पर प्रहार: एक सामाजिक संदेश

​वैशाली की यह घटना बिहार के उस बदलते सामाजिक परिदृश्य की ओर इशारा करती है जहाँ शिक्षा और जागरूकता अब वर्षों पुरानी बेड़ियों को तोड़ रही है। समाज में लड़के-लड़की के बीच का अंतर केवल जैविक नहीं, बल्कि मानसिक ज्यादा है। जब तक समाज यह नहीं समझेगा कि बेटियां भी उतनी ही सक्षम हैं जितने बेटे, तब तक समानता की बातें केवल कागजों तक सीमित रहेंगी। नया टोला की इन पांच बहनों ने बिना किसी हंगामे के, केवल अपने आचरण से यह बता दिया कि लड़कियां कभी कमजोर नहीं थीं, बस समाज ने उन्हें कमजोर समझने की भूल की थी।

​पूरे इलाके में इस बात की सराहना हो रही है कि कैसे इन पांचों बहनों ने रीति-रिवाजों का पालन करते हुए भी अपनी पहचान और अपने अधिकारों को सुरक्षित रखा। तारणि प्रसाद सिंह शायद दुनिया से चले गए, लेकिन उनकी बेटियों ने उनकी विदाई को जिस तरह से एक संदेश में बदल दिया, वह आने वाली कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा। वैशाली का यह नया टोला अब एक ऐसे बदलाव का गवाह बन गया है जिसकी गूँज लंबे समय तक सामाजिक चर्चाओं के केंद्र में रहेगी।

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