लद्दाख की बर्फीली चोटियों से नालंदा के आंगन तक… जेसीओ सुमन कुमार सिंह की आखिरी विदाई; 14 साल के मासूम ने दी मुखाग्नि, नारों से गूंजा मोकरमपुर

समाचार के मुख्य बिंदु: तिरंगे में लिपटकर लौटा गांव का गौरव

  • शहादत का शोक: नालंदा जिले के नूरसराय थाना क्षेत्र के मोकरमपुर मिर्चायगंज निवासी जेसीओ सुमन कुमार सिंह (45 वर्ष) का पार्थिव शरीर शुक्रवार रात उनके पैतृक गांव पहुँचा।
  • वीरगति की वजह: लद्दाख में ड्यूटी के दौरान 26 मार्च को भीषण हिमस्खलन (एवलांच) की चपेट में आने से उनकी तबीयत बिगड़ गई थी।
  • अंतिम संघर्ष: सेना के अस्पताल के बाद लखनऊ में करीब 27 मार्च को उन्होंने अंतिम सांस ली।
  • भावुक विदाई: 14 साल के बेटे अंश ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। इस दौरान पूरा इलाका ‘भारत माता की जय’ और ‘शहीद सुमन कुमार अमर रहें’ के नारों से गूंज उठा।
  • राजकीय सम्मान: अंतिम संस्कार में ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार शामिल हुए और जवान के बलिदान को नमन करते हुए सरकारी सहायता का आश्वासन दिया।
  • VOB इनसाइट: देश की सीमाओं पर तैनात जवान केवल दुश्मनों की गोलियों से ही नहीं, बल्कि प्रकृति की मार और गंभीर बीमारियों से भी देश के लिए लड़ते हैं। सुमन कुमार सिंह का जाना नालंदा के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

नालंदा | 29 मार्च, 2026

​नालंदा की माटी ने एक बार फिर अपने एक जांबाज सपूत को देश की अखंडता की वेदी पर न्योछावर कर दिया है। लद्दाख की हाड़ कंपा देने वाली ठंड और दुर्गम पहाड़ियों पर तिरंगे की आन बान शान की रक्षा करने वाले जेसीओ सुमन कुमार सिंह उर्फ पंकज अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी शहादत की खबर ने न केवल उनके पैतृक गांव मोकरमपुर मिर्चायगंज को गमगीन कर दिया है, बल्कि पूरे बिहार की आंखों को नम कर दिया है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़िए उस योद्धा की कहानी, जिसने अस्पताल के बिस्तर पर भी हार नहीं मानी, लेकिन अंततः नियति ने उसे हमसे छीन लिया।

लद्दाख का वह काला दिन: जब कुदरत ने ली परीक्षा

​नूरसराय थाना क्षेत्र के मोकरमपुर मिर्चायगंज निवासी सुरेंद्र सिंह के बड़े पुत्र सुमन कुमार सिंह लद्दाख में जेसीओ के पद पर तैनात थे। जानकारी के अनुसार, 26 मार्च को जब वे अपनी यूनिट के साथ ड्यूटी पर तैनात थे, तभी अचानक एक भीषण हिमस्खलन (एवलांच) हुआ। बर्फ के विशाल पहाड़ के नीचे सुमन कुमार सिंह दब गए। सेना के बचाव दल ने तत्काल रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया और कड़ी मशक्कत के बाद उन्हें बर्फ की परतों से बाहर निकाला।

​हालांकि, इस घटना ने उनके शरीर पर गहरा प्रभाव डाला। उन्हें तुरंत सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ से बेहतर इलाज के लिए उन्हें लखनऊ रेफर कर दिया गया। लखनऊ के अस्पताल में वे करीब एक महीने तक मौत से जंग लड़ते रहे। इस दौरान डॉक्टरों ने पाया कि वे ब्लड कैंसर और पीलिया जैसी जानलेवा बीमारियों की चपेट में आ चुके थे। तमाम कोशिशों के बावजूद, 27 मार्च को इस वीर योद्धा ने अपनी अंतिम सांस ली।

आधी रात को गूंजे नारे: “जब तक सूरज चांद रहेगा…”

​शुक्रवार की देर रात जब सेना के विशेष वाहन से सुमन कुमार सिंह का पार्थिव शरीर उनके गांव पहुँचा, तो रात का सन्नाटा ‘शहीद सुमन कुमार अमर रहें’ के नारों से टूट गया। गांव की सड़कों पर हजारों की भीड़ अपने नायक के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़ी थी। छतों से महिलाओं और बच्चों ने फूलों की बारिश की।

​सबसे हृदयविदारक दृश्य तब सामने आया जब सुमन कुमार सिंह की पत्नी अपने पति के पार्थिव शरीर से लिपटकर बिलख पड़ीं। उनके छोटे-छोटे बच्चे अपने पिता की शांत देह को एकटक निहारते रहे, मानो उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिस पिता के कंधे पर चढ़कर वे खेलते थे, वह अब तिरंगे में लिपटा हुआ है।

14 साल के बेटे का कलेजा और अंतिम विदाई

​शनिवार की सुबह सुमन कुमार सिंह की अंतिम यात्रा शुरू हुई। गांव के श्मशान घाट पर जनसैलाब उमड़ पड़ा था। सैन्य सम्मान के साथ उन्हें विदाई दी गई। इस दौरान माहौल तब और ज्यादा गमगीन हो गया जब उनके 14 वर्षीय पुत्र अंश ने कांपते हाथों से अपने पिता को मुखाग्नि दी。 एक किशोर बेटे द्वारा पिता को अंतिम विदाई देने का यह दृश्य देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं।

​अंतिम संस्कार के दौरान बिहार सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार भी मौजूद रहे। उन्होंने जवान को श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवार को ढांढस बंधाया। उन्होंने कहा कि सुमन कुमार सिंह का बलिदान नालंदा और देश हमेशा याद रखेगा। राज्य सरकार के नियमानुसार पीड़ित परिवार को हर संभव आर्थिक और अन्य सहायता प्रदान की जाएगी।

देश सेवा की गौरवशाली परंपरा

​सुमन कुमार सिंह का परिवार शुरू से ही देश सेवा के प्रति समर्पित रहा है। वे अपने दो भाइयों में बड़े थे और उनके छोटे भाई वर्तमान में सीआईएसएफ (CISF) में कार्यरत होकर देश की आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। सुमन अपने पीछे पत्नी, दो बेटियों और दो बेटों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी बड़ी बेटी इंटरमीडिएट की छात्रा है, जबकि छोटी बेटी मैट्रिक की परीक्षा की तैयारी कर रही है। पिता के जाने से घर का मुख्य स्तंभ ढह गया है, लेकिन उनके साहस की चर्चा आज हर ग्रामीण की जुबान पर है।

VOB का नजरिया: शहादत को नमन और व्यवस्था से सवाल

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि सीमाओं पर तैनात जवानों के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी और कठिन परिस्थितियों में काम करने के बाद उन्हें मिलने वाली चिकित्सा सुविधाएं और बेहतर होनी चाहिए।

  • बीमारी और ड्यूटी: एक महीने तक कैंसर जैसी बीमारी से जूझना और ड्यूटी के दौरान हिमस्खलन की चोट सहना, यह बताता है कि हमारे जवान शारीरिक और मानसिक रूप से कितने मजबूत होते हैं।
  • परिजनों की मांग: ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि शहीद के नाम पर गांव में कोई स्मारक या लाइब्रेरी बनाई जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान से प्रेरणा ले सकें।
  • त्वरित सहायता: मंत्री श्रवण कुमार का आश्वासन सराहनीय है, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी फाइलों के चक्कर में शहीद के बच्चों की शिक्षा और भविष्य प्रभावित न हो।

निष्कर्ष: नालंदा के माथे का तिलक बने सुमन

​जेसीओ सुमन कुमार सिंह अब शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी वीरता की गाथा नूरसराय के खेतों और नालंदा की हवाओं में हमेशा जीवित रहेगी। देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इस वीर सपूत को ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ परिवार अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

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