
भागलपुर, 4 अगस्त : श्रावण मास के अंतिम सोमवार को बाबा बासुकीनाथ धाम की ओर बढ़ते लाखों कांवड़ियों का उत्साह बारिश भी नहीं रोक सकी, लेकिन जिस शहर को ‘स्मार्ट सिटी’ का तमगा दिया गया है, वहां की जमीनी हकीकत ने श्रद्धालुओं को शर्मिंदा कर दिया। तेज बारिश के बीच गंगा जल लेकर निकले कांवड़ियों को नगर निगम की लापरवाही के चलते गंदगी भरे नालों से गुजरना पड़ा।
गंगा किनारे के विभिन्न घाटों—बरारी, आदमपुर, ललमटिया, और लोदीपुर से जल लेकर निकले श्रद्धालु बोल बम के जयघोष के साथ बाबा को जल चढ़ाने निकल पड़े। लेकिन उनकी राहें आसान नहीं थीं। बारिश से बेहाल सड़कों पर जगह-जगह जलजमाव, उफनती नालियाँ और कीचड़ ने प्रशासन की असलियत सामने ला दी।
श्रद्धा बनाम व्यवस्था की असली तस्वीर
बोल बम का उद्घोष करते हुए श्रद्धालु जहां बाबा की भक्ति में डूबे थे, वहीं उन्हें कूड़े-कचरे और बदबूदार नाले से होकर गुजरने को मजबूर कर दिया गया। कई स्थानों पर तो स्थिति ऐसी थी कि श्रद्धालुओं को घुटनों तक गंदे पानी में चलना पड़ा। स्वास्थ्य संकट की आशंका और फिसलन भरे रास्ते से गिरने की घटनाएं भी सामने आईं।
नगर निगम के दावों की खुली पोल
‘स्मार्ट सिटी’ भागलपुर में नगर निगम की व्यवस्थाएं इतनी ‘स्मार्ट’ हैं कि साल भर के इंतज़ार के बाद जब लाखों श्रद्धालु शहर की सड़कों पर निकलते हैं, तब नालों की सफाई और जल निकासी की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं होती। नतीजा—कांवड़ियों को श्रद्धा की डगर पर कीचड़ से सने रास्तों में उतरना पड़ा।
स्थानीय लोगों ने कहा कि हर साल यही होता है। पूजा-पर्व आते ही नगर निगम जागता है, दो दिन झाड़ू लगाकर फोटोग्राफी करवा लेता है और फिर लापरवाही की चादर ओढ़ लेता है। एक युवक ने नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा, “बाबा का नाम लेकर निकले हैं, वरना इस गंदगी में कोई नहीं चले।”
निगम मौन, श्रद्धा अडिग
शहर की तस्वीरें नगर निगम प्रशासन की उदासीनता को साफ बयां करती हैं। ना कोई कंट्रोल रूम से निगरानी, ना किसी सफाई कर्मी की तत्परता। गंदे नाले में डूबते श्रद्धालु, बिजली के पोलों में करंट का डर, और जगह-जगह पानी से भरी सड़कें। फिर भी लोगों का हौसला नहीं टूटा। “बाबा बुलाए हैं, तो रास्ता खुद बन जाएगा,”—यही भाव लेकर लाखों कदम बढ़ते रहे।
“स्मार्ट सिटी” का कड़वा सच
भागलपुर के ‘स्मार्ट सिटी’ बनने की परियोजनाएं करोड़ों खर्च कर रही हैं, लेकिन एक बार फिर सावन की भीड़ ने इन योजनाओं के कागजी होने की पोल खोल दी। डिजिटल बोर्डों और स्मार्ट पोल से ज़्यादा ज़रूरत नालों की सफाई और जल निकासी की थी—जो नदारद रही।
श्रद्धा की शक्ति एक बार फिर सरकारी लापरवाही पर भारी पड़ी, लेकिन कब तक? क्या हर साल भक्तों को गंदगी में भक्ति की परीक्षा देनी पड़ेगी? भागलपुर नगर निगम को चाहिए कि वो केवल टेंडर की फाइलों और प्रेस विज्ञप्तियों से बाहर निकलकर ज़मीनी हकीकत से भी रूबरू हो।


