
कोलकाता। भारतीय रेलवे की यात्रा में एक दौर वह था जब स्टेशन के प्लेटफार्म पर कदम रखते ही यात्रियों का स्वागत पटरियों से उठने वाली तीव्र दुर्गंध से होता था। वह दृश्य और गंध न केवल यात्रा के अनुभव को खराब करती थी, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगाती थी। लेकिन समय के साथ रेलवे ने अपनी तकनीक और दृष्टिकोण में व्यापक बदलाव किया है। पूर्व रेलवे ने इस दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित करते हुए यह गौरवशाली घोषणा की है कि उसने दिसंबर 2020 तक अपनी सभी एक्सप्रेस ट्रेनों में शत-प्रतिशत (100%) बायो-टॉयलेट स्थापित करने का लक्ष्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। यह उपलब्धि केवल एक तकनीकी अपग्रेड नहीं है, बल्कि करोड़ों यात्रियों के लिए स्वच्छता और सम्मान की एक नई परिभाषा है। इस बदलाव ने पटरियों के किनारे की पुरानी और दुखद सच्चाई को हमेशा के लिए पीछे छोड़ दिया है, जिससे अब यात्री प्लेटफार्मों पर ताजी हवा और स्वच्छ वातावरण का आनंद ले पा रहे हैं।
पारंपरिक शौचालयों की समस्या और बायो-टॉयलेट की जरूरत
बायो-टॉयलेट तकनीक के आने से पहले, भारतीय ट्रेनों में पारंपरिक शौचालयों का उपयोग होता था। इन शौचालयों की सबसे बड़ी खामी यह थी कि मानव अपशिष्ट सीधे पटरियों पर गिरता था। इसके परिणाम केवल स्टेशन की गंदगी तक सीमित नहीं थे। खुले में गिरने वाले इस कचरे के कारण रेलवे ट्रैक की स्टील की पटरियों में तेजी से जंग लगने की समस्या उत्पन्न होती थी। रासायनिक प्रतिक्रिया के कारण पटरियों की आयु कम हो जाती थी, जिससे उनके रखरखाव और बार-बार बदलने पर रेलवे को भारी-भरकम राशि खर्च करनी पड़ती थी। इसके अतिरिक्त, प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन के शौचालयों का उपयोग प्रतिबंधित था, जिससे यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता था। पूर्व रेलवे ने इन सभी चुनौतियों का समाधान ‘जैव-रूपांतरण’ के माध्यम से खोजा है।
कैसे काम करता है बायो-टॉयलेट: विज्ञान और तकनीक
इस हरित क्रांति के पीछे का मुख्य नायक वह छोटा सा टैंक है जो ट्रेन के कोच के नीचे लगा होता है। बायो-टॉयलेट की कार्यप्रणाली पूरी तरह से प्राकृतिक और वैज्ञानिक है। पारंपरिक टैंकों के विपरीत, इनमें बहु-कक्षीय (multi-chambered) टैंक होते हैं। इन टैंकों में विशेष प्रकार के ‘अवायवीय जीवाणुओं’ (Anaerobic Bacteria) का एक समूह मौजूद होता है।
जब अपशिष्ट टैंक के भीतर जाता है, तो ये बैक्टीरिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में प्राकृतिक किण्वन (fermentation) की प्रक्रिया शुरू करते हैं। यह जैविक प्रक्रिया मानव अपशिष्ट को पूरी तरह से विघटित कर देती है। इस प्रक्रिया के मुख्य उत्पाद निम्नलिखित हैं:
- गैस: अपशिष्ट का एक बड़ा हिस्सा मीथेन (CH_4) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) जैसी गैसों में बदल जाता है, जो वातावरण के लिए हानिरहित मानी जाती हैं।
- पानी: बचा हुआ ठोस हिस्सा तरल पानी में बदल जाता है।
- कीटाणुशोधन: बाहर छोड़ने से पहले इस पानी को क्लोरीनयुक्त (chlorinated) कर पूरी तरह से कीटाणुरहित बनाया जाता है।
अंततः, जो तरल बाहर निकलता है वह गंधहीन और स्वच्छ होता है, जिससे रेलवे पटरियां सूखी, साफ और स्वस्थ बनी रहती हैं।
नेतृत्व और क्रियान्वयन: पूर्व रेलवे का हरित रूपांतरण
इस विशाल परियोजना को धरातल पर उतारने में पूर्व रेलवे के नेतृत्व की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही है। महाप्रबंधक मिलिंद देऊस्कर के दूरदर्शी मार्गदर्शन में इस क्षेत्र का पूर्णतः “हरित रूपांतरण” संभव हो पाया है। मिलिंद देऊस्कर ने इस मिशन को स्वच्छ भारत अभियान के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का हिस्सा बताया है। उन्होंने रेखांकित किया कि 100% जैव-शौचालयों की व्यवस्था न केवल यात्रियों की सुविधा के लिए है, बल्कि यह पटरियों के लंबे जीवन और स्वच्छ स्टेशनों के लिए एक अनिवार्य कदम था।
इस तकनीकी बदलाव को हजारों कोचों में सुचारू रूप से लागू करने का श्रेय प्रधान मुख्य यांत्रिक इंजीनियर परमानंद शर्मा को जाता है। उनके निर्देशन में तकनीकी टीमों ने युद्धस्तर पर काम किया ताकि कोचों के संचालन में बाधा आए बिना इन प्रणालियों को स्थापित किया जा सके। विशेष बात यह है कि यह मिशन केवल यात्री कोचों तक सीमित नहीं रहा; पूर्व रेलवे ने रेल परिचालन के मुख्य स्तंभ यानी रेल कर्मचारियों का भी ध्यान रखा है। गार्ड कैब में भी 100% बायो-टॉयलेट स्थापित किए गए हैं, जिससे रेलवे कर्मचारियों को भी वही गरिमा और स्वच्छता प्राप्त हो सके जो यात्रियों को मिलती है।
यात्रियों के लिए नई सुविधा: स्टेशन पर उपयोग की स्वतंत्रता
पुरानी शौचालय प्रणाली की सबसे कष्टदायक पाबंदी यह थी कि ट्रेन के स्टेशन पर खड़े होने के दौरान शौचालय का उपयोग वर्जित था। इसका कारण यह था कि प्लेटफार्म पर कचरा न फैले। बायो-टॉयलेट ने इस पाबंदी को इतिहास बना दिया है। चूंकि यह प्रणाली पूरी तरह से स्व-नियंत्रित और पर्यावरण के अनुकूल है, इसलिए अब यात्री किसी भी समय, चाहे ट्रेन तेज रफ्तार में हो या प्लेटफार्म पर खड़ी हो, बिना किसी झिझक के शौचालय का उपयोग कर सकते हैं। यह सुविधा लाखों बुजुर्गों, बच्चों और बीमार यात्रियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
यात्रियों के लिए मार्गदर्शिका: क्या करें और क्या न करें
इस उन्नत जैविक प्रणाली को लंबे समय तक क्रियाशील बनाए रखने के लिए पूर्व रेलवे ने यात्रियों के सहयोग की अपील की है। बायो-टॉयलेट के टैंक में मौजूद जीवित बैक्टीरिया को काम करने के लिए एक अनुकूल वातावरण की आवश्यकता होती है। यात्रियों के लिए कुछ सरल नियम इस प्रकार हैं:
क्या अवश्य करें (Dos):
- प्रत्येक उपयोग के बाद फ्लश बटन का प्रयोग जरूर करें, क्योंकि पानी का प्रवाह बैक्टीरिया को सक्रिय रखने में मदद करता है।
- सूखे कचरे (जैसे रैपर या कागज) को शौचालय में उपलब्ध कूड़ेदान में ही डालें।
क्या न करें (Don’ts):
- प्लास्टिक की बोतलें या चाय के डिस्पोजेबल कप शौचालय में न फेंकें।
- नैपकिन, सैनिटरी पैड, सिगरेट के टुकड़े या गुटखा के रैपर टॉयलेट पैन में न डालें।
- ये वस्तुएं न केवल पाइपलाइन को जाम कर देती हैं, बल्कि टैंक के भीतर मौजूद उन उपयोगी बैक्टीरिया को भी नष्ट कर सकती हैं जो अपशिष्ट को गलाते हैं।
स्वच्छता की सामूहिक जीत: एक हरित भविष्य की ओर
मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शिबराम माझि ने इस उपलब्धि को रेलवे और जनता की सामूहिक जीत करार दिया है। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि यात्री जैसे ही प्लेटफार्म पर उतरें, उन्हें इस बदलाव का एहसास हो। पटरियों की सफाई और गंधमुक्त वातावरण अब पूर्व रेलवे की नई पहचान बन चुका है। शिबराम माझि ने सभी यात्रियों से इस स्वच्छता अभियान में भागीदार बनने का आह्वान किया है ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित और स्वच्छ परिवहन व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। पूर्व रेलवे ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक तकनीक और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर यात्रा का हर गंतव्य और हर पल उतना ही स्वच्छ हो सकता है जितना कि हमारा घर।


