पटना, 24 जुलाई 2025 — बिहार विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान आज प्रत्यायुक्त विधान समिति के सभापति ने कृषि विभाग से संबंधित दसवां एवं स्वास्थ्य विभाग से संबंधित ग्यारहवां प्रतिवेदन सदन में प्रस्तुत किया। दोनों प्रतिवेदनों में विभागीय कार्यप्रणाली में गंभीर खामियों की ओर इशारा किया गया है और जरूरी सुधारों के लिए स्पष्ट अनुशंसाएं दी गई हैं।
कृषि विभाग पर रिपोर्ट: परिसम्पत्तियों के प्रबंधन में लापरवाही
दसवें प्रतिवेदन में समिति ने स्पष्ट किया कि बिहार कृषि विपणन पर्षद को भंग किए जाने के 19 वर्षों बाद भी उसकी परिसंपत्तियों का समुचित आकलन नहीं हुआ है। समिति ने इसे विभाग और प्रशासक की उदासीनता का परिणाम बताया।
मुख्य निष्कर्ष:
- 2006 में बने बिहार कृषि उपज बाजार निरसन अधिनियम के प्रावधानों की अनदेखी हुई।
- प्रशासक द्वारा बाजार समितियों की परिसंपत्तियों की सही जानकारी न देना चिंताजनक।
अनुशंसाएं:
- तीन माह के भीतर सभी 54 बाजार समितियों की परिसंपत्तियों का आकलन कराया जाए।
- बाजार समिति प्रांगणों में निबंधित व्यापारियों की संख्या के अनुरूप दुकानें बनाई जाएं।
- दुकान आवंटन नीति तीन माह में तैयार कर, दुकानों का आवंटन सुनिश्चित किया जाए।
- विभाग, प्रशासक के कार्यों की नियमित समीक्षा करे।
स्वास्थ्य विभाग पर रिपोर्ट: जड़ता और लचर कार्यप्रणाली पर नाराजगी
ग्यारहवें प्रतिवेदन में समिति ने इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान अधिनियम, 1984 के क्रियान्वयन में लापरवाही और विभागीय जड़ता को चिन्हित किया है। समिति ने विभागीय कामकाज में सुधार की तत्काल आवश्यकता बताई।
मुख्य निष्कर्ष:
- अधिनियमों और नियमावलियों की उपेक्षा से प्रशासनिक कार्यों में बाधा आ रही है।
- प्रोन्नति की प्रक्रिया धीमी होने से बेसिक ग्रेड के पद खाली नहीं हो पा रहे, जिससे नियुक्ति में देरी हो रही है।
- स्वास्थ्य विभाग ने बिहार सरकार स्वास्थ्य योजना पर कोई अतिरिक्त खर्च न आने की बात स्वीकारी है।
अनुशंसाएं:
- स्वास्थ्य अधिनियम के प्रावधानों का पूर्ण पालन सुनिश्चित किया जाए।
- सभी पात्र सामान्य और विशेषज्ञ चिकित्सकों को तीन माह में प्रोन्नति दी जाए।
- बिहार सरकार स्वास्थ्य योजना को तीन माह में लागू किया जाए।
इन प्रतिवेदनों के जरिए विधान समिति ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि विभागों को उत्तरदायी, प्रभावी और समयबद्ध बनाना आवश्यक है ताकि जनता को लाभ पहुंच सके।


