गांव में स्टार्टअप शुरू कर बदली किस्मत: पत्नी के निधन के बाद गांव लौटा इंजीनियर, आज दर्जनों लोगों को दे रहा रोजगार

जमुई (बिहार): कहते हैं कि कठिनाइयों में ही असली इंसान की पहचान होती है। बिहार के जमुई जिले के सिकंदरा प्रखंड स्थित एक छोटे से गांव के रहने वाले 30 वर्षीय सिकंदर कुमार सिंह चंद्रवंशी ने इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है। एक योग्य मैकेनिकल इंजीनियर होने के बावजूद उन्होंने महानगरों की मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों को ठुकराकर अपने गांव में ही रेडीमेड गारमेंट फैक्ट्री शुरू की। आज उनका यह स्टार्टअप न सिर्फ लाखों का टर्नओवर कर रहा है, बल्कि कई परिवारों के लिए आय का स्रोत बन गया है।

सिकंदर के जीवन में बड़ा बदलाव तब आया जब उनकी पत्नी का असमय निधन हो गया। इस गहरे आघात के बाद उन्होंने जीवन को एक नई दिशा देने का संकल्प लिया। उन्होंने तय किया कि वे अपने गांव में ही रहकर कुछ ऐसा करेंगे, जिससे न केवल उनका बल्कि गांव के अन्य लोगों का भविष्य भी संवरे।

गांव में शुरू की रेडीमेड गारमेंट फैक्ट्री

सिकंदर ने सीमित संसाधनों के साथ रेडीमेड गारमेंट यूनिट की शुरुआत की। शुरुआती संघर्ष के बाद आज उनका यह स्टार्टअप 70-80 हजार रुपए मासिक आय कमा रहा है और 10 से अधिक कारीगरों को स्थायी रोजगार दे रहा है। उनका कहना है कि जल्द ही वह सरकारी सहायता के तहत 40-50 लाख रुपए के लोन की योजना बना रहे हैं, ताकि यूनिट का विस्तार किया जा सके।

स्थानीय युवाओं को मिला रोजगार, नहीं जाना पड़ता महानगर

उनकी फैक्ट्री में काम कर रहे कारीगरों की भी जिंदगी बदल गई है। कारीगर अल्लादीन ने बताया, “पहले हम दिल्ली और मुंबई में काम करते थे। अब यहीं गांव में सिलाई का काम कर रहे हैं और उतनी ही कमाई हो रही है।” वहीं भूलन राम ने कहा, “मुंबई से लौटने के बाद यहां 20-25 हजार रुपए महीने की आमदनी हो रही है। अब गांव में ही काम और सम्मान दोनों मिल रहा है।”

राज्यों में मांग बढ़ी, अगली पीढ़ी के लिए मजबूत आधार

सिकंदर बताते हैं कि उनके उत्पादों को बिहार के लखीसराय, नवादा, शेखपुरा और झारखंड के बाजारों में अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। उनका मानना है कि स्टार्टअप के जरिए वे अगली पीढ़ी को एक सशक्त शुरुआत दे सकते हैं, जिससे वे जीवन में शून्य से नहीं, बल्कि एक मजबूत नींव से आगे बढ़ें।

संदेश स्पष्ट है – बदलाव की शुरुआत गांव से भी हो सकती है। सिकंदर कुमार सिंह चंद्रवंशी की यह कहानी बताती है कि आत्मनिर्भरता, मेहनत और मजबूत इरादे हों, तो कोई भी सपना साकार किया जा सकता है — चाहे वह किसी महानगर से शुरू हो या किसी छोटे से गांव से।


 

  • Related Posts

    गया की बेटियां अब उड़ाएंगी ड्रोन और बनेंगी सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट! “नव्या प्रोजेक्ट” से बदल रही 14-18 साल की किशोरियों की तकदीर; जानें कैसे जुड़ें

    Share Add as a preferred…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *