बिहार में गन्ने की खेती का महाअभियान: 25 जिलों में खुलेंगी नई चीनी मिलें, किसानों को मुफ्त मिलेगा बीज; गुड़ उद्योग से बदलेगी गांवों की सूरत

पटना। बिहार की कृषि आर्थिकी को एक नया आयाम देने और बंद पड़ी चीनी मिलों के टर्बाइनों को फिर से घुमाने के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ी और दूरगामी योजना पर काम शुरू कर दिया है। शनिवार, 11 अप्रैल 2026 को गन्ना उद्योग विभाग ने राज्य के उन क्षेत्रों में भी गन्ने की हरियाली फैलाने का संकल्प दोहराया, जहाँ फिलहाल कोई चीनी मिल अस्तित्व में नहीं है। इस महत्वाकांक्षी पहल का उद्देश्य केवल चीनी उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि बिहार को गुड़ उत्पादन का हब बनाना और राज्य के 25 जिलों में नई चीनी मिलों की स्थापना के लिए एक मजबूत आधार तैयार करना है। ‘गन्ना फसल क्षेत्र विस्तार योजना’ के तहत सरकार अब उन किसानों के दरवाजे तक पहुँच रही है, जिन्होंने पारंपरिक फसलों के मोह में गन्ने की खेती से दूरी बना ली थी। विभाग का मानना है कि जब तक खेतों में गन्ना नहीं होगा, तब तक मिलों का पहिया घूमना मुमकिन नहीं है, इसलिए सबसे पहले कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है।

गैर-चीनी मिल क्षेत्रों में गन्ने की दस्तक: 468 एकड़ में बिछी हरियाली

​बिहार के उन जिलों में, जहाँ वर्तमान में एक भी चीनी मिल चालू हालत में नहीं है, वहां गन्ने की खेती को फिर से पुनर्जीवित करना एक बड़ी चुनौती थी। विभाग की नई रिपोर्ट के अनुसार, इस बाधा को पार करते हुए अब तक 468.93 एकड़ भूमि पर गन्ने की बुआई सफलतापूर्वक पूरी की जा चुकी है। यह आंकड़ा उस बदलाव की ओर संकेत करता है जो आने वाले समय में बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में दिखने वाला है। इस विस्तार कार्यक्रम में भागलपुर, पटना, मुजफ्फरपुर, गया, पूर्णिया, सहरसा, दरभंगा, भोजपुर (आरा), जमुई और सीतामढ़ी जैसे जिले अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।

​इन जिलों का चयन रणनीतिक रूप से किया गया है। उदाहरण के लिए, भागलपुर और पूर्णिया जैसे क्षेत्रों की मिट्टी गन्ने के लिए अत्यंत उर्वर मानी जाती है, लेकिन मिलों के अभाव में यहाँ के किसान मक्का या धान की ओर शिफ्ट हो गए थे। अब सरकार इन क्षेत्रों में गन्ने की खेती को इस तरह बढ़ावा दे रही है कि वहां के स्थानीय गुड़ उद्योग को निरंतर आपूर्ति मिलती रहे। इससे न केवल किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी, बल्कि उन्हें अपने उत्पाद का उचित मूल्य भी मिल सकेगा।

मुफ्त बीज और तकनीकी सहायता: किसानों के लिए बड़ा प्रोत्साहन

​गन्ना उद्योग विभाग ने गन्ने की खेती के प्रति किसानों के हिचकिचाहट को दूर करने के लिए ‘मुफ्त बीज’ का कार्ड खेला है। गन्ना फसल क्षेत्र विस्तार योजना के तहत, गैर-चीनी मिल क्षेत्रों के किसानों को उन्नत किस्म के गन्ना बीज पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। विभाग का लक्ष्य है कि छोटे और सीमांत किसानों को भी इस नकदी फसल से जोड़ा जाए। योजना के प्रावधानों के अनुसार, न्यूनतम 0.25 एकड़ से लेकर अधिकतम 5 एकड़ तक की खेती करने वाले किसी भी किसान को इस योजना का लाभ मिल सकता है।

​विभागीय अधिकारी केवल बीज बांटकर शांत नहीं बैठे हैं, बल्कि वे व्यक्तिगत रूप से खेतों का दौरा कर रहे हैं और किसानों को बुआई की नई तकनीकों के बारे में शिक्षित कर रहे हैं। गन्ने की ऐसी किस्में प्रदान की जा रही हैं, जिनमें बीमारी लगने का खतरा कम है और प्रति एकड़ पैदावार अधिक होती है। सरकार का मानना है कि जब किसान देखेंगे कि गन्ने की खेती में इनपुट लागत (Input Cost) कम हो रही है और सरकार का पूरा सहयोग मिल रहा है, तो वे स्वतः ही इसकी ओर आकर्षित होंगे।

25 नई चीनी मिलें और बंद मिलों का जीर्णोद्धार

​बिहार सरकार का विजन केवल वर्तमान मिलों को चलाने तक सीमित नहीं है। राज्य के 25 जिलों में नई चीनी मिलों की स्थापना का लक्ष्य एक क्रांतिकारी कदम है। इसके लिए भूमि चिन्हित करने और निवेशकों को आमंत्रित करने की प्रक्रिया भी समानांतर रूप से चल रही है। ईख आयुक्त अनिल कुमार झा के अनुसार, नई मिलों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उनके आसपास के ‘कमांड एरिया’ में गन्ने की पर्याप्त खेती हो रही है या नहीं।

​इसी सोच के तहत बंद पड़ी चीनी मिलों को पुनः चालू करने की कवायद भी तेज कर दी गई है। सालों से जंग खा रही मशीनों को बदलने और आधुनिक तकनीक के बॉयलर लगाने के लिए विशेष बजट का प्रावधान किया गया है। सरकार चाहती है कि बिहार फिर से वही ‘चीनी का कटोरा’ बने जो वह आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में था। इन नई और पुरानी मिलों के क्रियान्वयन से राज्य में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है।

बिहार राज्य गुड़ उद्योग प्रोत्साहन योजना: गांवों में लगेगा मीठा कारखाना

​गन्ने का उपयोग केवल चीनी बनाने के लिए ही नहीं, बल्कि उत्तम गुणवत्ता वाले गुड़ के लिए भी किया जा सकता है। जहाँ चीनी मिलें नहीं हैं, वहां सरकार ‘बिहार राज्य गुड़ उद्योग प्रोत्साहन कार्यक्रम’ चला रही है। गुड़ उद्योग को बढ़ावा देने के पीछे सरकार का तर्क है कि इसे छोटे स्तर पर भी शुरू किया जा सकता है और इसमें निवेश कम लगता है। गुड़ की बढ़ती वैश्विक मांग और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पसंद ने इसे एक फायदे का सौदा बना दिया है।

​सरकार गुड़ की छोटी इकाइयों (क्रशर) को आधुनिक बनाने के लिए सब्सिडी और तकनीकी सहायता दे रही है। इसका सीधा फायदा उन किसानों को होगा जो अपनी उपज को दूर दराज की मिलों तक नहीं ले जा सकते। अब वे अपने गाँव या प्रखंड स्तर पर ही गन्ने को प्रोसेस कर गुड़ बना सकेंगे। यह ग्रामीण औद्योगीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिससे शहरों की ओर पलायन रुकेगा और स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

एक बार बुआई, तीन बार कटाई: आय बढ़ाने का गणित

​गन्ने की खेती को ‘किसानों का एटीएम’ कहा जाता है, और इसके पीछे ठोस कारण हैं। विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि अन्य फसलों की तुलना में गन्ना अधिक टिकाऊ और लाभप्रद है। एक बार गन्ने की बुआई करने के बाद किसान इसकी तीन बार तक कटाई कर सकता है, जिसे ‘पेड़ी’ (Ratoon) फसल कहा जाता है। इसका अर्थ है कि दूसरे और तीसरे साल में किसान को बीज और बुआई की मजदूरी पर खर्च नहीं करना पड़ता, जिससे उसका मुनाफा दोगुना हो जाता है।

​इसके अलावा, हाल के वर्षों में गन्ने के जूस की मांग में जबरदस्त वृद्धि देखी गई है। स्वास्थ्यवर्धक होने के कारण शहरों में गन्ने के जूस के काउंटर तेजी से बढ़ रहे हैं। विभाग का अनुमान है कि जो किसान सीधे मिल को गन्ना नहीं बेचना चाहते, वे स्थानीय जूस वेंडर्स या खुद का जूस पार्लर शुरू कर अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं। यह फसल न केवल खेत में खड़ी रहती है, बल्कि आपदाओं के प्रति भी अन्य फसलों की तुलना में अधिक प्रतिरोधी है।

प्रशासनिक मुस्तैदी और ईख आयुक्त का संदेश

​ईख आयुक्त अनिल कुमार झा ने इस अभियान की प्रगति पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा है कि सरकार का मुख्य उद्देश्य गन्ने की खेती को वापस मुख्यधारा में लाना है। उन्होंने बताया कि विभागीय अधिकारी और प्रसार कार्यकर्ता लगातार गांवों का दौरा कर रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मुफ्त बीज का लाभ वास्तविक और जरूरतमंद किसानों तक पहुँचे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गैर-चीनी मिल क्षेत्रों में मिली शुरुआती सफलता एक बड़े बदलाव की आहट है।

​सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए डिजिटल मॉनिटरिंग का भी सहारा लिया है। किस किसान को कितना बीज दिया गया और उसकी फसल की वर्तमान स्थिति क्या है, इसका पूरा डेटाबेस तैयार किया जा रहा है। इससे आने वाले समय में फसल बीमा और अन्य सरकारी लाभों को सीधे किसानों के खातों (DBT) तक पहुँचाने में मदद मिलेगी।

बिहार के किसानों के लिए मीठे भविष्य की नींव

​गन्ना उद्योग विभाग की यह पहल बिहार के कृषि परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखती है। 468 एकड़ से शुरू हुआ यह सफर जल्द ही हजारों एकड़ में बदलने की राह पर है। 25 जिलों में नई मिलों का सपना और गुड़ उद्योग को मिला प्रोत्साहन बिहार के किसानों के लिए एक नए युग की शुरुआत है। जब खेतों में गन्ने की फसल लहलहाएगी, तो न केवल किसानों की जेब भरेगी, बल्कि बिहार के औद्योगिक मानचित्र पर भी ‘चीनी उद्योग’ की चमक वापस लौटेगी।

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