
पटना। बिहार में पिछले दो महीनों से अधिक समय से जारी राजस्व कर्मियों की हड़ताल अब एक नए और जटिल मोड़ पर पहुँच गई है। राज्य के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने हड़ताली कर्मियों के प्रति नरमी दिखाते हुए उन्हें निलंबन मुक्त करने का आदेश जिला समाहर्ताओं को दिया है, लेकिन इसके बावजूद गतिरोध समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। विभाग की इस पहल को राजस्व कर्मचारी संघ ने सिरे से खारिज कर दिया है और अपनी मांगों पर अडिग रहने का फैसला किया है। बुधवार, 22 अप्रैल 2026 को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, विभाग और कर्मचारी संघ के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो गई है कि प्रशासनिक आदेश भी बेअसर साबित हो रहे हैं। इस हड़ताल के कारण पूरे राज्य में भूमि सुधार, दाखिल-खारिज और अन्य महत्वपूर्ण राजस्व कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं, जिससे आम जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
विभाग की पहल और समाहर्ताओं का ‘मार्गदर्शन’: कहाँ फंसा पेंच?
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने राज्य के सभी जिलों के समाहर्ताओं को एक आधिकारिक निर्देश भेजा है, जिसमें हड़ताल के दौरान निलंबित किए गए राजस्व कर्मियों को निलंबन मुक्त करने की बात कही गई है। विभाग का उद्देश्य इस कदम के जरिए हड़ताल को समाप्त कर कर्मचारियों को काम पर वापस लाना था। हालांकि, जमीनी स्तर पर इस आदेश के क्रियान्वयन को लेकर एक बड़ा तकनीकी पेंच फंस गया है।
विभागीय निर्देशों के बाद जिलों के समाहर्ता और उनके अधीनस्थ अधिकारी इस आदेश को एक ‘मार्गदर्शन’ के रूप में देख रहे हैं। जिला प्रशासन का तर्क है कि कर्मचारियों को निलंबन से मुक्ति तभी दी जाएगी, जब वे पहले अपने कार्यस्थल पर ‘ज्वाइन’ करेंगे। वहीं, कर्मचारी संघ इस शर्त को पूरी तरह अनुचित मान रहा है। संघ का कहना है कि निलंबन वापसी बिना किसी शर्त के होनी चाहिए, क्योंकि यह हड़ताल उनकी जायज मांगों को लेकर है। जिलों द्वारा लगाई जा रही यह शर्त कि “पहले ज्वाइन करें, तब निलंबन समाप्त होगा”, कर्मचारियों के बीच आक्रोश को और भड़का रही है। संघ का स्पष्ट मानना है कि ऐसी स्थिति में वे हड़ताल समाप्त करने के बारे में सोच भी नहीं सकते।
संघ का पक्ष: “दो महीने का संघर्ष और शून्य हासिल”
राजस्व कर्मचारी संघ ने विभाग की इस कवायद को ‘दिखावा’ करार दिया है। संघ के नेताओं का कहना है कि उनकी हड़ताल दो महीने से अधिक समय से चल रही है, लेकिन इस लंबी अवधि में सरकार ने उनकी एक भी बुनियादी मांग पर सकारात्मक विचार नहीं किया है। उलटा, लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर रहे कर्मचारियों को जिलों में निलंबित कर उनका दमन करने का प्रयास किया गया है।
संघ की प्रमुख शिकायतों में शामिल हैं:
- मांगों की अनदेखी: वेतन विसंगति, पदोन्नति के अवसर और कार्यक्षेत्र में बढ़ते दबाव जैसी मांगों पर विभाग मौन बना हुआ है।
- दमनकारी नीति: मांगों पर बातचीत करने के बजाय कर्मचारियों को निलंबित करना और अब सशर्त वापसी का दबाव बनाना प्रशासनिक तानाशाही को दर्शाता है।
- अविश्वास का माहौल: विभाग के मौखिक आश्वासनों और सशर्त आदेशों पर अब कर्मचारियों को भरोसा नहीं रहा है।
संघ ने चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस और लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक निलंबन वापसी के ऐसे “अधूरे आदेशों” का कोई महत्व नहीं है और हड़ताल जारी रहेगी।
संवर्ग नियमावली 2025: समाहर्ताओं के पास है असली ताकत
दूसरी ओर, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कानून का हवाला दिया है। विभाग की ओर से कहा गया है कि राज्य में राजस्व कर्मचारियों के निलंबन और उनकी कार्य पर वापसी को लेकर स्थिति अब पूरी तरह स्पष्ट है। इसके लिए ‘बिहार राजस्व कर्मचारी संवर्ग नियमावली 2025’ के प्रावधानों का जिक्र किया गया है।
इस नई नियमावली के अनुसार:
- नियुक्ति का अधिकार: राजस्व कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार अब संबंधित जिलों के समाहर्ताओं (District Collectors) के पास है।
- अनुशासनिक कार्रवाई: कर्मचारियों के विरुद्ध किसी भी प्रकार की अनुशासनिक कार्रवाई, जिसमें निलंबन और बर्खास्तगी शामिल है, का अधिकार भी समाहर्ताओं को ही प्राप्त है।
- विभागीय भूमिका: राज्य मुख्यालय केवल नीतिगत दिशा-निर्देश जारी कर सकता है, लेकिन वास्तविक कार्रवाई जिला स्तर पर ही की जानी है।
इसी प्रावधान के तहत जिलों में समाहर्ताओं द्वारा हड़ताली कर्मियों पर कार्रवाई की गई थी और अब विभाग का निर्देश भी समाहर्ताओं के माध्यम से ही लागू होना है। विभाग का तर्क है कि वह नियम के विरुद्ध जाकर कोई आदेश थोप नहीं सकता, इसलिए जिला प्रशासन द्वारा ‘ज्वाइनिंग’ की शर्त लगाना उनकी अपनी प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
आम जनता पर असर: दाखिल-खारिज और प्रमाण पत्रों का संकट
इस दो महीने लंबी हड़ताल का सबसे बुरा असर बिहार की आम जनता और किसानों पर पड़ रहा है। राजस्व कर्मचारी (हल्का कर्मचारी) जमीनी स्तर पर सरकारी तंत्र की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। उनके बिना निम्नलिखित कार्य पूरी तरह ठप हैं:
- दाखिल-खारिज (Mutation): जमीन की खरीद-बिक्री के बाद नामकरण की प्रक्रिया रुकी हुई है, जिससे हजारों आवेदन लंबित पड़े हैं।
- लगान रसीद और एलपीसी: किसानों को बैंकों से लोन लेने या अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए लगान रसीद और लैंड पजेशन सर्टिफिकेट (LPC) की ज़रूरत होती है, जो फिलहाल नहीं बन पा रहे हैं।
- जाति-आय-निवास प्रमाण पत्र: छात्रों और युवाओं को विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं और स्कॉलरशिप के लिए ज़रूरी प्रमाण पत्र प्राप्त करने में भारी कठिनाई हो रही है, क्योंकि जमीनी जांच राजस्व कर्मी ही करते हैं।
- बाढ़ और आपदा राहत: बिहार के कई क्षेत्रों में आपदा राहत कार्यों के लिए क्षति का आकलन भी इन्हीं कर्मचारियों के जिम्मे होता है, जो हड़ताल के कारण प्रभावित हो रहा है।
प्रशासनिक स्तर पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है और ‘इन्स्टेंट इंडेक्सिंग’ जैसे डिजिटल सुधार भी इन कर्मचारियों की अनुपस्थिति में बेमानी साबित हो रहे हैं।
क्या निकलेगा समाधान का रास्ता?
बिहार में राजस्व विभाग और उसके कर्मचारियों के बीच का यह संघर्ष अब एक ‘डेडलॉक’ की स्थिति में है। विभाग चाहता है कि कर्मचारी काम पर लौटें और फिर बातचीत हो, जबकि कर्मचारी चाहते हैं कि पहले उनकी मांगों और निलंबन पर ठोस फैसला हो। नियमावली 2025 ने समाहर्ताओं को जो शक्तियां दी हैं, उनका उपयोग फिलहाल समझौते के बजाय दबाव बनाने के लिए होता दिख रहा है।
यदि सरकार और संघ के बीच जल्द ही कोई बीच का रास्ता नहीं निकला, तो राज्य की राजस्व व्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है। 22 अप्रैल 2026 की स्थिति यह बताती है कि केवल निलंबन मुक्त करने का आदेश काफी नहीं है; इसके लिए विश्वास बहाली के कदम और मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विभाग अपनी ‘पहले ज्वाइन करें’ की शर्त वापस लेता है या कर्मचारी संघ अपना आंदोलन और तेज करता है। फिलहाल, बिहार के अंचल कार्यालयों में सन्नाटा पसरा है और फाइलों पर धूल जमा हो रही है।


