​भोजपुर में हड़ताली राजस्व कर्मियों पर बड़ी कार्रवाई: पांच कर्मचारी निलंबित, प्रशासनिक अमले में मची खलबली

आरा/भोजपुर। बिहार में अपनी मांगों को लेकर लंबे समय से आंदोलन की राह पर चल रहे राजस्व कर्मियों और सरकार के बीच का टकराव अब आर-पार की स्थिति में पहुँच गया है। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन और नए मुख्यमंत्री के पदभार ग्रहण करने के बाद भी हड़ताल खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं, जिसके जवाब में प्रशासन ने अब ‘दमनकारी’ नहीं बल्कि ‘अनुशासनिक’ कार्रवाई का हंटर चलाना शुरू कर दिया है। भोजपुर जिला प्रशासन ने राज्य सरकारी सेवक नियमावली के कड़े प्रावधानों का उपयोग करते हुए हड़ताल पर गए पांच राजस्व कर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। भोजपुर जिला पदाधिकारी तनय सुल्तानिया द्वारा की गई इस त्वरित कार्रवाई ने न केवल जिले बल्कि पूरे राज्य के राजस्व महकमे में खलबली मचा दी है। यह कदम उस समय उठाया गया है जब अंचलों में म्यूटेशन (दाखिल-खारिज), प्रमाण पत्र और भूमि विवाद से जुड़े हजारों मामले लंबित पड़े हैं और आम जनता त्राहि-माम कर रही है। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि सरकारी कार्यों में व्यवधान डालने वाले किसी भी कर्मचारी को बख्शा नहीं जाएगा और यह निलंबन महज एक शुरुआत है।

इन राजस्व कर्मियों पर गिरी गाज: सूची और अंचल

​जिलाधिकारी तनय सुल्तानिया ने विभागीय निर्देशों की अवहेलना और सामूहिक अवकाश के जरिए सरकारी कार्यों को ठप करने के गंभीर आरोपों में पांच कर्मचारियों के निलंबन पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। निलंबित किए गए कर्मियों की सूची इस प्रकार है:

  1. नारायण शर्मा: राजस्व कर्मचारी, अंचल कार्यालय तरारी।
  2. चन्द्रशेखर चौबे: राजस्व कर्मचारी, अंचल कार्यालय बिहिया।
  3. संजय कुमार सिंह: राजस्व कर्मचारी, अंचल कार्यालय चरपोखरी।
  4. रंजीत कुमार: राजस्व कर्मचारी, उदवंतनगर (वर्तमान में गड़हनी अंचल कार्यालय में प्रतिनियुक्त)।
  5. राहुल राय: राजस्व कर्मचारी, अंचल कार्यालय सदर आरा।

​इन सभी कर्मचारियों पर आरोप है कि इन्होंने वरिष्ठ पदाधिकारियों के निर्देशों को ठेंगा दिखाते हुए न केवल खुद काम बंद रखा, बल्कि सामूहिक रूप से गायब रहकर पूरी लोक व्यवस्था (Public Order) को बाधित करने का प्रयास किया। निलंबन अवधि के दौरान इन सभी का मुख्यालय संबंधित भूमि सुधार उप समाहर्ता (DCLR) के कार्यालय में निर्धारित किया गया है, जहाँ इन्हें प्रतिदिन अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।

नियमों का हवाला: क्यों लिया गया यह कड़ा फैसला?

​भोजपुर जिला प्रशासन की यह कार्रवाई किसी मौखिक आदेश पर नहीं, बल्कि ‘बिहार सरकारी सेवक आचरण नियमावली’ के ठोस कानूनी आधार पर टिकी है। जांच रिपोर्ट के अनुसार, ये कर्मचारी बिहार सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1976 के नियम-8 के प्रतिकूल कार्य कर रहे थे। यह नियम किसी भी सरकारी सेवक को सामूहिक अवकाश या हड़ताल के जरिए सरकारी काम रोकने से कड़ाई से मना करता है।

​इसके अतिरिक्त, इनके विरुद्ध बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम-9 की कंडिका-1 के तहत कार्रवाई की गई है। प्रशासन का तर्क है कि राजस्व कर्मचारी किसी भी जिले की प्रशासनिक रीढ़ होते हैं। उनके हड़ताल पर जाने से न केवल राजस्व की हानि हो रही है, बल्कि जमीन से जुड़े विवादों के निपटारे न होने से कानून व्यवस्था की स्थिति भी बिगड़ सकती है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव के कड़े पत्र के बाद भोजपुर डीएम ने यह ‘चाबुक’ चलाया है। पत्र में स्पष्ट निर्देश था कि जो कर्मचारी 11 फरवरी 2026 से जारी इस हड़ताल में शामिल हैं, उन पर अविलंब अनुशासनिक कार्रवाई की जाए।

11 फरवरी से जारी है गतिरोध: वार्ता की मेज से निलंबन तक

​बिहार राज्य भूमि सुधार कर्मचारी संघ और संयुक्त संघर्ष मोर्चा के आह्वान पर यह हड़ताल बीते 11 फरवरी 2026 से लगातार जारी है। कर्मचारियों की मांगें मुख्य रूप से वेतन विसंगतियों को दूर करने, कार्यभार कम करने और नई नियुक्तियों को लेकर हैं। हालांकि, सरकार का पक्ष है कि अधिकतर जायज मांगों पर विचार किया जा रहा है, लेकिन हड़ताल के जरिए काम ठप करना ब्लैकमेलिंग जैसा है।

​पूर्व राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने अपने कार्यकाल के दौरान कई बार इन कर्मियों को काम पर लौटने का अल्टीमेटम दिया था। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर काम प्रभावित हुआ तो कड़ी कार्रवाई होगी। अब नई सरकार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी इसी ‘हार्ड लाइन’ (सख्त रुख) को बरकरार रखा है। भोजपुर की यह कार्रवाई अन्य जिलों के लिए भी एक नजीर (उदाहरण) मानी जा रही है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पटना, गया, मुजफ्फरपुर और भागलपुर जैसे जिलों में भी इसी तरह की निलंबन सूचियां जारी हो सकती हैं।

आम जनता की मुश्किलें: ठप पड़ी है दाखिल-खारिज की प्रक्रिया

​राजस्व कर्मियों की इस लंबी हड़ताल का सबसे बुरा असर बिहार के उन आम लोगों पर पड़ रहा है जो जमीन की रजिस्ट्री के बाद दाखिल-खारिज (Mutation) के लिए अंचलों के चक्कर लगा रहे हैं। भोजपुर जिले में ही हजारों आवेदन लंबित हैं। इसके अलावा जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र जैसे जरूरी दस्तावेजों के लिए छात्र और आम नागरिक परेशान हैं। अंचल कार्यालयों में सन्नाटा पसरा हुआ है और जो थोड़े-बहुत काम आउटसोर्सिंग या संविदा कर्मियों के भरोसे चल रहे थे, उनमें भी गति नहीं है।

​राजस्व कर्मचारियों का काम केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे अंचल अधिकारी (CO) के कान और आंख होते हैं। क्षेत्र की पैमाइश, सीमांकन और सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने जैसे काम पूरी तरह ठप हैं। इसी जन-असंतोष को देखते हुए प्रशासन ने अब कड़ा रुख अपनाया है। निलंबित कर्मियों को दी गई ‘मुख्यालय अटैचमेंट’ की सजा यह सुनिश्चित करने के लिए है कि वे अब बाहर रहकर हड़ताल को हवा न दे सकें।

कर्मचारी संघ का रुख: झुकने को तैयार नहीं संघर्ष मोर्चा

​दूसरी ओर, बिहार राज्य भूमि सुधार कर्मचारी संघ ने इस कार्रवाई को ‘दमनकारी’ करार दिया है। संघ के नेताओं का कहना है कि सरकार संवाद करने के बजाय डराने की राजनीति कर रही है। उनका दावा है कि निलंबन से आंदोलन और तेज होगा। संघ का तर्क है कि वे पिछले कई वर्षों से अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है।

​संघर्ष मोर्चा ने चेतावनी दी है कि यदि निलंबित कर्मियों को तुरंत बहाल नहीं किया गया और उनकी मांगों पर विचार नहीं हुआ, तो वे पूरे प्रदेश में ‘काम बंद’ के साथ-साथ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करेंगे। हालांकि, प्रशासन ने भी कमर कस ली है। भोजपुर डीएम के आदेश में स्पष्ट है कि निलंबन के दौरान इन कर्मियों को केवल जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा और इनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही (Departmental Proceeding) अलग से चलाई जाएगी।

निष्कर्ष के बिना: प्रशासन की अगली चुनौती

​18 अप्रैल 2026 की यह कार्रवाई बिहार की नौकरशाही के बदलते मिजाज को दर्शाती है। सम्राट चौधरी की सरकार ने यह साफ कर दिया है कि ‘नीतीश मॉडल’ के अनुशासन और भाजपा की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का संगम अब देखने को मिलेगा। राजस्व कर्मियों के लिए यह संकट की घड़ी है—एक तरफ उनकी मांगें हैं और दूसरी तरफ उनकी नौकरी पर मंडराता खतरा।

​भोजपुर से शुरू हुई यह ‘क्लीनअप ड्राइव’ अब किस दिशा में जाती है, यह आने वाले कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा। क्या कर्मचारी निलंबन के डर से काम पर लौटेंगे या फिर यह विवाद बिहार की राजनीति में एक नया उबाल लेकर आएगा? फिलहाल, अंचल कार्यालयों के बाहर खड़े उस आम बिहारी की नजरें सरकार और कर्मचारी के इस युद्ध पर टिकी हैं, जिसका काम पिछले दो महीनों से लटका हुआ है। प्रशासन की इस कार्रवाई ने यह तो तय कर दिया है कि अब ‘सामूहिक अवकाश’ का बहाना सेवा नियमों की ढाल नहीं बन पाएगा।

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