​भागलपुर में फूटा नारी शक्ति का गुस्सा: सैंडिस कंपाउंड में कैंडल मार्च निकाल महिलाओं ने कांग्रेस और विपक्ष को कोसा

भागलपुर। देश की संसद में महिला आरक्षण बिल के गिरने की गूँज अब गलियों और चौराहों तक पहुँच गई है। राजधानी दिल्ली में शुक्रवार की रात जो विधायी रस्साकशी हुई, उसका सीधा असर बिहार के सिल्क सिटी भागलपुर में देखने को मिला। शनिवार, 18 अप्रैल 2026 की शाम जब सूरज ढल रहा था, तब भागलपुर के ऐतिहासिक सैंडिस कंपाउंड की धरती मोमबत्तियों की रोशनी और आक्रोश भरे नारों से दहल उठी। ‘युवा एकता सामाजिक संगठन’ के बैनर तले जुटीं सैकड़ों महिलाओं ने कांग्रेस, राजद, सपा और टीएमसी सहित तमाम विपक्षी दलों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। हाथों में जलती हुई मोमबत्तियां लेकर इन महिलाओं ने यह संदेश देने की कोशिश की कि विपक्षी दलों ने संसद में उनके अधिकारों की लौ बुझाई है, लेकिन उनके भीतर लगी गुस्से की ज्वाला अब पूरे देश में फैलेगी। भाजपा नेता ओम प्रकाश उपाध्याय के नेतृत्व में हुए इस विरोध प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में महिला आरक्षण बिल का गिरना बिहार की राजनीति में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनने जा रहा है।

सैंडिस कंपाउंड में आक्रोश की ज्वाला: नारी शक्ति का अपमान या राजनैतिक शतरंज़?

​शनिवार शाम ठीक 6:30 बजे सैंडिस कंपाउंड के मुख्य द्वार पर महिलाओं का जमावड़ा शुरू हुआ। आमतौर पर शाम की सैर के लिए मशहूर यह स्थान आज राजनैतिक विरोध का केंद्र बन गया था। प्रदर्शन में शामिल महिलाओं का कहना था कि वे किसी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि अपनी पीढ़ियों के हक के लिए सड़कों पर उतरी हैं। युवा एकता सामाजिक संगठन की महिलाओं ने कैंडल जलाकर एक मौन जुलूस की शुरुआत की, जो देखते ही देखते तीखे नारों में तब्दील हो गया।

​प्रदर्शन के दौरान महिलाओं ने एक स्वर में नारा लगाया— “नारी शक्ति का स्वाभिमान, कांग्रेस ने किया अपमान”। इसके साथ ही राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। महिलाओं के हाथों में मौजूद तख्तियों पर लिखा था कि जो दल महिलाओं को संसद में जगह नहीं दे सकते, वे उनके कल्याण की बात करना छोड़ दें। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने मिलकर एक ऐतिहासिक अवसर को केवल राजनैतिक कुटिलता के कारण नष्ट कर दिया।

ओम प्रकाश उपाध्याय का तीखा हमला: “महिलाओं का श्राप कांग्रेस का नाश कर देगा”

​प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे भाजपा नेता और संगठन के अध्यक्ष ओम प्रकाश उपाध्याय ने इस मौके पर बेहद आक्रामक तेवर अपनाए। उन्होंने संबोधन के दौरान किसी भी प्रकार के औपचारिक संबोधन से परहेज करते हुए सीधे तौर पर कांग्रेस नेतृत्व को निशाने पर लिया। उपाध्याय ने कहा, “आज देश की महिलाओं की आंखों में जो आंसू हैं और जो गुस्सा है, वह बेकार नहीं जाएगा। जिस कांग्रेस ने संसद में बिल को गिराने की साजिश रची है, उसे अब देश की महिलाएं अपने दिल से गिरा देंगी।”

​उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस और विपक्षी दलों ने नारी शक्ति के साथ विश्वासघात किया है। उपाध्याय का तर्क था कि लोकसभा में बिल का गिरना केवल एक तकनीकी हार नहीं है, बल्कि यह विपक्ष की उस मानसिकता का परिचय है जो महिलाओं को नेतृत्व के पायदान पर नहीं देखना चाहती। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि महिलाओं का यह सामूहिक श्राप कांग्रेस के बचे-कुचे वजूद को भी खत्म कर देगा। उनके अनुसार, राहुल गांधी और उनकी टीम ने यह साबित कर दिया है कि वे केवल भाषणों में महिलाओं की बात करते हैं, लेकिन जब वास्तव में अधिकार देने की बात आती है, तो वे पीछे हट जाते हैं।

आधी आबादी का दर्द: रूबी देवी और सरिता झा की जुबानी

​संगठन की नेत्री रूबी देवी ने प्रदर्शन के दौरान भावुक होते हुए कहा कि भारतीय महिलाओं का मनोबल आज कांग्रेस ने तोड़ दिया है। उन्होंने कहा, “हम उम्मीद कर रहे थे कि 2026 की यह संसद हमें वो पहचान देगी जिसका इंतजार दशकों से था, लेकिन विपक्ष की वोटिंग ने हमें फिर से पीछे धकेल दिया।” वहीं, सरिता झा ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों ने हमेशा से महिलाओं से घृणा की है। उन्हें डर है कि अगर महिलाएं सदन में पहुँच गईं, तो पुरुषों का वर्चस्व खत्म हो जाएगा।

​प्रदर्शन में शामिल रंभा सिंह ने स्पष्ट किया कि यह केवल किसी एक संगठन या दल की हार नहीं है, बल्कि यह देश की आधी आबादी की हार है। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने इस बिल के खिलाफ वोट देकर यह बता दिया है कि वे पिछड़ों और दलितों के नाम पर केवल राजनीति करते हैं, लेकिन जब महिलाओं को मौका देने की बात आती है, तो वे बहाने ढूंढने लगते हैं। महिलाओं का गुस्सा विशेष रूप से ‘कोटे के अंदर कोटा’ की मांग को लेकर भी था, जिसे वे बिल गिराने का एक आधार मान रही थीं।

प्रदर्शन में शामिल प्रमुख चेहरे: भागलपुर की नारी शक्ति

​सैंडिस कंपाउंड में हुए इस जोरदार प्रदर्शन में भागलपुर के विभिन्न वार्डों और क्षेत्रों से महिलाएं पहुँची थीं। प्रदर्शन में मुख्य रूप से रीता ओझा, नीलम सिंह, शांता दास, गायत्री सिंह, माला प्रसाद, नूतन ठाकुर, पूनम पांडे और दर्जनों अन्य सक्रिय महिलाएं मौजूद रहीं। इन महिलाओं ने संकल्प लिया कि वे इस मुद्दे को लेकर घर-घर जाएंगी और महिलाओं को बताएंगे कि किस तरह उनके अधिकारों की बलि चढ़ाई गई। प्रदर्शन के अंत में महिलाओं ने एक सामूहिक शपथ ली कि वे आगामी चुनावों में उन ताकतों को सबक सिखाएंगी जिन्होंने नारी शक्ति वंदन अधिनियम का विरोध किया है।

संतुलित पक्ष: क्यों गिरा बिल? विपक्ष का तर्क और सत्ता पक्ष का संकल्प

​हालांकि सैंडिस कंपाउंड में भाजपा समर्थित संगठन का यह प्रदर्शन पूरी तरह से विपक्ष के खिलाफ था, लेकिन इस मुद्दे के दूसरे पहलू को समझना भी जरूरी है। संसद में शुक्रवार को बिल इसलिए नहीं गिर सका क्योंकि उसे दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। विपक्ष (कांग्रेस, राजद, सपा आदि) का तर्क था कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे इसमें ‘ओबीसी कोटा’ (कोटे के अंदर कोटा) सुनिश्चित करने और इसे 2029 के बजाय तुरंत लागू करने की मांग कर रहे थे। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार बिना ओबीसी आरक्षण के इस बिल को अधूरा रख रही थी, जो पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के साथ अन्याय होता।

​दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का कहना था कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया और परिसीमन के तकनीकी कारणों से इसे 2029 से ही लागू किया जा सकता है। सरकार ने विपक्ष की इन मांगों को ‘देरी करने की चाल’ बताया। इसी वैचारिक टकराव के कारण 230 सांसदों ने बिल के खिलाफ मतदान किया, जिससे यह संशोधन पारित नहीं हो सका। भागलपुर में हो रहे प्रदर्शन इसी राजनैतिक टकराव का स्थानीय विस्तार हैं, जहाँ जनता अब दो खेमों में बंटी नजर आ रही है।

निष्कर्ष के बिना: भागलपुर से उठी यह गूँज कहाँ तक जाएगी?

​सैंडिस कंपाउंड में शनिवार की शाम जलायी गई ये मोमबत्तियां केवल एक प्रदर्शन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये बिहार की बदलती राजनैतिक हवा का रुख बता रही हैं। भागलपुर जैसे संवेदनशील और जागरूक शहर से उठी यह गूँज निश्चित रूप से राजधानी पटना और दिल्ली तक पहुँचेगी। ओम प्रकाश उपाध्याय और युवा एकता सामाजिक संगठन ने इस मुद्दे को सड़कों पर लाकर विपक्ष के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।

​अब सवाल यह है कि क्या महिलाएं विपक्ष के ‘कोटे के अंदर कोटा’ वाले तर्क को स्वीकार करेंगी या फिर वे इसे अपनी प्रगति में बाधा मानकर विरोध जारी रखेंगी? 18 अप्रैल 2026 की यह शाम भागलपुर के इतिहास में उस दिन के रूप में दर्ज होगी जब महिलाओं ने अपनी राजनैतिक भागीदारी के लिए मोमबत्तियां नहीं, बल्कि आक्रोश की मशालें थामी थीं। जैसे-जैसे रात गहराती गई, सैंडिस कंपाउंड खाली तो हो गया, लेकिन वहां छोड़ी गई नारों की गूँज अभी भी हवा में तैर रही है।

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