
भागलपुर। अंग जनपद और उत्तर बिहार को जोड़ने वाली जीवनरेखा, विक्रमशिला सेतु पर उपजे गंभीर संकट के बीच सोमवार को राहत की एक बड़ी और तकनीकी उम्मीद दिखाई दी है। पुल के क्षतिग्रस्त होने के बाद से ठप पड़ी रफ़्तार को फिर से बहाल करने के लिए देश की सबसे प्रतिष्ठित निर्माण एजेंसी, सीमा सड़क संगठन (BRO) ने मोर्चा संभाल लिया है। विशेषज्ञों की करीब 100 सदस्यीय भारी-भरकम टीम सोमवार को भागलपुर पहुँची और युद्ध स्तर पर सेतु के पुनर्निर्माण एवं वैकल्पिक मार्गों की तलाश शुरू कर दी। बीआरओ की इस टीम के आगमन से न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल बढ़ गई है, बल्कि उन हजारों लोगों के चेहरे पर भी संतोष की लकीरें उभरी हैं जो पिछले कई दिनों से आवागमन ठप होने के कारण परेशान थे। 11 मई 2026 की यह तारीख भागलपुर के बुनियादी ढांचे के इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यहाँ पहली बार किसी आपदा जैसी स्थिति में बीआरओ को इतने बड़े पैमाने पर तैनात किया गया है।
मैदान में बीआरओ की विशेष इकाई: बेली ब्रिज पर टिकी नजरें
बीआरओ की यह टीम केवल सामान्य मरम्मत के लिए नहीं आई है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य सेतु के क्षतिग्रस्त हिस्से के पास एक अस्थायी ‘बेली ब्रिज’ (Bailey Bridge) के निर्माण की संभावनाओं को तलाशना है। बेली ब्रिज अपनी मजबूती और बहुत ही कम समय में तैयार होने की क्षमता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। टीम फिलहाल इस बात का तकनीकी आकलन कर रही है कि क्या मुख्य सेतु के समानांतर या उसके टूटे हुए हिस्से के करीब कुछ मीटर की दूरी पर ऐसा ढांचा खड़ा किया जा सकता है जिससे भारी वाहनों का नहीं तो कम से कम हल्के और मध्यम वाहनों का परिचालन तुरंत शुरू किया जा सके।
सोमवार सुबह से ही बीआरओ के इंजीनियरों ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी। टीम के सदस्यों ने आधुनिक उपकरणों के साथ पुल के पिलरों, नींव और ऊपरी स्लैब की वर्तमान स्थिति का बारीकी से अध्ययन किया। विशेषज्ञों का एक समूह गंगा की लहरों के बीच नावों के सहारे पिलरों की जड़ तक पहुँचा, वहीं दूसरा समूह पुल के ऊपरी हिस्से पर क्षति की गंभीरता को मापने में जुटा रहा।
बरारी घाट से नवगछिया तक सघन निरीक्षण और तकनीकी मंथन
बीआरओ की टीम ने अपने निरीक्षण का दायरा केवल क्षतिग्रस्त हिस्से तक सीमित नहीं रखा। विशेषज्ञों ने पुल निगम के वरीय अधिकारियों और एसडीआरएफ (SDRF) के जवानों के साथ मिलकर बरारी घाट से लेकर नवगछिया की ओर जाने वाले अंतिम छोर तक विक्रमशिला सेतु के विभिन्न हिस्सों का सघन निरीक्षण किया। इस दौरान टीम ने यह समझने की कोशिश की कि पुल की मुख्य संरचना पर क्षति का कितना दबाव पड़ा है और क्या कोई अन्य हिस्सा भी कमजोर हुआ है।
निरीक्षण के दौरान बीआरओ के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुल निगम के अभियंताओं से पुरानी ड्राइंग और मरम्मत के पिछले रिकॉर्ड मांगे। विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा जैसी विशाल नदी पर बने इस सेतु की मरम्मत के लिए पानी के बहाव और मिट्टी की प्रकृति को समझना अनिवार्य है। एसडीआरएफ की टीमों ने बीआरओ को नदी के भीतर उन स्थानों तक पहुँचाया जहाँ से क्षति का सबसे स्पष्ट दृश्य प्राप्त हो सके। तकनीकी मंथन के दौरान यह बात सामने आई कि यदि बेली ब्रिज का विकल्प सफल होता है, तो यह भागलपुर और नवगछिया के बीच के आर्थिक और सामाजिक गतिरोध को तत्काल समाप्त कर देगा।
प्रशासनिक मुस्तैदी: जिलाधिकारी ने संभाली लॉजिस्टिक्स की कमान
बीआरओ की इस बड़ी टीम के आगमन को लेकर भागलपुर जिला प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड में है। जिलाधिकारी नवल किशोर चौधरी ने स्वयं इस पूरे मिशन की निगरानी शुरू कर दी है। प्रशासन ने बीआरओ की 100 सदस्यीय टीम के लिए ठहरने, भोजन, सुरक्षा और तकनीकी संसाधनों की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की है। जिलाधिकारी ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि बीआरओ की टीम को उनके कार्य के दौरान किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या बुनियादी असुविधा नहीं होनी चाहिए।
नवल किशोर चौधरी ने मीडिया से बातचीत में भरोसा जताया कि देश के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरों की उपस्थिति में अब समाधान बहुत दूर नहीं है। उन्होंने कहा कि बीआरओ को हर संभव सहयोग देने के लिए जिला प्रशासन के सभी संबंधित विभागों को अलर्ट कर दिया गया है। टीम के विशेषज्ञों को आवश्यक डेटा, श्रमिक और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध निर्माण सामग्री तुरंत उपलब्ध कराई जा रही है। जिलाधिकारी ने यह भी संकेत दिया कि पुल की मरम्मत के दौरान यातायात प्रबंधन के लिए पुलिस बल की अतिरिक्त तैनाती की जाएगी ताकि काम में कोई बाधा न आए।
आवागमन ठप होने से उपजी चुनौतियां और उम्मीदें
विक्रमशिला सेतु के क्षतिग्रस्त होने का असर केवल यात्रा पर नहीं पड़ा है, बल्कि इसने पूरे उत्तर और दक्षिण बिहार के व्यापारिक संतुलन को हिलाकर रख दिया है। सब्जी, फल, दवाइयां और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होने से कीमतों में उछाल देखा जा रहा था। विशेष रूप से नवगछिया और सीमांचल के इलाकों से आने वाले मरीजों के लिए भागलपुर के अस्पतालों तक पहुँचना एक बड़ी चुनौती बन गया था। ऐसे में बीआरओ का ‘युद्ध स्तर’ पर काम शुरू करना किसी बड़े मिशन से कम नहीं है।
बीआरओ आमतौर पर सीमावर्ती इलाकों और दुर्गम पहाड़ियों में काम करने के लिए जानी जाती है। भागलपुर में उनकी तैनाती यह दर्शाती है कि शासन इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रहा है। विशेषज्ञों की इस टीम में स्ट्रक्चरल इंजीनियर, सॉयल एक्सपर्ट और हाइड्रोलिक विभाग के अनुभवी कर्मी शामिल हैं। इनकी उपस्थिति से यह उम्मीद जगी है कि अब केवल काम नहीं होगा, बल्कि वह काम वैज्ञानिक रूप से इतना सटीक होगा कि भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
भविष्य की रणनीति: मरम्मत के साथ-साथ संरक्षण
बीआरओ की टीम केवल तत्काल राहत पर ही काम नहीं कर रही है, बल्कि वह सेतु के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए भी एक ‘ब्लूप्रिंट’ तैयार कर सकती है। वर्तमान में जो क्षति हुई है, उसका मुख्य कारण अत्यधिक लोड या निर्माण सामग्री की उम्र का होना हो सकता है, जिसकी जांच अब बीआरओ की लैब में की जाएगी।
स्थानीय लोगों और व्यवसायियों ने बीआरओ के आने का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यदि बीआरओ इस काम को अपने हाथ में लेती है, तो गुणवत्ता की पूरी गारंटी होगी। फिलहाल, भागलपुर समाहारणालय से लेकर बरारी घाट तक इंजीनियरों और मशीनों की गूँज सुनाई दे रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि बीआरओ की तकनीकी रिपोर्ट में बेली ब्रिज को लेकर क्या अंतिम निर्णय लिया जाता है। 11 मई की यह शाम भागलपुर के लिए उम्मीदों भरी है, जहाँ गंगा की लहरों पर एक बार फिर रफ़्तार की वापसी के लिए विशेषज्ञ पसीना बहा रहे हैं। प्रशासन और विशेषज्ञों के बीच का यह तालमेल जल्द ही विक्रमशिला सेतु पर लगे ‘ब्रेक’ को हटाने में सफल होगा, ऐसी पूरी संभावना जताई जा रही है।


