​जनता की शिकायतों पर सुस्ती बर्दाश्त नहीं: भागलपुर जिलाधिकारी का सख्त अल्टीमेटम, 72 घंटे में फाइलें निपटाने का आदेश

भागलपुर। प्रशासनिक कार्यशैली में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से भागलपुर के जिलाधिकारी डॉक्टर नवल किशोर चौधरी ने शनिवार, 18 अप्रैल 2026 को कड़ा रुख अख्तियार किया। शहर के समीक्षा भवन में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान जिलाधिकारी ने जन शिकायत निवारण प्रणाली (Public Grievance Redressal System) की धीमी रफ़्तार पर भारी नाराजगी व्यक्त की। समीक्षा के दौरान यह तथ्य उभरकर सामने आया कि जनता की शिकायतों के निष्पादन की गति न केवल असंतोषजनक है, बल्कि कई महत्वपूर्ण मामले हफ्तों से फाइलों में दबे पड़े हैं। इसे ‘लालफीताशाही’ का गंभीर मामला मानते हुए जिलाधिकारी ने बैठक में मौजूद सभी विभाग प्रमुखों और संबंधित पदाधिकारियों को स्पष्ट चेतावनी दी कि शिकायतों के निपटारे में अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने सभी लंबित वादों के निष्पादन के लिए महज दो से तीन दिनों का समय निर्धारित किया है। जिलाधिकारी के इस ‘डेडलाइन’ वाले अंदाज ने जिले के प्रशासनिक महकमे में खलबली मचा दी है, क्योंकि तय समय-सीमा के भीतर मामलों का निपटारा न होने पर दंडात्मक कार्रवाई की तलवार लटक सकती है।

समीक्षा भवन में ‘जीरो टॉलरेंस’ का नजारा

​समीक्षा भवन में आयोजित यह बैठक केवल एक औपचारिक चर्चा नहीं थी, बल्कि यह प्रशासनिक शिथिलता को दूर करने के लिए जिलाधिकारी द्वारा किया गया एक कड़ा प्रहार था। जिलाधिकारी डॉक्टर नवल किशोर चौधरी ने बैठक की शुरुआत में ही विभिन्न विभागों के रिपोर्ट कार्ड खंगाले। जब उन्होंने पाया कि लंबित मामलों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है, तो उन्होंने अधिकारियों से सीधे सवाल किए। उनका स्पष्ट मत था कि जन शिकायत निवारण अधिनियम का उद्देश्य जनता को त्वरित न्याय दिलाना है, न कि उन्हें तारीखों के जाल में उलझाना।

​समीक्षा के क्रम में यह देखा गया कि कुछ विभागों में मामलों के निष्पादन की प्रक्रिया केवल कागजों तक सीमित रह गई है। जिलाधिकारी ने संज्ञान लेते हुए कहा कि जनता जब अपनी समस्या लेकर प्रशासन के पास आती है, तो उसे उम्मीद होती है कि उसकी बात सुनी जाएगी। अगर अधिकारी अपनी फाइलों को लंबित रखते हैं, तो यह सीधे तौर पर सरकार की छवि और लोक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। उन्होंने निर्देश दिया कि जो मामले सरल प्रकृति के हैं, उन्हें तत्काल सुलझाया जाए और जो जटिल हैं, उन पर निरंतर सुनवाई कर दो से तीन दिनों के भीतर अंतिम निर्णय लिया जाए।

पोर्टल पर होगी ‘डिजिटल’ निगरानी: आईटी प्रबंधक को निर्देश

​प्रशासनिक पारदर्शिता को और अधिक पुख्ता बनाने के लिए जिलाधिकारी ने तकनीक का सहारा लेने का निर्णय लिया है। उन्होंने बैठक में ही यह खुलासा किया कि किस कार्यालय के पास कितनी शिकायतें और वाद लंबित हैं, इसका पूरा डेटा तैयार कर लिया गया है। इस डेटा को अब सार्वजनिक और निगरानी योग्य बनाने के लिए आईटी प्रबंधक को विशेष निर्देश दिए गए हैं। जिलाधिकारी ने आदेश दिया कि सभी लंबित और निष्पादित मामलों की जानकारी भागलपुर एडमिनिस्ट्रेशन के आधिकारिक पोर्टल पर तुरंत अपलोड की जाए।

​इस डिजिटल पहल का उद्देश्य यह है कि आम नागरिक भी अपनी शिकायत की वर्तमान स्थिति को देख सकें और वरिष्ठ अधिकारी भी यह ट्रैक कर सकें कि किस स्तर पर फाइल अटकी हुई है। जिलाधिकारी का मानना है कि जब डेटा ऑनलाइन होगा, तो अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ेगी। इससे ‘रियल टाइम मॉनिटरिंग’ संभव हो पाएगी, जिससे भविष्य में शिकायतों के अंबार लगने की नौबत नहीं आएगी। आईटी प्रबंधक को यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया कि पोर्टल पर डेटा अपडेट करने में किसी प्रकार की तकनीकी गड़बड़ी न हो और सूचनाएं सरल भाषा में हों।

विभागवार जवाबदेही तय: इन अधिकारियों की रही मौजूदगी

​बैठक की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिले के लगभग सभी महत्वपूर्ण विभागों के शीर्ष अधिकारी वहां मौजूद थे। जिलाधिकारी ने एक-एक कर सभी से उनके विभाग की लंबित सूची पर जवाब माँगा। बैठक में उपस्थित प्रमुख अधिकारियों में शामिल थे:

  • प्रदीप कुमार सिंह: उप विकास आयुक्त (DDC)
  • दिनेश राम: अपर समाहर्ता (ADM)
  • राकेश रंजन: अपर समाहर्ता विधि व्यवस्था
  • धीरेंद्र कुमार: जिला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी
  • नागेंद्र कुमार गुप्ता: संयुक्त निदेशक जनसंपर्क
  • जनार्दन प्रसाद सिंह: जिला परिवहन पदाधिकारी
  • विकास कुमार: अनुमंडल पदाधिकारी सदर
  • डॉक्टर अशोक कुमार: सिविल सर्जन
  • राजकुमार शर्मा: जिला शिक्षा पदाधिकारी

​इनके अलावा अन्य कई विभागों के पदाधिकारी और सहायक कर्मी भी मौजूद थे। जिलाधिकारी ने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन विभाग के अधिकारियों से विशेष रूप से कहा कि उनके विभागों से जुड़ी शिकायतें सीधे तौर पर आम आदमी के जीवन को प्रभावित करती हैं, इसलिए उनमें देरी करना न्याय से वंचित करने जैसा है। सिविल सर्जन को स्वास्थ्य केंद्रों की शिकायतों पर और जिला शिक्षा पदाधिकारी को स्कूलों से जुड़ी समस्याओं पर त्वरित संज्ञान लेने को कहा गया।

तीन दिन का ‘अल्टीमेटम’ और प्रशासनिक अनुशासन

​जिलाधिकारी डॉक्टर नवल किशोर चौधरी द्वारा दिया गया 72 घंटे का समय जिले के अधिकारियों के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। उन्होंने साफ कर दिया कि अगली समीक्षा बैठक से पहले सभी लंबित वादों के आगे ‘निष्पादित’ का टैग लग जाना चाहिए। जिलाधिकारी ने कहा कि प्रशासनिक अनुशासन तभी बना रह सकता है जब हर स्तर का अधिकारी अपनी जिम्मेदारी समझे।

​अपर समाहर्ता और अनुमंडल पदाधिकारी को अपने-अपने क्षेत्रों के अंचलों और प्रखंडों की भी निगरानी करने के निर्देश दिए गए। अक्सर देखा जाता है कि जमीन संबंधी विवाद या स्थानीय विकास की शिकायतें निचले स्तर पर ही अटकी रहती हैं। जिलाधिकारी ने चेतावनी दी कि यदि अधीनस्थ अधिकारियों की सुस्ती के कारण जिला स्तर पर मामले लंबित होते हैं, तो संबंधित अधिकारी पर भी विभागीय गाज गिरेगी। भागलपुर प्रशासन अब ‘वेट एंड वॉच’ की नीति त्यागकर ‘एक्शन मोड’ में आ चुका है।

जन शिकायत निवारण: लोकतंत्र की मजबूती का आधार

​बैठक के दौरान जिलाधिकारी ने अधिकारियों को लोकतंत्र में जनता की भूमिका की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी (DGRPO) का कार्यालय केवल फाइलों का मिलान करने के लिए नहीं है, बल्कि यह वह द्वार है जहाँ से आम नागरिक को इंसाफ मिलता है। बिहार सरकार की ‘न्याय के साथ विकास’ की नीति तभी सफल होगी जब जनता की छोटी-छोटी समस्याओं—जैसे राशन कार्ड, पेंशन, नाली-गली विवाद और स्वास्थ्य सेवाओं की शिकायतों—का समय पर समाधान हो।

​उन्होंने संयुक्त निदेशक जनसंपर्क नागेंद्र कुमार गुप्ता को निर्देश दिया कि वे प्रशासन द्वारा किए जा रहे इन सुधारों और त्वरित निष्पादन की जानकारी जनता तक पहुँचाएं ताकि लोगों का सिस्टम पर भरोसा बढ़े। जिलाधिकारी ने कहा कि जब लोगों को पता चलेगा कि उनकी शिकायतों पर 2-3 दिनों के भीतर सुनवाई और फैसला हो रहा है, तो वे दलालों और बिचौलियों के चक्कर में पड़ना बंद कर देंगे।

आगे की राह: क्या सुधरेगी भागलपुर की प्रशासनिक रफ़्तार?

​जिलाधिकारी के इस कड़े रुख के बाद अब सबकी नजरें आगामी तीन दिनों पर टिकी हैं। क्या भागलपुर का प्रशासनिक अमला इस चुनौती को स्वीकार कर पाता है? समीक्षा भवन की इस बैठक ने यह संदेश तो दे दिया है कि अब पुराने ढर्रे पर काम करना मुमकिन नहीं होगा। सम्राट चौधरी की सरकार में जिस तरह से ‘क्विक डिसीजन’ (त्वरित निर्णय) की संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है, भागलपुर जिलाधिकारी की यह बैठक उसी की एक कड़ी नजर आती है।

​IT पोर्टल पर अपलोड होने वाला डेटा अब अधिकारियों की कार्यक्षमता का मापदंड बनेगा। जो अधिकारी बेहतर प्रदर्शन करेंगे, उन्हें सम्मानित किया जा सकता है, लेकिन जो पिछड़ेंगे उनके लिए अब भागलपुर में डगर मुश्किल होने वाली है। 18 अप्रैल 2026 की यह शाम भागलपुर के उन हजारों आवेदकों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है, जिनके आवेदन लंबे समय से धूल फांक रहे थे। फिलहाल, समीक्षा भवन से निकला यह फरमान अब जिले के हर सरकारी दफ्तर की दीवारों पर गूँज रहा है।

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