​बांका की पहाड़ियों से निकलेगा ‘काला सोना’: झारखंड के पाकुड़ पर निर्भरता होगी खत्म, निर्माण क्षेत्र में क्रांति लाने की तैयारी

भागलपुर/बांका। बिहार के दक्षिण-पूर्वी जिलों में निर्माण कार्यों के लिए अब झारखंड के पाकुड़ जिले की ओर टकटकी लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बांका जिले की पहाड़ियों में छिपे पत्थरों के विशाल भंडार को व्यावसायिक उपयोग के लिए हरी झंडी मिल गई है। राज्य के खनन एवं भूतत्व विभाग ने बांका की डिस्ट्रिक्ट सर्वे रिपोर्ट (डीएसआर) को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है। यह फैसला अंग, कोसी और सीमांचल क्षेत्र के जिलों के लिए एक बड़ी आर्थिक राहत बनकर आया है। अब तक इन क्षेत्रों में ऊँची कीमतों पर झारखंड से पत्थर मंगाए जाते थे, लेकिन अब बांका के अपने लाल और काले पत्थरों से यहां के घर और इमारतें बुलंद होंगी। बांका की यह पर्वत शृंखला पूरे कोसी-सीमांचल बेल्ट में इकलौती ऐसी जगह है, जहाँ इतनी उच्च गुणवत्ता वाले लाल और काले पत्थरों का खजाना मौजूद है।

झारखंड के एकाधिकार पर लगेगी लगाम, घटेगी निर्माण लागत

​पिछले कई दशकों से बिहार के भागलपुर, बांका, मधेपुरा, पूर्णिया और कटिहार जैसे जिलों में निर्माण कार्य मुख्य रूप से झारखंड के पाकुड़ से आने वाले पत्थरों पर निर्भर था। लंबी दूरी तय करने के कारण माल ढुलाई का खर्च (लॉजिस्टिक्स कॉस्ट) काफी बढ़ जाता था, जिससे आम आदमी के लिए घर बनाना महंगा सौदा साबित हो रहा था। अब बांका में खनन शुरू होने से न केवल परिवहन खर्च में भारी कटौती होगी, बल्कि आपूर्ति भी निर्बाध रूप से हो सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर गिट्टी और बोल्डर उपलब्ध होने से निर्माण क्षेत्र में लागत करीब 15 से 20 प्रतिशत तक कम हो सकती है। यह न केवल निजी मकानों के लिए बल्कि राज्य की बड़ी ढांचागत परियोजनाओं जैसे सड़कों और पुलों के निर्माण के लिए भी वरदान साबित होगा।

शंभूगंज की पहाड़ियों में 95 लाख टन का भंडार

​बांका जिले के शंभूगंज प्रखंड स्थित पहाड़ी मौजा में प्रकृति ने अपनी अनमोल दौलत लुटाई है। विभाग द्वारा कराई गई पैमाइश के अनुसार, यहाँ करीब 22 एकड़ क्षेत्र में काला पत्थर (Black Stone) का विशाल पहाड़ फैला हुआ है। भूगर्भीय आंकड़ों के अनुसार, इस एकल स्रोत से लगभग 95 लाख टन गिट्टी, स्टोन चिप्स और बोल्डर प्राप्त किए जा सकते हैं। इस पत्थर को तकनीकी भाषा में ‘सैंड स्टोन’ कहा जाता है, जो अपनी मजबूती और टिकाऊपन के लिए भवन निर्माण में सर्वोत्तम माना जाता है। लाल पत्थरों का भंडार भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जो सजावटी और संरचनात्मक दोनों कार्यों में उपयोगी साबित होगा। खनिज विकास पदाधिकारी बलवंत कुमार ने पुष्टि की है कि शंभूगंज के इन भंडारों की विस्तृत जानकारी डीएसआर में शामिल की गई थी, जिसे अब राज्य सरकार की मंजूरी मिल चुकी है।

राजस्व का नया स्रोत और रोजगार की बहार

​बांका जिला पहले से ही अपने उच्च गुणवत्ता वाले लाल बालू (Sand) के लिए खनन राजस्व का बड़ा स्रोत रहा है। अब पत्थरों के वैध खनन से सरकार की आमदनी में कई गुना वृद्धि होने की उम्मीद है। लेकिन इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ स्थानीय युवाओं को मिलेगा। पहाड़ों से पत्थर निकालने और उन्हें निर्माण योग्य ‘गिट्टी’ या ‘चिप्स’ में बदलने के लिए बड़े पैमाने पर क्रशर मिलें स्थापित की जाएंगी।

संभावित आर्थिक लाभ:

  • प्रत्यक्ष रोजगार: खनन, लोडिंग और परिवहन के क्षेत्र में हजारों स्थानीय लोगों को काम मिलेगा।
  • अप्रत्यक्ष रोजगार: क्रशर यूनिट्स के आसपास ढाबे, मरम्मत की दुकानें और छोटे व्यवसाय पनपेंगे।
  • राजस्व वृद्धि: जिला खनिज कोष (DMF) में करोड़ों रुपये जमा होंगे, जिससे स्थानीय विकास योजनाओं को गति मिलेगी।

पर्यावरण मंजूरी: सिया (SIA) के पाले में गेंद

​प्रशासनिक स्तर पर अब अगली बड़ी चुनौती पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियां प्राप्त करना है। खनन एवं भूतत्व विभाग अब इस पूरी फाइल को राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) को भेजेगा। यहाँ वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ यह सुनिश्चित करेंगे कि खनन की प्रक्रिया से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को कोई स्थायी नुकसान न पहुँचे। धूल नियंत्रण, पौधारोपण और खनन के बाद जमीन के पुनरुद्धार की योजनाओं पर चर्चा की जाएगी। एक बार ‘सिया’ से पर्यावरण स्वीकृति (Environmental Clearance – EC) का अनुमोदन मिल जाने के बाद, विभाग पारदर्शी तरीके से टेंडर प्रक्रिया शुरू करेगा। यह उम्मीद जताई जा रही है कि अगले कुछ महीनों में बांका के पहाड़ों पर क्रशर की आवाजें गूँजने लगेंगी।

अंग और सीमांचल का ‘मिनरल हब’ बनेगा बांका

​भौगोलिक दृष्टिकोण से बांका की स्थिति अत्यंत सामरिक है। यहाँ से उत्पादित पत्थर आसानी से गंगा पार कर भागलपुर के रास्ते कोसी और सीमांचल के जिलों तक पहुँचाए जा सकते हैं। बांका का यह पर्वत शृंखला क्षेत्र अब बिहार के नए ‘मिनरल हब’ के रूप में उभर रहा है। अभी तक बांका केवल खेती और छोटे उद्योगों के लिए जाना जाता था, लेकिन अब यह राज्य के खनिज मानचित्र पर एक चमकता हुआ सितारा बनकर उभरेगा। शंभूगंज के अलावा अन्य संभावित क्षेत्रों की भी खोज की जा रही है जहाँ इसी प्रकार के भंडार हो सकते हैं।

प्रशासनिक तत्परता और भविष्य की राह

​खनिज विकास पदाधिकारी बलवंत कुमार के अनुसार, विभाग की प्राथमिकता प्रक्रिया को पारदर्शी और त्वरित बनाने की है। डीएसआर की मंजूरी इस दिशा में पहली और सबसे महत्वपूर्ण बाधा थी, जिसे पार कर लिया गया है। अब पूरा ध्यान ‘ईसी’ प्राप्त करने और फिर तकनीकी बोलियां आमंत्रित करने पर है। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि खनन पट्टों का आवंटन उन्हीं कंपनियों को हो जिनके पास अत्याधुनिक तकनीक और पर्यावरण सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हों। निर्माण क्षेत्र के ठेकेदारों और आम नागरिकों में इस खबर से उत्साह है, क्योंकि उन्हें अब सस्ती और गुणवत्तापूर्ण निर्माण सामग्री अपने ही घर के पास मिल सकेगी।

​बांका के पत्थरों ने बिहार की आत्मनिर्भरता की ओर एक नया कदम बढ़ाया है। झारखंड पर निर्भरता खत्म होना न केवल आर्थिक सफलता है, बल्कि बिहार के अपने संसाधनों के बेहतर दोहन की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि भी है। शंभूगंज के काले पहाड़ अब केवल भौगोलिक निशान नहीं, बल्कि बिहार की प्रगति के नए आधार स्तंभ बनने जा रहे हैं।

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