
पटना/बेउर। बिहार की राजधानी पटना, जो सदियों से कला और संस्कृति की उर्वर भूमि रही है, रविवार को एक बार फिर सुरों की चादर में लिपटी नजर आई। बेउर स्थित महावीर कॉलोनी के ‘पप्पू बैंक्वेट हॉल’ में संगीत और कला को समर्पित संस्था ‘सुरीले परिवार’ का चौथा वार्षिकोत्सव अत्यंत गरिमा और भव्यता के साथ संपन्न हुआ। 5 अप्रैल 2026 की यह शाम केवल गीतों और धुनों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह कलाकारों के सम्मान, सरकारी नीतियों और संगीत के जरिए मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने की दिशा में एक बड़ा वैचारिक मंच बनकर उभरी। कार्यक्रम में प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर शहर के उभरते हुए कलाकारों ने एक साथ मिलकर ‘अंगवस्त्र’ और ‘सुरमयी प्रतिभा सम्मान’ के माध्यम से कला की सार्थकता को पुनर्परिभाषित किया।
गणेश वंदना से स्वागत नृत्य तक: एक सुरीली शुरुआत
समारोह का औपचारिक शुभारंभ भारतीय परंपरा के अनुसार आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। नन्दन कुमार सिन्हा ने अपनी ओजस्वी आवाज में गणेश वंदना और सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर पूरे हॉल को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। वंदना की स्वरलहरियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि ‘सुरीले परिवार’ का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की जड़ों को सींचना है।
वंदना के तुरंत बाद आशी कंठ ने अपनी नृत्यांगना शैली में ‘स्वागत नृत्य’ प्रस्तुत किया। नूपुरों की झंकार और सधे हुए पदचापों के माध्यम से अतिथियों का अभिनंदन किया गया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में गृह विभाग के सचिव और कला संस्कृति विभाग के सह सचिव प्रणव कुमार, विशिष्ट अतिथि के रूप में जिला प्रोबेशन पदाधिकारी अवनीश कुमार और इंदु प्रसाद की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को प्रशासनिक और सामाजिक महत्व प्रदान किया।
गीतों का सफ़र: ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ से ‘मेरा जूता है जापानी’ तक
सांगीतिक प्रस्तुतियों की कड़ी में विविधता का अनूठा संगम देखने को मिला। नीलम रानी ने जब अपनी सुरीली आवाज में सदाबहार गीत ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के बोल छेड़े, तो हॉल तालियों की गूँज से भर उठा। यह प्रस्तुति भारतीय शास्त्रीय और सुगम संगीत के बीच के सेतु की तरह थी। इसके बाद मंच संभाला प्रमोद कुमार सिन्हा ने, जिन्होंने राज कपूर के कालजयी गीत ‘मेरा जूता है जापानी’ को अपने अंदाज में गाकर पुरानी यादों को ताजा कर दिया।
समूह गायन के सत्र में प्रमोद कुमार सिन्हा, अशोक कुमार और नन्दन कुमार सिन्हा की जुगलबंदी ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। इन प्रस्तुतियों ने साबित कर दिया कि संगीत की कोई उम्र नहीं होती और ‘सुरीले परिवार’ जैसे मंच वरिष्ठ और युवा कलाकारों को एक साथ लाकर एक समृद्ध ‘कल्चरल एक्सचेंज’ कर रहे हैं।
प्रशासनिक संवाद: साहित्य, संगीत और सरकारी योजनाओं का सेतु (विशेष विश्लेषण)
द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मुख्य अतिथि प्रणव कुमार का संबोधन रहा। उन्होंने महाकवि भर्तृहरि के प्रसिद्ध श्लोक “साहित्य संगीत कला विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छ विषाणहीनः” के माध्यम से यह संदेश दिया कि कला के बिना मानव जीवन अधूरा है।
उनके संबोधन के मुख्य बिंदु जो कलाकारों के लिए महत्वपूर्ण हैं:
- वरिष्ठ कलाकार पेंशन योजना: बिहार सरकार की इस योजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि जो कलाकार जीवन भर कला की सेवा करते हैं, उनके बुढ़ापे को सुरक्षित रखने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है।
- ऑनलाइन पंजीकरण: उन्होंने कलाकारों से अपील की कि वे अपना ऑनलाइन पंजीकरण जरूर कराएं ताकि सरकारी डेटाबेस में उनका नाम आए और उन्हें विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों व योजनाओं का सीधा लाभ मिल सके।
- कला का सामाजिक दायित्व: गृह विभाग और कला संस्कृति विभाग के अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे कला समाज में अपराध की प्रवृत्ति को कम कर एक सकारात्मक माहौल बनाने में सहायक होती है।
म्यूजिक थेरेपी: चिकित्सा के रूप में संगीत का उभरता स्वरूप
विशिष्ट अतिथि अवनीश कुमार ने संगीत को केवल कान के सुख से ऊपर उठाकर ‘चिकित्सा’ के धरातल पर रखा। उन्होंने बताया कि आज के तनावपूर्ण युग में संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि ‘म्यूजिक थेरेपी’ (संगीत चिकित्सा) के माध्यम से कई जटिल बीमारियों और मानसिक अवसादों का इलाज किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि गीत, संगीत और नृत्य न केवल कलाकार को ऊर्जा देते हैं, बल्कि सुनने वाले के भीतर भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। बेउर जैसे शहरी इलाकों में इस तरह के सांस्कृतिक आयोजनों की आवश्यकता इसलिए भी है ताकि समुदाय में आपसी मेलजोल और शांति बनी रहे।
सम्मान समारोह: प्रतिभाओं का मनोबल बढ़ाने का प्रयास
कार्यक्रम का सबसे भावुक और गौरवपूर्ण क्षण वह था जब मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथियों ने प्रतिभागी कलाकारों को ‘अंगवस्त्र’ और ‘सुरमयी प्रतिभा सम्मान’ से नवाजा। यह सम्मान उन घंटों की मेहनत और रियाज की स्वीकृति थी जो एक कलाकार पर्दे के पीछे करता है। संस्था के मुख्य संरक्षक रंजन कुमार श्रीवास्तव और पुष्पलता श्रीवास्तव ने इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी की और यह सुनिश्चित किया कि हर प्रतिभा को मंच पर सम्मान मिले।
समारोह में आलोक रंजन, दयानंद, अचल, राजेश, राजीव कंठ, प्रवीण, विद्यानंद, विनीत, मनीष, प्रिंस, रविंद्र, सोनी प्रिया कंठ, बबली, संध्या, रजनी, दीपाली, अभिलाषा, आकांक्षा, नन्दन कुमार सिन्हा, नीलम रानी, प्रमोद कुमार सिन्हा, रंजन श्रीवास्तव और राजन कुमार सिन्हा जैसे कलाकारों ने एकल और युगल गीतों की एक के बाद एक बेहतरीन प्रस्तुतियाँ देकर कार्यक्रम को यादगार बना दिया।
द वॉयस ऑफ बिहार का विशेष विश्लेषण: स्थानीय संगठनों की भूमिका
पटना जैसे महानगरों में जहाँ पश्चिमी संस्कृति का बोलबाला बढ़ रहा है, ‘सुरीले परिवार’ जैसे छोटे लेकिन सक्रिय संगठन भारतीय सुगम संगीत और लोक धुनों को बचाने का कार्य कर रहे हैं। प्रमोद कुमार सिन्हा (मुख्य संचालक), नीलम रानी (सह संचालिका) और राजन कुमार सिन्हा (सह संचालक) के नेतृत्व में यह संस्था पिछले चार वर्षों से निरंतर कलाकारों को मंच प्रदान कर रही है। सरकार की पेंशन और पंजीकरण योजनाओं की जानकारी इस मंच से दिया जाना यह बताता है कि यह परिवार केवल गायन तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने सदस्यों के सामाजिक और आर्थिक हितों के प्रति भी जागरूक है।
समापन और नई उम्मीदें
वार्षिकोत्सव का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जहाँ आयोजन समिति ने सभी अतिथियों और दर्शकों के प्रति आभार व्यक्त किया। चतुर्थ वार्षिकोत्सव ने यह स्पष्ट कर दिया कि पटना के बेउर और आसपास के इलाकों में कला की भूख अभी भी जिंदा है। ‘सुरीले परिवार’ ने अपने चौथे साल के इस पड़ाव पर यह संकल्प लिया है कि वे आने वाले समय में और भी अधिक प्रतिभाओं को तराशने और उन्हें मुख्यधारा के मंच तक पहुँचाने का काम जारी रखेंगे।


