​पटना में डिजिटल न्याय और कानूनी मेधा का महासंग्राम: सीएनएलयू में संपन्न हुई राष्ट्रीय मूट कोर्ट प्रतियोगिता, साइबर कानून और एआई पर दिल्ली विश्वविद्यालय ने मारी बाजी

पटना। बिहार की राजधानी और न्यायशास्त्र के प्रमुख केंद्र चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (सीएनएलयू) में रविवार, 5 अप्रैल 2026 को वैचारिक क्रांति और कानूनी दांव-पेच का एक ऐसा मंच सजा, जिसने भविष्य की डिजिटल न्याय प्रणाली की तस्वीर साफ कर दी। सूचना प्रावैधिकी विभाग, बिहार सरकार के सक्रिय सहयोग से आयोजित ‘4वीं सीएनएलयू नेशनल मूट कोर्ट प्रतियोगिता-2026’ का सफल समापन हुआ। यह आयोजन केवल एक प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि यह विधि शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय की दिशा में बिहार का एक बड़ा कदम है। देश के विभिन्न कोनों से आई मेधावी टीमों ने यहाँ न केवल अदालती कार्यवाही की बारीकियों को समझा, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा जैसे जटिल कानूनी विषयों पर अपनी दलीलों से न्यायविदों को अचंभित कर दिया।

तकनीक और कानून का संगम: सूचना प्रावैधिकी विभाग की नई पहल

​वर्तमान समय में कानून की परिभाषाएं केवल किताबों तक सीमित नहीं रह गई हैं। जैसे-जैसे तकनीक विकसित हो रही है, कानूनी चुनौतियां भी ‘डिजिटल’ होती जा रही हैं। इसी दूरदर्शिता को ध्यान में रखते हुए बिहार सरकार के सूचना प्रावैधिकी विभाग ने इस राष्ट्रीय मूट कोर्ट को अपना समर्थन दिया। इस पहल का उद्देश्य युवाओं को उभरते साइबर कानून और डिजिटल न्याय प्रणाली के प्रति न केवल जागरूक करना है, बल्कि उन्हें इस क्षेत्र में पेशेवर रूप से दक्ष बनाना भी है। राज्य में विधि और प्रौद्योगिकी के इस समन्वित विकास को विशेषज्ञों ने बिहार के युवाओं के लिए एक बड़े अवसर के रूप में देखा है।

फैजान मुस्तफा का वैचारिक दर्शन: किताबी ज्ञान से ‘व्यावहारिक युद्ध’ तक

​सीएनएलयू की मूट कोर्ट कमेटी के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का मार्गदर्शन कुलपति और प्रख्यात विधिवेत्ता प्रो. (डॉ.) फैजान मुस्तफा ने किया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए फैजान मुस्तफा ने विधि शिक्षा की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ते हुए व्यावहारिक अनुभव पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मूट कोर्ट जैसी प्रतियोगिताएं छात्रों के लिए एक ‘व्यावहारिक युद्धक्षेत्र’ की तरह होती हैं, जहाँ वे न्यायिक प्रक्रिया की व्यावहारिक समझ हासिल करते हैं। मुस्तफा के अनुसार, एक सफल वकील बनने के लिए केवल धाराओं का ज्ञान पर्याप्त नहीं है; तर्कशक्ति, गहन शोध क्षमता और सूक्ष्म अभिव्यक्ति कौशल ही उसे भीड़ से अलग करते हैं। उन्होंने ऐसे आयोजनों को छात्रों के समग्र व्यक्तित्व विकास और उनके पेशेवर भविष्य की नींव बताया। इस पूरे आयोजन को सुचारू रूप से संचालित करने में मूट कोर्ट कमेटी के संकाय संयोजक डॉ. विजय कुमार विमल (सहायक प्रोफेसर) की रणनीतिक भूमिका रही, जिन्होंने कुलपति के मार्गदर्शन में देश भर की टीमों के बीच समन्वय स्थापित किया।

52 टीमों का वैचारिक संघर्ष: जब साइबर लॉ और एआई पर हुई बहस (विशेष विश्लेषण)

द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, इस प्रतियोगिता का स्तर और इसकी थीम इसे अन्य मूट कोर्ट आयोजनों से अलग बनाती है। राष्ट्रीय स्तर की इस प्रतियोगिता में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों से कुल 52 टीमों ने शिरकत की।

प्रतियोगिता के मुख्य आकर्षण:

  1. जटिल कानूनी मुद्दे: इस बार के ‘मूट प्रॉब्लम’ (वाद विषय) में समकालीन कानूनी चुनौतियों को केंद्र में रखा गया था। इसमें मुख्य रूप से साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से उत्पन्न होने वाले कानूनी उत्तरदायित्वों पर बहस हुई।
  2. तर्क और विश्लेषण: प्रतिभागियों ने केवल कानून का हवाला नहीं दिया, बल्कि तकनीक की बारीकियों और अंतरराष्ट्रीय न्यायिक दृष्टांतों का उपयोग करते हुए अपने पक्ष प्रस्तुत किए। निर्णायक मंडल ने स्वीकार किया कि युवा पीढ़ी तकनीकी अपराधों और डिजिटल न्यायशास्त्र को लेकर काफी गहराई से शोध कर रही है।
  3. व्यावहारिक कौशल: छात्रों ने अदालती शिष्टाचार, जिरह करने की कला और न्यायाधीशों के तीखे सवालों का जवाब देने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया, जो किसी वास्तविक उच्च न्यायालय की कार्यवाही जैसा आभास दे रहा था।

फाइनल राउंड: दिल्ली विश्वविद्यालय का स्वर्णिम प्रदर्शन

​कई दौर के कड़े मुकाबलों और सेमीफाइनल की अग्निपरीक्षा के बाद, प्रतियोगिता का फाइनल राउंड बेहद रोमांचक रहा। अंतिम मुकाबले में दिल्ली विश्वविद्यालय की टीम ने अपने असाधारण तर्कों और विधिक विश्लेषण के आधार पर निर्णायक मंडल का दिल जीत लिया और विजेता की ट्रॉफी अपने नाम की। दिल्ली विश्वविद्यालय की जीत ने एक बार फिर साबित किया कि राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कानूनी शोध क्षमता अत्यंत प्रभावशाली है। प्रतियोगिता के दौरान उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले अन्य प्रतिभागियों और टीमों को भी विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कृत किया गया, जिससे उनका मनोबल बढ़ा।

निर्णायक मंडल: न्याय और कॉर्पोरेट जगत के दिग्गजों की मौजूदगी

​किसी भी मूट कोर्ट की साख उसके जजों के पैनल से तय होती है। सीएनएलयू ने इस मामले में एक बेंचमार्क स्थापित किया। निर्णायक मंडल में उड़ीसा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश और पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर शामिल थे, जिनकी उपस्थिति ने छात्रों को कानून की मर्यादा और गहराई का पाठ पढ़ाया।

​उनके साथ कॉर्पोरेट और अकादमिक जगत के दिग्गजों ने भी बेंच साझा की:

  • शालिनी सती प्रसाद: पार्टनर, जे. सागर एसोसिएट्स (JSA) – इन्होंने छात्रों को कॉर्पोरेट जगत की कानूनी चुनौतियों से अवगत कराया।
  • अशोक पी. वाडजे: एसोसिएट प्रोफेसर एवं प्रॉक्टर, महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, औरंगाबाद।
  • कुणाल कपूर: एसोसिएट पार्टनर, लक्ष्मीकुमारन एंड श्रीधरन (LKS अटॉर्नी) – इन्होंने विशेष रूप से बौद्धिक संपदा और तकनीकी कानूनों पर छात्रों को परखा।
  • प्रो. (डॉ.) मनवेंद्र कुमार तिवारी: प्रोफेसर, सीएनएलयू – जिन्होंने स्थानीय स्तर पर अकादमिक मानकों को बनाए रखा।

डिजिटल न्याय प्रणाली की दिशा में बिहार का ‘विजन’

​5 अप्रैल 2026 की यह शाम सीएनएलयू और बिहार के सूचना प्रावैधिकी विभाग के लिए एक ऐतिहासिक सफलता के रूप में दर्ज हो गई है। यह प्रतियोगिता न केवल छात्रों के लिए सीखने का अवसर थी, बल्कि यह राज्य सरकार की उस प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है जहाँ वह तकनीक (IT) और न्याय (Law) को साथ लेकर चलना चाहती है। आने वाले समय में जब साइबर कानून और एआई आधारित न्याय प्रणालियां वैश्विक स्तर पर प्रभावी होंगी, तब इस प्रतियोगिता से निकले प्रतिभागी बिहार और देश का नाम रोशन करेंगे।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस सफल आयोजन के लिए सीएनएलयू प्रबंधन और बिहार सरकार की सराहना करती है। हमारा मानना है कि ऐसे आयोजनों से न केवल शिक्षा का स्तर सुधरता है, बल्कि समाज को भविष्य के कुशल और जागरूक न्यायविद भी मिलते हैं।

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