बिहार में ‘स्वच्छता की नई क्रांति’: बिजली विभाग के 65 कार्यालयों की चमक बढ़ाएंगी जीविका दीदियां; 7000 महिलाओं को मिला सम्मानजनक रोजगार, सशक्तिकरण का बना अनूठा मॉडल

  • ​बिहार के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव लाते हुए ‘जीविका दीदियां’ अब स्वच्छता दूत के रूप में नई पहचान बना रही हैं, जिससे सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली और स्वच्छता दोनों में बड़ा सुधार देखने को मिल रहा है।
  • ​दक्षिण बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (एसबीपीडीसीएल) और जीविका के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते के तहत अब बिजली विभाग के 65 प्रमुख कार्यालयों के रखरखाव और सफाई की कमान प्रशिक्षित ग्रामीण महिलाओं के हाथों में होगी।
  • ​इस पहल से न केवल बिहार के 7000 से अधिक ग्रामीण परिवारों को स्थायी आजीविका मिली है, बल्कि महिलाओं की मासिक आय में 8,000 से 12,000 रुपये तक की वृद्धि सुनिश्चित हुई है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित हो रही है।
  • ​स्वास्थ्य विभाग और शिक्षा विभाग के बाद अब ऊर्जा विभाग में जीविका समूहों का प्रवेश यह दर्शाता है कि बिहार सरकार ‘महिला केंद्रित विकास’ (Women-Led Development) को प्रशासन के हर स्तर पर लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • ​वर्तमान में प्रदेश की 700 से अधिक सरकारी इकाइयों में जीविका दीदियां अपनी सेवाएं दे रही हैं, जो यह प्रमाणित करता है कि अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं प्रबंधन और व्यावसायिक कुशलता में किसी भी निजी एजेंसी से बेहतर परिणाम दे सकती हैं।

पटना, 06 अप्रैल 2026 (द वॉयस ऑफ बिहार)।

चूल्हे-चौके से दफ्तर के प्रबंधन तक: जीविका दीदियों का नया सफर

बिहार की ग्रामीण महिलाओं ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे केवल घर की चारदीवारी तक सीमित रहने के लिए नहीं बनी हैं। ‘जीविका’ (ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति) के माध्यम से शुरू हुआ स्वरोजगार का यह सफर अब पेशेवर सेवाओं के क्षेत्र में कदम रख चुका है। 6 अप्रैल 2026 को पटना में हुई घोषणा के अनुसार, दक्षिण बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (एसबीपीडीसीएल) के 65 कार्यालयों में अब साफ-सफाई का पूरा जिम्मा जीविका दीदियों ने संभाल लिया है। यह कदम न केवल दफ्तरों को स्वच्छ बनाएगा, बल्कि उन हजारों महिलाओं के जीवन में आत्मविश्वास और आर्थिक स्वतंत्रता का नया उजाला फैलाएगा जो अब तक केवल असंगठित क्षेत्रों में मजदूरी करने को मजबूर थीं।

एसबीपीडीसीएल और जीविका के बीच ‘पावरफुल’ समझौता

बिजली विभाग के कार्यालयों में स्वच्छता के स्तर को सुधारने और ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के मुख्यधारा से जोड़ने के लिए एसबीपीडीसीएल और जीविका के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस समझौते के तहत, 65 कार्यालयों में सफाई कर्मियों की नियुक्ति के बजाय जीविका समूहों को आउटसोर्सिंग का काम दिया गया है। इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म हो गई है और भुगतान सीधे महिलाओं के समूह (SHG) के खातों में जा रहा है। विभागीय अधिकारियों का अनुभव है कि बाहरी निजी एजेंसियों की तुलना में जीविका दीदियां काम के प्रति अधिक समर्पित और ईमानदार रहती हैं, जिससे कार्यालयों की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया जा रहा है।

7000 महिलाओं के घरों में खुशहाली: रोजगार के आंकड़े

आंकड़ों के नजरिए से देखें तो यह पहल बिहार के ग्रामीण विकास के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। वर्तमान में राज्य भर में 700 से अधिक सरकारी और अर्ध-सरकारी इकाइयों में जीविका दीदियां अपनी सेवाएं प्रदान कर रही हैं। इस नेटवर्क के माध्यम से अब तक 7000 से अधिक महिलाओं को सीधे तौर पर रोजगार मिला है। सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनकी आय का है। इन दीदियों को हर महीने ₹8,000 से ₹12,000 तक का मानदेय मिल रहा है। यह राशि न केवल उनके परिवार के पालन-पोषण में मदद कर रही है, बल्कि बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाले निवेश को भी बढ़ा रही है। यह आर्थिक मजबूती उन्हें समाज में एक सम्मानित स्थान दिला रही है।

स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में पहले ही लहरा चुकी हैं परचम

बिजली विभाग से पहले जीविका दीदियों ने स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर एक सफल मॉडल पेश किया था। बिहार सरकार के साथ हुए समझौते के तहत राज्य के मेडिकल कॉलेजों, जिला अस्पतालों और अनुमंडल अस्पतालों में ‘दीदी की रसोई’ के साथ-साथ साफ-सफाई का कार्य भी उनके द्वारा ही किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, राज्य के सभी आवासीय अनुसूचित जाति/जनजाति विद्यालयों, पिछड़ा एवं अतिपिछड़ा वर्ग के आवासीय विद्यालयों और अल्पसंख्यक आवासीय विद्यालयों में भी स्वच्छता और भोजन की जिम्मेदारी जीविका समूहों को सौंपी गई है। नॉर्थ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (NBPDCL) के कार्यालयों में भी यह व्यवस्था पहले से ही सफलतापूर्वक संचालित हो रही है, जिससे अब पूरे प्रदेश के बिजली विभाग में एकरूपता आ गई है।

गुणवत्ता और सुशासन का समन्वय

प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो सरकारी कार्यालयों में स्वच्छता हमेशा से एक चुनौती रही है। ठेकेदारी प्रथा के कारण अक्सर सफाई कर्मियों को उनका पूरा हक नहीं मिलता था और काम की गुणवत्ता भी संदिग्ध रहती थी। लेकिन जीविका समूहों के आने से एक ‘चेक एंड बैलेंस’ सिस्टम तैयार हो गया है। ये महिलाएं अपने स्वयं सहायता समूह के प्रति जवाबदेह होती हैं, जिससे काम में लापरवाही की गुंजाइश खत्म हो जाती है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि जीविका दीदियों के आने से दफ्तरों का माहौल अधिक अनुशासित और स्वच्छ हुआ है। यह मॉडल न केवल सुशासन (Good Governance) को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि सार्वजनिक सेवाओं में जनता के विश्वास को भी मजबूत कर रहा है।

ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार का विजन

बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे ‘आत्मनिर्भर बिहार’ की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है। मंत्री के अनुसार, सरकारी कार्यालयों में स्वच्छता का काम जीविका समूहों को सौंपना महिला सशक्तिकरण, रोजगार सृजन और सेवा गुणवत्ता में सुधार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस पहल के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हुए उन्हें सम्मानजनक आजीविका से जोड़ा जा रहा है। सरकार की योजना है कि भविष्य में इस सफल मॉडल को अन्य महत्वपूर्ण विभागों, जैसे परिवहन, पर्यटन और पुलिस थानों में भी लागू किया जाए, ताकि राज्य की हर सक्षम महिला आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सके।

सामाजिक बदलाव की ओर एक बड़ा कदम

जीविका दीदियों की इस सफलता का प्रभाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। जब एक ग्रामीण महिला सरकारी दफ्तर में जाकर प्रोफेशनल की तरह काम करती है, तो वह अपने गांव की दूसरी महिलाओं के लिए एक ‘रोल मॉडल’ बन जाती है। इससे ग्रामीण समाज में महिलाओं के प्रति नजरिया बदल रहा है। अब उन्हें केवल घर के काम तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें कुशल प्रबंधक के रूप में देखा जा रहा है। यह बदलाव आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है, जहाँ बेटियां स्वावलंबन का पाठ अपने घर से ही सीख रही हैं।

सशक्त महिला, सशक्त बिहार

बिजली विभाग के 65 कार्यालयों में जीविका दीदियों का प्रवेश एक नई शुरुआत है। 7000 महिलाओं का रोजगार से जुड़ना यह दर्शाता है कि बिहार की महिलाएं अब आर्थिक लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। ₹12,000 तक की मासिक आय उनके लिए केवल एक संख्या नहीं, बल्कि उनकी मेहनत और सम्मान का प्रतीक है। सरकार द्वारा इस मॉडल को अन्य संस्थानों में विस्तारित करने की योजना निश्चित रूप से बिहार को ‘महिला सशक्तिकरण’ के राष्ट्रीय मानचित्र पर एक नई ऊंचाई प्रदान करेगी। अगर यही गति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब बिहार की ग्रामीण महिलाएं राज्य की जीडीपी (GDP) में एक निर्णायक हिस्सेदारी रखेंगी।

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