
- बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के प्रशासनिक गलियारों में मंगलवार का दिन एक नई उम्मीद और संतोष की किरण लेकर आया, जहां वर्षों से अपने हक की राशि के लिए भटक रहे 15 सेवानिवृत्त कर्मचारियों को आखिरकार उनका बकाया सेवांत लाभ मिल गया।
- बोर्ड के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा ने अपने कार्यालय कक्ष में आयोजित एक गरिमापूर्ण कार्यक्रम के दौरान इन कर्मचारियों को उनके सेवांत लाभ के चेक सौंपे, जिससे सालों से लंबित आर्थिक बाधाओं का अंत हुआ।
- लंबे इंतजार के बाद मिली इस सफलता से न केवल संबंधित कर्मचारियों के परिवारों में उत्सव का माहौल है, बल्कि बोर्ड के अन्य कर्मियों के बीच भी प्रशासन के प्रति विश्वास बहाली हुई है।
- इस अवसर पर बोर्ड के सचिव नीरज कुमार सहित कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे, जिन्होंने इस कदम को संस्थान की कार्यसंस्कृति में सुधार और कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाने वाला एक ऐतिहासिक निर्णय बताया।
- अध्यक्ष ने स्पष्ट संदेश दिया है कि भविष्य में किसी भी कर्मचारी के वैधानिक लाभों को फाइलों के बोझ तले दबने नहीं दिया जाएगा और त्वरित निष्पादन की प्रक्रिया जारी रहेगी।
पटना (द वॉयस ऑफ बिहार)।
इंतजार की घड़ियां खत्म: जब हक का पैसा बना बुढ़ापे की लाठी
सरकारी तंत्र में अक्सर सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों के लिए कर्मचारियों को दफ्तरों के अनगिनत चक्कर लगाने पड़ते हैं। बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के 15 कर्मचारियों की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। ये वे लोग थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन संस्कृत शिक्षा के उत्थान और बोर्ड के संचालन में खपा दिया, लेकिन जब विश्राम की बारी आई, तो उनके अपने ही हक की राशि ‘सिस्टम’ की पेचीदगियों में उलझकर रह गई। वर्षों तक ये कर्मचारी फाइलें आगे बढ़ाने की मिन्नतें करते रहे, लेकिन मंगलवार को पटना स्थित बोर्ड कार्यालय में परिदृश्य पूरी तरह बदला हुआ था। बोर्ड अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा की पहल पर आयोजित इस चेक वितरण कार्यक्रम ने उन 15 परिवारों के चेहरों पर मुस्कान लौटा दी, जो आर्थिक तंगी के कारण कई महत्वपूर्ण सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में असमर्थ महसूस कर रहे थे।
भावुक क्षण: चेक थामते ही याद आए संघर्ष के दिन
कार्यक्रम के दौरान जैसे ही अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा ने एक-एक कर कर्मचारियों का नाम पुकारा और उन्हें चेक सौंपा, कक्ष का वातावरण भावुक हो उठा। कई कर्मचारी ऐसे थे जिनकी उम्र के साथ स्वास्थ्य ने भी साथ छोड़ना शुरू कर दिया था। चेक प्राप्त करने वाले कुछ बुजुर्ग कर्मियों की आंखों में आंसू साफ देखे जा सकते थे। उनके लिए यह केवल एक कागज का टुकड़ा या धन की प्राप्ति नहीं थी, बल्कि उनकी सालों की सेवा का सम्मान था। इन कर्मचारियों ने बताया कि सेवांत लाभ न मिलने के कारण किसी को अपनी बेटी की शादी के लिए कर्ज लेना पड़ा था, तो कोई अपने गंभीर रोगों के इलाज के लिए पाई-पाई को मोहताज था। मंगलवार को मिला यह चेक उनके लिए बुढ़ापे की उस लाठी की तरह है, जिसके सहारे वे अब अपना शेष जीवन गरिमा के साथ व्यतीत कर सकेंगे।
अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा की दो टूक: ‘कर्मचारी का अधिकार, बोर्ड की प्राथमिकता’
चेक वितरण के पश्चात उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए बोर्ड के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा ने प्रशासनिक संवेदनशीलता का परिचय दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि सेवांत लाभों के भुगतान में देरी होना कर्मचारियों के प्रति अन्याय के समान है। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति अपनी पूरी सेवा अवधि ईमानदारी से पूरी करता है, तो सेवानिवृत्ति के दिन ही उसे उसके समस्त लाभ मिल जाने चाहिए। झा ने बोर्ड के अधिकारियों को कड़ा निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसी देरी की पुनरावृत्ति न हो। उन्होंने कहा कि बोर्ड का प्राथमिक उद्देश्य केवल परीक्षाओं का संचालन और प्रमाण-पत्र जारी करना ही नहीं है, बल्कि अपने मानव संसाधन की देखभाल करना भी है। उनके अनुसार, यह भुगतान केवल एक शुरुआत है और बोर्ड के भीतर जितने भी अन्य लंबित मामले हैं, उन्हें एक निश्चित समयसीमा के भीतर निपटाने के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा।
सचिव नीरज कुमार का प्रशासनिक विजन: सुदृढ़ होगी कार्यसंस्कृति
बोर्ड के सचिव नीरज कुमार ने भी इस पहल का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि एक खुशहाल कर्मचारी ही संस्थान को बेहतर परिणाम दे सकता है। लंबे समय से लंबित मामलों के निष्पादन से न केवल सेवानिवृत्त कर्मियों को लाभ हुआ है, बल्कि वर्तमान में कार्यरत कर्मचारियों में भी यह सकारात्मक संदेश गया है कि उनकी मेहनत और उनके अधिकारों का मूल्य समझा जा रहा है। सचिव ने बताया कि बोर्ड प्रशासन अब तकनीक का सहारा लेकर ऐसी व्यवस्था बनाने पर विचार कर रहा है जिससे कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होते ही उनके पीएफ, ग्रेच्युटी और अन्य लाभों की गणना स्वतः हो जाए और भुगतान में मानवीय हस्तक्षेप या देरी की गुंजाइश न्यूनतम हो। उन्होंने इसे बोर्ड की छवि सुधारने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया।
संस्कृत शिक्षा बोर्ड के प्रति बढ़ा विश्वास का वातावरण
बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड पिछले कुछ समय से कई चुनौतियों से जूझ रहा था। ऐसे में इस तरह की पारदर्शी और कल्याणकारी कार्रवाई ने संस्थान के प्रति आम जनता और कर्मचारियों के विश्वास को मजबूती दी है। बिहार में संस्कृत शिक्षा का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है और बोर्ड इस विरासत को संजोने का मुख्य केंद्र है। जब बोर्ड अपने कर्मचारियों के प्रति न्यायप्रिय होता है, तो इसका सीधा असर राज्य भर के संस्कृत विद्यालयों के शिक्षकों और छात्रों के मनोबल पर पड़ता है। मंगलवार की इस कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि अगर नेतृत्व दृढ़ हो, तो वर्षों पुरानी फाइलों को भी गतिशील बनाया जा सकता है।
आर्थिक बाधाओं का अंत और सामाजिक सुरक्षा का भरोसा
जिन 15 कर्मचारियों को चेक प्रदान किए गए, उन्होंने सामूहिक रूप से बोर्ड प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया। उनका कहना था कि कई बार उन्हें लगने लगा था कि शायद उनके जीवित रहते यह राशि उन्हें नहीं मिल पाएगी। लेकिन मृत्युंजय कुमार झा की व्यक्तिगत रुचि ने इस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया। इन कर्मचारियों के लिए अब समाज में अपनी जरूरतों के लिए किसी के आगे हाथ फैलाने की नौबत नहीं आएगी। यह भुगतान इस बात का भी प्रमाण है कि राज्य सरकार और उसके अधीन बोर्ड अब अपने वरिष्ठ नागरिकों और पूर्व कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा के प्रति गंभीर हैं।
भविष्य की राह: लंबित मामलों के लिए विशेष डेस्क की तैयारी
अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार झा ने कार्यक्रम के समापन पर यह भी संकेत दिया कि वे बोर्ड के कामकाज को और अधिक ‘यूजर फ्रेंडली’ बनाने जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, बोर्ड में अब एक विशेष शिकायत निवारण डेस्क (Grievance Cell) की स्थापना की जाएगी जो केवल कर्मचारियों के लंबित लाभों और पेंशन संबंधी मामलों को देखेगी। इसका उद्देश्य यह होगा कि किसी भी कर्मचारी को अपने वाजिब हक के लिए अध्यक्ष या सचिव के कार्यालय के चक्कर न काटने पड़ें। यह कदम बिहार के अन्य बोर्डों और निगमों के लिए भी एक नजीर साबित हो सकता है, जहां अक्सर सेवानिवृत्त कर्मी अपने हक की राशि के लिए अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं।
निष्कर्ष: न्याय में देरी अब और नहीं
पटना के बोर्ड कार्यालय में मंगलवार को हुई यह हलचल केवल 15 लोगों के चेक वितरण तक सीमित नहीं है। यह बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में लौटती संवेदना का प्रतीक है। जब एक बुजुर्ग कर्मचारी मुस्कुराते हुए अपने घर लौटता है, तो वह अपने साथ केवल पैसा नहीं, बल्कि सिस्टम के प्रति एक नया भरोसा लेकर जाता है। मृत्युंजय कुमार झा और उनकी टीम ने यह सिद्ध कर दिया है कि फाइलों के पीछे छिपे इंसान की तकलीफ को समझना ही वास्तविक सुशासन है। संस्कृत शिक्षा बोर्ड अब अपनी पुरानी छवि को त्यागकर एक उत्तरदायी और पारदर्शी संस्थान के रूप में उभरने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है।


