राबड़ी देवी के भाई सुभाष यादव को पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत, जमीन विवाद की FIR रद्द; SSP, DSP और थानाध्यक्ष पर जुर्माना

पटना: बिहार की राजनीति से जुड़ी एक अहम कानूनी कार्रवाई में पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के भाई और आरजेडी के पूर्व सांसद सुभाष प्रसाद यादव को पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने जमीन विवाद और कथित धोखाधड़ी मामले में बिहटा थाना में दर्ज प्राथमिकी (FIR) को रद्द कर दिया है। साथ ही न्यायिक प्रक्रिया में गलत तथ्य प्रस्तुत करने पर तत्कालीन पटना SSP, दानापुर DSP और बिहटा थानाध्यक्ष पर 10-10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

हाईकोर्ट ने FIR को किया निरस्त

सुभाष यादव ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने के लिए पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने पहले भी वर्ष 2024 में FIR रद्द कर दी थी, लेकिन मामला बाद में सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने पुनः सुनवाई के लिए मामला हाईकोर्ट को वापस भेजा, जिसके बाद विस्तृत सुनवाई करते हुए अदालत ने फिर से FIR निरस्त करने का फैसला सुनाया।

पुलिस अधिकारियों पर लगा जुर्माना

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि न्यायिक अभिलेखों के विपरीत सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गलत तथ्य प्रस्तुत किए गए थे। अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला गंभीर मामला मानते हुए तत्कालीन पटना SSP, दानापुर DSP और बिहटा थानाध्यक्ष पर 10-10 हजार रुपये का आर्थिक दंड लगाया।

क्या था पूरा मामला?

मामला बिहटा थाना कांड संख्या 425/2023 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता भीम वर्मा ने आरोप लगाया था कि लगभग 96 लाख रुपये मूल्य की जमीन की रजिस्ट्री केवल 60 लाख रुपये में कराई गई और शेष राशि मांगने पर धमकी दी गई तथा पहले दिए गए पैसे भी वापस ले लिए गए। इसी आरोप के आधार पर जमीन की हेराफेरी और रंगदारी का मामला दर्ज कराया गया था।

पुलिस ने की थी कार्रवाई

जनवरी 2024 में अदालत के आदेश पर पुलिस ने राजा बाजार स्थित सुभाष यादव के आवास पर इश्तेहार चस्पा किया था और सरेंडर नहीं करने पर कुर्की-जब्ती की चेतावनी दी थी। इसके बाद 13 फरवरी 2024 को पुलिस कार्रवाई से पहले ही सुभाष यादव ने पटना की एमपी-एमएलए अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

हाईकोर्ट द्वारा FIR रद्द किए जाने के बाद राज्य सरकार और शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। उनका दावा था कि बिना नोटिस दिए मामला निस्तारित कर दिया गया था। हालांकि, पुनः सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच में पाया कि राज्य सरकार के अधिवक्ता और निजी पक्ष पहले से ही अदालत में उपस्थित थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश में अधिवक्ता का नाम दर्ज न होना केवल कार्यालयीय त्रुटि थी।

अदालत की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों और न्यायिक रिकॉर्ड में स्पष्ट विरोधाभास था। अदालत ने इसे गंभीर मानते हुए संबंधित पुलिस अधिकारियों पर जुर्माना लगाया और कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के साथ इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार्य नहीं है।

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