
पटना: बिहार सरकार की ओर से पटना साइंस कॉलेज परिसर में ‘यूनिवर्सिटी ऑफ फिजिक्स एंड साइंसेज’ स्थापित करने की घोषणा ने राज्य के शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की इस महत्वाकांक्षी योजना को विज्ञान शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा कदम बताया जा रहा है, लेकिन छात्रों और शिक्षाविदों का एक वर्ग इसे लेकर गंभीर सवाल भी उठा रहा है।
करीब एक सदी पुराना पटना साइंस कॉलेज, जिसे कभी ‘पूर्व का ऑक्सफोर्ड’ कहा जाता था, अब अपने इतिहास के सबसे बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ा है।
सरकार का दावा: विश्वस्तरीय विज्ञान विश्वविद्यालय बनेगा
सरकार का कहना है कि नए विश्वविद्यालय में अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं, रिसर्च सेंटर, आधुनिक छात्रावास, खेल सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर का शैक्षणिक माहौल विकसित किया जाएगा। उद्देश्य बिहार को विज्ञान और शोध के क्षेत्र में नई पहचान दिलाना है।
छात्रों ने उठाए बुनियादी सवाल
हालांकि कॉलेज के छात्रों का कहना है कि नई यूनिवर्सिटी बनाने से पहले मौजूदा व्यवस्था को सुधारना अधिक जरूरी है।
गणित ऑनर्स के छात्र अंकुश कुमार का कहना है कि केवल फिजिक्स विभाग के नाम पर यूनिवर्सिटी बनाने की अवधारणा स्पष्ट नहीं है। यदि पूरे पटना साइंस कॉलेज को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया जाता तो यह अधिक व्यावहारिक कदम होता।
’24 घंटे में बदल गया कॉलेज का चेहरा’
केमिस्ट्री विभाग के छात्र हर्ष कुमार ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के दौरे से पहले आनन-फानन में कॉलेज की साफ-सफाई और रंग-रोगन किया गया।
उनका कहना है कि वर्षों से जर्जर हालत में पड़े परिसर को सिर्फ निरीक्षण से पहले सजाया गया, जबकि नियमित दिनों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति खराब रहती है।
छात्रों ने समय पर मार्कशीट नहीं मिलने, खराब पोर्टल, लैब की बदहाल स्थिति और प्रशासनिक समस्याओं को भी प्रमुख मुद्दा बताया।
‘पहले पानी और लैब ठीक करिए’
छात्र निशांत कुमार का कहना है कि कॉलेज में पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं हैं। खेल मैदान का हिस्सा मेट्रो निर्माण के कारण प्रभावित है और छात्राओं की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
उनका कहना है कि नाम बदलने से पहले आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाया जाना चाहिए।
राजनीति के आरोप भी लगे
कुछ छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि कॉलेज के विभिन्न विभागों में छात्र राजनीति और राजनीतिक प्रभाव का असर दिखाई देता है। उनका कहना है कि शिक्षा संस्थानों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाना चाहिए।
पूर्व कुलपति ने क्या कहा?
पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रासबिहारी सिंह ने नए विश्वविद्यालय की अवधारणा का स्वागत किया, लेकिन पटना साइंस कॉलेज की ऐतिहासिक पहचान को समाप्त करने पर आपत्ति जताई।
उन्होंने कहा कि पटना साइंस कॉलेज का गौरवशाली इतिहास रहा है और इसे अलग करने से पटना विश्वविद्यालय की शोध क्षमता, छात्र संख्या और राष्ट्रीय रैंकिंग प्रभावित हो सकती है।
क्या केवल फिजिक्स पर आधारित यूनिवर्सिटी सफल होगी?
पूर्व कुलपति ने यह भी सवाल उठाया कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय केवल भौतिकी विभाग तक सीमित रहेगा या इसमें अन्य विज्ञान विषय भी शामिल होंगे।
उन्होंने कहा कि भारत के प्रमुख विज्ञान संस्थान मल्टीडिसिप्लिनरी मॉडल पर आधारित हैं और केवल फिजिक्स विषय पर केंद्रित स्वतंत्र विश्वविद्यालय का मॉडल बेहद सीमित है।
सफलता की सबसे बड़ी शर्त
प्रोफेसर रासबिहारी सिंह का मानना है कि यदि सरकार इस परियोजना को पर्याप्त वित्तीय संसाधन, विश्वस्तरीय फैकल्टी, आधुनिक शोध प्रयोगशालाएं और स्पष्ट शैक्षणिक ढांचे के साथ लागू करती है, तभी यह सफल होगी।
उन्होंने कहा कि केवल नाम बदलने से संस्थान की गुणवत्ता नहीं बढ़ेगी। रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए अत्याधुनिक लैब, सक्षम प्रशासन और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर सबसे बड़ी जरूरत है।
अब सरकार के सामने बड़ी चुनौती
पटना साइंस कॉलेज को नई यूनिवर्सिटी में बदलने की घोषणा बिहार के उच्च शिक्षा क्षेत्र में बड़ा बदलाव साबित हो सकती है। हालांकि छात्रों की बुनियादी चिंताओं और शिक्षाविदों की आपत्तियों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह पहल वास्तव में विज्ञान शिक्षा को नई ऊंचाई देगी या केवल संस्थान की पहचान बदलकर रह जाएगी।


