
भागलपुर में मोहर्रम की 11वीं तारीख पर धार्मिक आस्था, श्रद्धा और मातम का अनोखा दृश्य देखने को मिला। शिया समुदाय की ओर से पारंपरिक अलम का जुलूस निकाला गया, जिसमें बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने भाग लेकर कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। पूरे जुलूस के दौरान या हुसैन और या अली की सदाओं से वातावरण गूंजता रहा। यह जुलूस न केवल धार्मिक महत्व का प्रतीक बना, बल्कि आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का संदेश भी देता नजर आया।
असानंदपुर स्थित बड़ा इमामबाड़ा से अलम का जुलूस निर्धारित समय पर शुरू हुआ। जुलूस निकलने से पहले इमामबाड़ा परिसर में मजलिस का आयोजन किया गया, जिसमें कर्बला की घटना और इमाम हुसैन की शहादत पर विस्तार से चर्चा की गई। उपस्थित लोगों ने कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना को याद किया, जिसमें सत्य, इंसाफ और मानवता की रक्षा के लिए इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अपनी जान कुर्बान कर दी थी।
जुलूस में शामिल लोगों के हाथों में अलम थे, जो कर्बला की याद और हजरत अब्बास की बहादुरी का प्रतीक माने जाते हैं। श्रद्धालु अनुशासन के साथ कतारबद्ध होकर आगे बढ़ रहे थे। पूरे रास्ते मातमी धुन और नोहाखानी का सिलसिला जारी रहा। नोहा पढ़ते हुए अकीदतमंदों की आंखें नम दिखीं और कई लोग गम-ए-हुसैन में मातम करते नजर आए। यह दृश्य श्रद्धा और भावनाओं से भरपूर था।
जुलूस का मार्ग मुस्लिम हाईस्कूल, दाऊदचक और पंखा टोली होते हुए शाहजंगी कर्बला तक निर्धारित किया गया था। रास्ते भर स्थानीय लोगों ने जुलूस का स्वागत किया और जगह-जगह पानी तथा शर्बत की व्यवस्था भी की गई। कई स्थानों पर लोग जुलूस में शामिल श्रद्धालुओं की सेवा करते दिखाई दिए। इससे सामाजिक एकता और सामुदायिक सहयोग की सुंदर तस्वीर सामने आई।
मोहर्रम केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि त्याग, बलिदान और इंसाफ के लिए संघर्ष का संदेश भी देता है। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि कर्बला की घटना आज भी पूरी मानवता को यह सिखाती है कि अन्याय और अत्याचार के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए। इमाम हुसैन ने सत्ता के सामने समझौता करने के बजाय सत्य और न्याय के रास्ते पर चलना चुना, जिसके कारण उनका नाम इतिहास में अमर हो गया।
जुलूस के दौरान सुरक्षा व्यवस्था भी चाक-चौबंद रही। प्रशासन की ओर से मार्ग में पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती की गई थी ताकि आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके। ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए भी विशेष इंतजाम किए गए थे। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी के कारण श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा।
शाहजंगी कर्बला पहुंचने के बाद विदाई मजलिस का आयोजन किया गया। यहां धर्मगुरुओं और समुदाय के वरिष्ठ लोगों ने कर्बला की शहादत पर प्रकाश डाला और इमाम हुसैन के संदेश को आज के समाज के लिए प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन की कुर्बानी केवल मुस्लिम समाज के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन सत्य, साहस और न्याय की मिसाल है।
भागलपुर शिया वक्फ कमेटी के सचिव सैयद जीजाह हुसैन ने बताया कि मोहर्रम का यह जुलूस वर्षों पुरानी परंपरा का हिस्सा है और हर साल श्रद्धा के साथ निकाला जाता है। उन्होंने कहा कि अलम का जुलूस इमाम हुसैन की शहादत को याद करने और उनके संदेश को समाज तक पहुंचाने का माध्यम है। उनका कहना था कि कर्बला का संदेश हर दौर में प्रासंगिक रहेगा क्योंकि यह इंसानियत, समानता और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की सीख देता है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस आयोजन की सबसे खास बात विभिन्न समुदायों के लोगों की भागीदारी रही। जुलूस में केवल शिया समुदाय ही नहीं, बल्कि अन्य समुदायों के लोग भी मौजूद रहे। इससे यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक आयोजन सामाजिक एकता और भाईचारे को मजबूत करने का काम भी करते हैं। भागलपुर की गंगा-जमुनी तहजीब एक बार फिर इस अवसर पर साफ नजर आई।
स्थानीय लोगों का कहना था कि मोहर्रम का यह आयोजन शहर की साझा संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्षों से यहां सभी समुदायों के लोग एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों में सहयोग करते आए हैं। यही परंपरा सामाजिक सौहार्द को मजबूत बनाती है और नई पीढ़ी को आपसी सम्मान का संदेश देती है।
धार्मिक जानकारों के अनुसार, मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसकी 10वीं तारीख यानी आशूरा विशेष महत्व रखती है। हालांकि 11वीं तारीख को निकलने वाला अलम जुलूस भी कई स्थानों पर विशेष धार्मिक परंपरा के तहत आयोजित किया जाता है। इसमें कर्बला की शहादत को याद करते हुए मातम और नोहाखानी की जाती है।
भागलपुर में निकला यह अलम जुलूस धार्मिक आस्था, अनुशासन और भाईचारे का अद्भुत उदाहरण बनकर सामने आया। पूरे आयोजन ने यह संदेश दिया कि धार्मिक परंपराएं केवल आस्था तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि समाज में प्रेम, सम्मान और एकता को भी बढ़ावा देती हैं। मोहर्रम के इस अवसर पर कर्बला के शहीदों को याद करते हुए लोगों ने इंसाफ, इंसानियत और सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।


