
बिहार की महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में शामिल पटना-पूर्णिया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। राज्य के पहले ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे को लेकर समस्तीपुर जिले के सरायरंजन क्षेत्र में रूट परिवर्तन के आरोपों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस मुद्दे को लेकर जन सुराज ने पटना में प्रेस वार्ता आयोजित कर सरकार और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से कई सवाल पूछे हैं। पार्टी नेताओं का आरोप है कि परियोजना के मूल स्वरूप में बदलाव कर कुछ प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया है, जबकि इस बदलाव का खामियाजा स्थानीय लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
जन सुराज के प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में पार्टी की वरिष्ठ नेता पद्मा ओझा, प्रवक्ता विवेक कुमार और प्रवक्ता कैप्टन राजीव रंजन ने संयुक्त रूप से अपनी बात रखी। नेताओं ने दावा किया कि सरायरंजन क्षेत्र के बड़ी संख्या में स्थानीय लोग परियोजना के वर्तमान स्वरूप को लेकर असंतोष जता रहे हैं और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। पार्टी नेताओं ने कहा कि वे विकास परियोजनाओं के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर यदि पारदर्शिता की अनदेखी होती है और आम लोगों की चिंताओं को नजरअंदाज किया जाता है तो सवाल उठाना जरूरी हो जाता है।
प्रेस वार्ता में पद्मा ओझा ने आरोप लगाया कि परियोजना के रूट में बदलाव किसी तकनीकी आवश्यकता के कारण नहीं बल्कि कथित रूप से एक प्रभावशाली व्यक्ति के हितों को ध्यान में रखकर किया गया है। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों का दावा है कि प्रारंभिक प्रस्तावित रूट में एक बड़े भूखंड के प्रभावित होने की संभावना थी, जिसके बाद कथित रूप से मार्ग में परिवर्तन किया गया। उनके अनुसार इस बदलाव के कारण अब कई गांव, बड़ी संख्या में मकान, दुकानें और एक शैक्षणिक संस्थान प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों द्वारा केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री को शिकायत पत्र भेजा गया है, जिसमें पूरे मामले की जांच की मांग की गई है। उनका कहना था कि यदि परियोजना वास्तव में जनहित के लिए बनाई जा रही है तो सरकार को सभी दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि रूट में कोई बदलाव नहीं हुआ है तो प्रारंभिक और अंतिम योजना से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने में क्या आपत्ति है।
जन सुराज नेताओं ने कहा कि ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे जैसी परियोजनाओं का उद्देश्य लोगों को बेहतर परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना और आर्थिक विकास को गति देना होता है। लेकिन यदि किसी परियोजना के कारण बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हो रहे हैं तो उनकी चिंताओं को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए। पार्टी का कहना है कि विकास और जनहित के बीच संतुलन बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है।
प्रेस वार्ता के दौरान प्रवक्ता विवेक कुमार ने भी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य में कई विकास परियोजनाओं को लेकर पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। उनके अनुसार पटना-पूर्णिया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे परियोजना में भी कई बिंदुओं पर स्पष्टता की आवश्यकता है। उन्होंने दावा किया कि परियोजना से संबंधित विभिन्न अधिसूचनाओं और सर्वेक्षणों के बीच कुछ महत्वपूर्ण बदलाव सामने आए हैं, जिनकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
विवेक कुमार ने कहा कि स्थानीय लोगों का आरोप है कि पहले प्रस्तावित रूट और वर्तमान रूट के बीच अंतर है। उनका कहना था कि यदि वास्तव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो सरकार को सभी तकनीकी रिपोर्ट, सर्वेक्षण दस्तावेज और अंतिम स्वीकृत नक्शे सार्वजनिक करने चाहिए। इससे जनता के बीच फैली आशंकाओं को दूर किया जा सकेगा और परियोजना को लेकर पारदर्शिता स्थापित होगी।
जन सुराज ने यह भी मांग की कि जब तक पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हो जाती, तब तक भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पर पुनर्विचार किया जाए। पार्टी नेताओं का कहना है कि प्रभावित लोगों की आपत्तियों और सुझावों को सुनना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि लोगों को लगता है कि उनकी बातों को अनदेखा किया जा रहा है तो इससे परियोजना को लेकर विवाद और बढ़ सकता है।
प्रेस वार्ता में पार्टी नेताओं ने सरकार के सामने दस महत्वपूर्ण सवाल भी रखे। इनमें रूट निर्धारण की प्रक्रिया, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट की उपलब्धता, प्रभावित लोगों की आपत्तियों पर हुई सुनवाई, मुआवजा और पुनर्वास योजना की स्थिति जैसे मुद्दे शामिल थे। पार्टी का कहना है कि इन सवालों के जवाब मिलने से पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
जन सुराज ने यह भी पूछा कि यदि परियोजना पूरी तरह तकनीकी मानकों के आधार पर तैयार की गई है तो स्वतंत्र तकनीकी समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही। साथ ही यह भी सवाल उठाया गया कि क्या सरकार इस बात की स्वतंत्र जांच कराने को तैयार है कि कहीं किसी प्रभावशाली व्यक्ति या राजनीतिक दबाव के कारण परियोजना के रूट में बदलाव तो नहीं किया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की बड़ी अवसंरचनात्मक परियोजनाओं को लेकर अक्सर राजनीतिक बहस होती रही है। ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे जैसी परियोजनाएं राज्य के आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, लेकिन भूमि अधिग्रहण और रूट निर्धारण जैसे मुद्दों पर स्थानीय स्तर पर विवाद भी सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में पारदर्शिता और संवाद की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
पटना-पूर्णिया ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे को बिहार की सबसे महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं में से एक माना जा रहा है। यह परियोजना राज्य के विभिन्न हिस्सों के बीच संपर्क को बेहतर बनाने और यात्रा समय को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके साथ ही व्यापार, निवेश और औद्योगिक गतिविधियों को भी इससे बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। हालांकि वर्तमान विवाद ने परियोजना को राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया है।
फिलहाल सरकार या संबंधित एजेंसियों की ओर से रूट परिवर्तन के आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। दूसरी ओर जन सुराज लगातार इस मुद्दे को उठाते हुए पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन सवालों का क्या जवाब देती है और स्थानीय लोगों की चिंताओं को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे को बिहार के विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता, जनभागीदारी और प्रभावित लोगों के अधिकारों का पूरा सम्मान किया जाए। यही किसी भी बड़ी परियोजना की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।


