विश्व पर्यावरण दिवस पर बीएयू सबौर में उर्वरक खपत घटाने पर मंथन, वैज्ञानिकों ने बताया सतत कृषि का रोडमैप

भागलपुर। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर में कृषि और पर्यावरण से जुड़े एक महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग द्वारा भारतीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग योजना सोसायटी (आईएसएसएलयूपी) के सबौर चैप्टर के सहयोग से “बिहार में उर्वरक खपत को कम करने की रणनीतियाँ” विषय पर विशेष विचार-मंथन सत्र आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों, विद्यार्थियों और विशेषज्ञों ने भाग लेते हुए उर्वरकों के संतुलित उपयोग, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कृषि उत्पादन को प्रभावित किए बिना रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने के लिए वैज्ञानिक, तकनीकी, जैविक और नीतिगत उपायों की संभावनाओं पर विचार करना था। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि यदि आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक प्रबंधन पद्धतियों को अपनाया जाए तो बिहार में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को 20 से 40 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है, जबकि कृषि उत्पादकता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

पौधारोपण के साथ कार्यक्रम का हुआ शुभारंभ

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह द्वारा पौधारोपण से की गई। यह पहल पर्यावरण संरक्षण और सतत कृषि के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता का प्रतीक बनी।

पौधारोपण कार्यक्रम में बिहार कृषि महाविद्यालय (BAC) और कृषि जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय (CABT) के राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के स्वयंसेवकों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। स्वयंसेवकों ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए हरित बिहार के निर्माण का संकल्प लिया।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय परिसर में पर्यावरणीय जागरूकता का विशेष माहौल देखने को मिला। कार्यक्रम में शामिल विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने भी सतत कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में योगदान देने की प्रतिबद्धता जताई।

बढ़ती उर्वरक लागत और मृदा स्वास्थ्य पर चिंता

कार्यक्रम के स्वागत संबोधन में मृदा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. अंशुमान कोहली ने कहा कि वर्तमान समय में किसानों के सामने उर्वरकों की बढ़ती लागत, पोषक तत्वों के उपयोग की घटती दक्षता और मृदा स्वास्थ्य में गिरावट जैसी गंभीर चुनौतियाँ मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि कृषि उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में कई बार उर्वरकों का असंतुलित उपयोग किया जाता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और लंबे समय में कृषि उत्पादन की स्थिरता पर भी असर पड़ता है। इसलिए अब समय आ गया है कि संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को खेती का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।

डॉ. कोहली ने कहा कि मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ किसानों की लागत कम करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद कर सकती हैं।

वैज्ञानिकों ने सुझाए टिकाऊ समाधान

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. बिजय सिंह ने उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

उन्होंने एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management), मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक अनुशंसा और प्रिसिजन न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार वैज्ञानिक तरीके से उर्वरक उपयोग करने पर लागत कम होने के साथ उत्पादन क्षमता भी बरकरार रखी जा सकती है।

कुलपति ने सतत कृषि पर दिया जोर

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने कहा कि बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए टिकाऊ और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि मृदा स्वास्थ्य को सुरक्षित नहीं रखा गया तो भविष्य में कृषि उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं से ऐसी तकनीकों के विकास पर जोर देने का आग्रह किया जो किसानों के लिए व्यावहारिक, कम लागत वाली और पर्यावरण अनुकूल हों। उन्होंने कहा कि बिहार में कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन रणनीतियों को व्यापक स्तर पर अपनाना होगा।

प्राकृतिक खेती और पोषक तत्व पुनर्चक्रण पर चर्चा

तकनीकी सत्र के दौरान विभिन्न विशेषज्ञों ने उर्वरक खपत कम करने के लिए अलग-अलग उपायों पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

प्रो. वी. पी. रमणी ने प्राकृतिक खेती और पोषक तत्व पुनर्चक्रण की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि जैविक संसाधनों का बेहतर उपयोग करके रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि कृषि अवशेषों, जैविक खाद और प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है और किसानों की उत्पादन लागत भी कम करता है।

“मिट्टी की मुस्कान” अवधारणा पर विशेष प्रस्तुति

डॉ. सत्येन्द्र कनौजिया ने “मिट्टी की मुस्कान” अवधारणा के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य सुधार पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मिट्टी को जीवंत बनाए रखना ही सतत कृषि की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

उन्होंने कम लागत वाले जैविक विकल्पों, जैव उर्वरकों और प्राकृतिक पोषक तत्व स्रोतों के उपयोग पर जोर दिया। उनके अनुसार स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ फसल और बेहतर उत्पादन की आधारशिला होती है।

सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों की बढ़ती भूमिका

डॉ. संजय अरोड़ा ने सूक्ष्मजीव आधारित इनोकुलेंट्स की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि लाभकारी सूक्ष्मजीव पौधों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने में मदद करते हैं और उर्वरकों की आवश्यकता को कम कर सकते हैं।

इसी क्रम में डॉ. सरोज कुमार यादव ने प्लांट ग्रोथ प्रमोटिंग राइजोबैक्टीरिया (PGPR) की उपयोगिता पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि ये लाभकारी जीवाणु पौधों की वृद्धि बढ़ाने और पोषक तत्वों की उपलब्धता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कृषि पर चर्चा

कार्यक्रम में आधुनिक तकनीकों पर भी विशेष ध्यान दिया गया। विशेषज्ञ राहुल कुमार ने ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित पोषक तत्व निगरानी प्रणाली का प्रदर्शन किया।

उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीकों की मदद से खेतों की वास्तविक स्थिति का आकलन कर आवश्यकता के अनुसार उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है। इससे न केवल लागत कम होती है बल्कि पर्यावरणीय प्रभाव भी घटता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि भविष्य की कृषि में डिजिटल तकनीकों और डेटा आधारित निर्णय प्रणाली की भूमिका लगातार बढ़ेगी।

भू-स्थानिक और स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीकों की उपयोगिता

डॉ. इंगल सागर नंदुलाल ने भू-स्थानिक तकनीकों की सहायता से पोषक तत्वों की कमी वाले क्षेत्रों की पहचान करने की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इन तकनीकों से क्षेत्र विशेष की मृदा स्थिति को समझना आसान हो जाता है।

वहीं डॉ. भबानी प्रसाद मंडल ने स्पेक्ट्रोस्कोपी आधारित मृदा परीक्षण तकनीक को तेज, कम लागत और सटीक विकल्प बताया। उनके अनुसार यह तकनीक किसानों को सही उर्वरक अनुशंसा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

बिहार में 40 प्रतिशत तक कम हो सकती है उर्वरक खपत

कार्यक्रम के दौरान हुए विचार-विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि वैज्ञानिक प्रबंधन और आधुनिक तकनीकों के समन्वित उपयोग से बिहार में रासायनिक उर्वरकों की खपत को 20 से 40 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

विशेषज्ञों ने कहा कि जैविक उपायों, प्रिसिजन कृषि, भू-स्थानिक तकनीकों, जैव उर्वरकों और मृदा परीक्षण आधारित खेती को अपनाकर किसानों की लागत घटाई जा सकती है तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सकता है।

भविष्य की कृषि नीति के लिए महत्वपूर्ण सुझाव

कार्यक्रम में भाग लेने वाले विशेषज्ञों ने कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए, जिन्हें भविष्य की कृषि नीतियों और कार्ययोजनाओं में शामिल किया जा सकता है। उनका मानना है कि यदि वैज्ञानिक अनुसंधान, किसानों की जागरूकता और सरकारी नीतियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए तो बिहार सतत कृषि के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो सकता है।

विश्व पर्यावरण दिवस पर आयोजित यह विचार-मंथन केवल एक अकादमिक चर्चा नहीं था, बल्कि बिहार की कृषि को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों, वैज्ञानिकों, NSS स्वयंसेवकों और आयोजकों का आभार व्यक्त किया गया तथा सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास जारी रखने का संकल्प लिया गया।

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