
भागलपुर, 20 मई 2026। मनरेगा मजदूरों की देशव्यापी एक दिवसीय हड़ताल के समर्थन में बुधवार को भागलपुर में जोरदार प्रदर्शन किया गया। जगदीशपुर प्रखंड के चांदपुर पंचायत में आयोजित इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष मजदूर शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने मनरेगा को 700 रुपये प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी और साल में 200 दिन काम की गारंटी के साथ पुनर्बहाल करने की मांग उठाई। इसके साथ ही केंद्र सरकार की श्रम नीतियों और नए लेबर कोड्स का भी विरोध किया गया।
प्रदर्शन का आयोजन यानी ऐक्टू के मई अभियान के तहत किया गया। प्रदर्शन में बिहार राज्य निर्माण मजदूर यूनियन और असंगठित कामगार महासंघ से जुड़े सैकड़ों मजदूर शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी करते हुए सरकार से मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करने की मांग की।
प्रदर्शन के दौरान मजदूरों ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है। मनरेगा जैसी योजना, जो ग्रामीण गरीबों के लिए रोजगार का बड़ा सहारा थी, अब कमजोर होती जा रही है। मजदूर संगठनों का आरोप है कि सरकार रोजगार गारंटी कानून को प्रभावी तरीके से लागू नहीं कर रही है।
प्रदर्शन का नेतृत्व ऐक्टू के राज्य सह जिला सचिव , जिला संयुक्त सचिव , बिहार राज्य निर्माण मजदूर यूनियन के जिला उपाध्यक्ष और तथा असंगठित कामगार महासंघ की सहसंयोजक ने संयुक्त रूप से किया।
सभा को संबोधित करते हुए मुकेश मुक्त ने केंद्र सरकार पर मजदूर विरोधी नीतियां लागू करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मांग आधारित रोजगार की गारंटी देने वाले कानून मनरेगा को कमजोर कर दिया गया है और ग्रामीण गरीबों को केवल घोषणाओं के भरोसे छोड़ दिया गया है।
उन्होंने कहा कि गांवों में बेरोजगारी और आर्थिक संकट की स्थिति गंभीर होती जा रही है। मजदूरों को पर्याप्त काम नहीं मिल रहा है, जिससे उनके सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मनरेगा की मूल भावना को खत्म कर दिया गया है और उसकी जगह नई योजनाओं का केवल प्रचार किया जा रहा है।
मुकेश मुक्त ने कहा कि सरकार द्वारा लाए गए नए ग्रामजी कानून को ग्रामीण गरीबों के साथ धोखा बताया जा रहा है। उनका कहना था कि सरकार के पास इस योजना को प्रभावी तरीके से लागू करने की कोई स्पष्ट तैयारी नहीं है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवार रोजगार और आय के संकट से जूझ रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यदि मनरेगा को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया, तो गांवों से पलायन और आर्थिक संकट और बढ़ेगा। उनका कहना था कि ग्रामीण मजदूरों के लिए रोजगार की गारंटी बेहद जरूरी है, क्योंकि खेती और अन्य कामों से पूरे साल रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाता।
सभा में वक्ताओं ने चार नए लेबर कोड्स का भी विरोध किया। मजदूर संगठनों का आरोप है कि इन लेबर कोड्स से श्रमिकों के अधिकार कमजोर होंगे और कॉरपोरेट कंपनियों को फायदा मिलेगा। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सरकार मजदूरों के अधिकारों को कमजोर कर रही है और श्रम कानूनों में बदलाव के जरिए शोषण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
प्रदर्शन के दौरान मजदूरों ने कई मांगें रखीं। इनमें मनरेगा के तहत 700 रुपये प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी लागू करना, साल में 200 दिन रोजगार की गारंटी देना, चारों लेबर कोड्स को वापस लेना और मजदूर आंदोलनों पर कार्रवाई बंद करना प्रमुख मांगों में शामिल रहा।
महिला मजदूरों ने भी प्रदर्शन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कई महिलाओं ने कहा कि मनरेगा ग्रामीण परिवारों के लिए जीवनरेखा की तरह है। गांवों में रोजगार नहीं मिलने से परिवारों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है। उनका कहना था कि यदि काम और मजदूरी दोनों बढ़ाई जाएं, तो गरीब परिवारों को राहत मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा ग्रामीण भारत में रोजगार सुरक्षा की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक है। आर्थिक संकट, बेरोजगारी और पलायन की स्थिति में यह योजना लाखों परिवारों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत रही है। हालांकि कई राज्यों में मजदूरी भुगतान में देरी, काम की कमी और बजट संबंधी समस्याओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े जानकारों का कहना है कि बिहार जैसे राज्यों में मनरेगा का महत्व और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि यहां बड़ी आबादी कृषि और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है। ऐसे में रोजगार गारंटी योजना कमजोर होने का असर सीधे गरीब परिवारों पर पड़ता है।
प्रदर्शन में शामिल मजदूरों ने कहा कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज किया जाएगा। उन्होंने सरकार से मजदूरों की समस्याओं को गंभीरता से लेने की अपील की।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मजदूर संगठनों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद रहे। इनमें , , , , समेत कई महिला और पुरुष मजदूर शामिल हुए।
फिलहाल भागलपुर में हुआ यह प्रदर्शन ग्रामीण रोजगार, मजदूरी और श्रमिक अधिकारों को लेकर बढ़ती नाराजगी का संकेत माना जा रहा है। मजदूर संगठनों ने साफ किया है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।


