
बेतिया, 18 मई 2026: बिहार के पश्चिम चंपारण जिले से शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। यहां एक शिक्षिका की मौत के करीब एक साल बाद भी विभागीय रिकॉर्ड में उनका नाम सक्रिय बना रहा। इतना ही नहीं, विभिन्न सरकारी कार्यों में लगातार उनकी ड्यूटी लगाई जाती रही और हाल ही में ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं होने पर उनसे स्पष्टीकरण तक मांग लिया गया। मामला सामने आने के बाद विभाग की कार्यप्रणाली और डिजिटल सिस्टम की निगरानी पर सवाल उठने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार, नगर निगम क्षेत्र के शेखौना मध्य विद्यालय में कार्यरत शिक्षिका अनुपमा कुमारी का जून 2025 में कैंसर के कारण निधन हो गया था। परिवार और विद्यालय प्रशासन का कहना है कि शिक्षिका की मृत्यु के बाद संबंधित विभागों को इसकी जानकारी दे दी गई थी, लेकिन इसके बावजूद विभागीय पोर्टल पर उनका नाम हटाया नहीं गया। नतीजा यह हुआ कि विभागीय सिस्टम में उन्हें अब भी कार्यरत शिक्षक के रूप में दिखाया जाता रहा।
बताया जा रहा है कि ई-शिक्षा कोष पोर्टल पर नाम सक्रिय रहने के कारण पिछले एक वर्ष के दौरान शिक्षिका के नाम से कई सरकारी कार्यों की ड्यूटी लगाई गई। इनमें डायट प्रशिक्षण, बिहार बोर्ड परीक्षा से जुड़े कार्य और जनगणना 2027 की तैयारियों से संबंधित जिम्मेदारियां भी शामिल थीं। परिवार का कहना है कि हर बार विभागीय संदेश आने पर उन्हें मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता था।
परिजनों के अनुसार, विद्यालय प्रशासन ने कई बार बेतिया स्थित बीआरसी कार्यालय को लिखित रूप से सूचना देकर पोर्टल से नाम हटाने का अनुरोध किया था। बावजूद इसके विभागीय स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। परिवार का आरोप है कि यदि समय रहते रिकॉर्ड अपडेट कर दिया जाता तो ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
मामला उस समय और चर्चा में आ गया जब 12 मई को ई-शिक्षा कोष पोर्टल की रैंडम जांच में जिले के हजारों शिक्षकों की ऑनलाइन उपस्थिति में गड़बड़ी पाई गई। इसके बाद समग्र शिक्षा अभियान की जिला कार्यक्रम अधिकारी गार्गी कुमारी की ओर से संबंधित शिक्षकों से स्पष्टीकरण मांगा गया। हैरानी की बात यह रही कि मृत शिक्षिका अनुपमा कुमारी के नाम से भी जवाब तलब कर दिया गया।
यह नोटिस जब परिवार तक पहुंचा तो वे स्तब्ध रह गए। शिक्षिका की बेटियों अंशिका, वंशिका और जिया ने बताया कि उनकी मां का मोबाइल नंबर अब भी विभागीय पोर्टल में दर्ज है। इसी कारण विभागीय मैसेज और नोटिस लगातार उसी नंबर पर आते रहते हैं। बेटियों का कहना है कि हर बार मां के नाम से संदेश आने पर परिवार के पुराने जख्म फिर ताजा हो जाते हैं।
परिवार ने बताया कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझने के बाद अनुपमा कुमारी की मौत हुई थी। उनके निधन के बाद परिवार लंबे समय तक सदमे में रहा। बाद में सरकारी नियमों के तहत उनके पति विपिन पासवान को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिली। वर्तमान में वह नौतन अंचल स्थित श्यामपुर कोतराहा उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में लिपिक पद पर कार्यरत हैं। इसके बावजूद विभागीय रिकॉर्ड में उनकी पत्नी को अब भी सक्रिय शिक्षिका दिखाया जाना परिवार के लिए पीड़ादायक बना हुआ है।
इस पूरे मामले ने शिक्षा विभाग की डिजिटल व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी की पोल खोल दी है। सवाल उठ रहे हैं कि जब किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद संबंधित दस्तावेज जमा कर दिए जाते हैं और अनुकंपा नौकरी तक मिल जाती है, तब भी विभागीय पोर्टल में रिकॉर्ड अपडेट क्यों नहीं हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा उदाहरण है।
शिक्षा विभाग के सूत्रों के मुताबिक, ई-शिक्षा कोष पोर्टल के जरिए शिक्षकों की उपस्थिति, प्रशिक्षण, ड्यूटी और अन्य गतिविधियों की ऑनलाइन निगरानी की जाती है। लेकिन यदि किसी मृत कर्मचारी का रिकॉर्ड समय पर हटाया नहीं जाता, तो इससे विभागीय डेटा की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
स्थानीय शिक्षकों का कहना है कि विभाग में रिकॉर्ड अपडेट करने की प्रक्रिया बेहद धीमी है। कई बार स्थानांतरण, सेवानिवृत्ति या मृत्यु जैसी स्थितियों में भी महीनों तक पोर्टल पर बदलाव नहीं किया जाता। इससे कर्मचारियों और उनके परिवारों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। शिक्षकों का मानना है कि डिजिटल सिस्टम तभी प्रभावी होगा जब उसे समय-समय पर अपडेट भी किया जाए।
इधर, मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारियों में हलचल तेज हो गई है। विभागीय स्तर पर अब यह जांच की जा रही है कि आखिर इतने लंबे समय तक रिकॉर्ड अपडेट क्यों नहीं किया गया। अधिकारियों का कहना है कि तकनीकी और प्रशासनिक दोनों पहलुओं की समीक्षा की जाएगी और यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी हो सकती है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक परिवार की पीड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता को भी उजागर करता है। उनका कहना है कि किसी मृत कर्मचारी के नाम से नोटिस जारी होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे परिवार की भावनाएं आहत होती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी विभागों में डेटा प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है। यदि विभागों के बीच बेहतर समन्वय हो और रिकॉर्ड अपडेट करने की समयबद्ध प्रक्रिया तय हो, तो ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मानवीय निगरानी भी जरूरी है ताकि किसी तकनीकी गलती से लोगों को मानसिक परेशानी न झेलनी पड़े।
फिलहाल यह मामला पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। वहीं परिवार अब चाहता है कि जल्द से जल्द मृत शिक्षिका का नाम पोर्टल से हटाया जाए ताकि उन्हें बार-बार मानसिक आघात का सामना न करना पड़े।


