
पटना, 18 मई 2026: बिहार के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और डॉक्टरों की जवाबदेही तय करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने बड़ा सुधार अभियान शुरू कर दिया है। राज्य सरकार अब सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली में व्यापक बदलाव करने जा रही है, जिसके तहत डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की उपस्थिति, इलाज व्यवस्था, मरीजों की निगरानी और अस्पताल प्रबंधन को पूरी तरह डिजिटल सिस्टम से जोड़ने की तैयारी है। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि इससे मरीजों को बेहतर इलाज मिलेगा, अस्पतालों में पारदर्शिता बढ़ेगी और लापरवाही पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार अब सभी सरकारी डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को तय रोस्टर के अनुसार ड्यूटी करना अनिवार्य होगा। साथ ही बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को सख्ती से लागू किया जाएगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि डॉक्टर समय पर अस्पताल पहुंचे और मरीजों का इलाज करें। विभाग का कहना है कि लंबे समय से सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और निजी प्रैक्टिस की शिकायतें मिल रही थीं, जिसके बाद यह कदम उठाया गया है।
दरअसल, पिछले महीने राज्य सरकार ने सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने का फैसला लिया था। इसके बाद अब अस्पतालों की निगरानी और कार्यशैली में बदलाव को लेकर स्वास्थ्य विभाग लगातार सक्रिय दिखाई दे रहा है। सरकार चाहती है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को ऐसी सुविधाएं मिलें कि उन्हें निजी अस्पतालों का सहारा न लेना पड़े।
नई व्यवस्था के तहत डॉक्टरों को मरीजों को अनावश्यक रूप से बड़े अस्पतालों में रेफर करने से भी रोका जाएगा। विभाग ने स्पष्ट किया है कि जिन अस्पतालों में जांच और इलाज की सुविधा उपलब्ध है, वहां मरीजों को रेफर करने की प्रवृत्ति बंद करनी होगी। इसके लिए मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी का पालन अनिवार्य किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि कई बार सामान्य बीमारियों के मरीजों को भी बड़े अस्पतालों में भेज दिया जाता है, जिससे वहां अतिरिक्त दबाव बढ़ जाता है और मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
स्वास्थ्य विभाग अब इलाज व्यवस्था को पूरी तरह डेटा आधारित और पारदर्शी बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इसके तहत मरीजों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। अस्पतालों में आने वाले मरीजों का पूरा विवरण ऑनलाइन दर्ज होगा, जिससे इलाज की प्रक्रिया की निगरानी आसान होगी। विभाग का मानना है कि डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होने से भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े पर भी रोक लगेगी।
सूत्रों के अनुसार, सरकार अस्पतालों में मौजूद संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना चाहती है। कई सरकारी अस्पतालों में मशीनें और उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को बाहर जांच कराने के लिए भेजा जाता है। अब ऐसे मामलों की निगरानी की जाएगी। स्वास्थ्य कर्मियों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि मरीजों को अधिकतम सुविधाएं अस्पताल परिसर के भीतर ही उपलब्ध कराई जाएं।
स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने भी अस्पतालों की व्यवस्था में सुधार को लेकर अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा है कि सरकारी अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता है। मंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट रूप से कहा है कि मरीजों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए और लापरवाही बरतने वाले कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
सरकार ने विशेष रूप से रात्रि पाली में कार्यरत डॉक्टरों के लिए भी नई व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। अब नाइट ड्यूटी करने वाले डॉक्टरों को सुबह अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वरिष्ठ डॉक्टर अस्पताल में मौजूद रहें और इमरजेंसी मरीजों की देखभाल ठीक तरीके से हो सके। विभाग को शिकायत मिल रही थी कि कई अस्पतालों में रात के समय सिर्फ जूनियर स्टाफ के भरोसे मरीजों का इलाज चल रहा था।
स्वास्थ्य विभाग अब अस्पतालों में निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की तैयारी में है। अधिकारियों के अनुसार अस्पतालों में डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम लागू होने के बाद डॉक्टरों की उपस्थिति, मरीजों की संख्या, इलाज की स्थिति और दवा वितरण जैसी जानकारी रियल टाइम में उपलब्ध होगी। इससे प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेने में भी आसानी होगी।
हालांकि सरकार के इस फैसले का कुछ डॉक्टर संगठन विरोध भी कर रहे हैं। सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक और नई निगरानी व्यवस्था के खिलाफ बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ यानी BHASA ने सरकार से बातचीत की मांग की है। संगठन का कहना है कि डॉक्टरों पर सख्ती के साथ-साथ उनकी समस्याओं का समाधान भी जरूरी है।
रविवार को पटना स्थित आईएमए हॉल में चिकित्सकों का महासम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें राज्यभर से बड़ी संख्या में डॉक्टर शामिल हुए। सम्मेलन के बाद डॉक्टरों ने गांधी मैदान स्थित आईएमए हॉल से जेपी गोलंबर तक पैदल मार्च भी निकाला। इस दौरान चिकित्सकों ने अपनी 19 सूत्री मांगों को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की।
डॉक्टर संगठनों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सकों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने प्रशासनिक पदों पर कार्यरत डॉक्टरों के लिए वाहन सुविधा, पर्याप्त सुरक्षा और अन्य बुनियादी संसाधनों की मांग की है। डॉक्टरों का कहना है कि कई बार अस्पतालों में सुरक्षा की कमी के कारण चिकित्सकों के साथ दुर्व्यवहार और हिंसा की घटनाएं होती हैं।
BHASA ने सरकार से बिहार चिकित्सा सेवा संस्थान एवं व्यक्ति सुरक्षा कानून 2011 और 2014 को और अधिक प्रभावी बनाने की मांग की है। साथ ही अस्पतालों में सशस्त्र सुरक्षा गार्ड की तैनाती की भी मांग उठाई गई है ताकि डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी सुरक्षित माहौल में काम कर सकें।
संघ के प्रवक्ता डॉ. विनय कुमार ने कहा कि चिकित्सक बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के पक्ष में हैं, लेकिन सरकार को डॉक्टरों की व्यावहारिक समस्याओं पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्यभर से आए चिकित्सकों ने सरकार से सकारात्मक बातचीत की अपील की है।
इधर, स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि अस्पतालों में सुधार अभियान लगातार जारी रहेगा। विभाग ने साफ किया है कि मरीजों को गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराना सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। आने वाले दिनों में राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों में नई व्यवस्था लागू होने की संभावना है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार अपने फैसलों को प्रभावी ढंग से लागू कर पाती है तो बिहार की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। बायोमेट्रिक उपस्थिति, डिजिटल रिकॉर्ड और निगरानी प्रणाली से अस्पतालों में अनुशासन बढ़ेगा और मरीजों को समय पर बेहतर इलाज मिलने की उम्मीद मजबूत होगी।


