बिहार की धरती पर उतरेगी ‘हरित क्रांति’: इस मानसून में 5 करोड़ पौधे लगाने का महा-अभियान, जीविका दीदियां और किसान बनेंगे पर्यावरण के नए प्रहरी

पटना। जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौतियों के बीच बिहार ने अपनी पारिस्थितिकी को सुदृढ़ करने और हरित आवरण (Green Cover) को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी खाका तैयार किया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने इस वर्ष की वर्षा ऋतु को ‘हरित बिहार अभियान’ के स्वर्ण युग के रूप में चिह्नित करते हुए राज्यभर में 5 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। 14 मई 2026 को पटना में विभाग की उच्चस्तरीय समीक्षा के बाद इस महा-अभियान की आधिकारिक घोषणा की गई। यह अभियान केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे एक जन-आंदोलन बनाने के लिए विभाग ने ग्रामीण विकास, कृषि, मनरेगा और जीविका समूहों के साथ एक अभूतपूर्व गठबंधन तैयार किया है। जुलाई के प्रथम सप्ताह से शुरू होने वाला यह पौधारोपण अभियान पूरे वर्षाकाल तक चलेगा, जिसका उद्देश्य बिहार के हर अंचल को प्रदूषण मुक्त और जैव विविधता से संपन्न बनाना है।

जैव विविधता का महा-संगम: बरगद से लेकर महोगनी तक का लगेगा पहरा

​इस वर्ष के पौधारोपण अभियान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विविधता है। विभाग ने केवल उन पौधों को प्राथमिकता नहीं दी है जो तेजी से बढ़ते हैं, बल्कि उन प्रजातियों का चयन किया है जिनका गहरा पर्यावरणीय और सांस्कृतिक महत्व है। इस अभियान के तहत बरगद और पीपल जैसे विशाल और ऑक्सीजन देने वाले पेड़ों से लेकर महोगनी और सागवान जैसी व्यावसायिक लकड़ी वाले पौधों तक का समावेश किया गया है।

​अभियान के दौरान लगाए जाने वाले प्रमुख पौधों की सूची में बकैन, सेमल, अर्जुन, कदंब, छतवन, कटहल और बीजू आम शामिल हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अर्जुन और सेमल जैसे पौधे जहां औषधीय गुणों से भरपूर हैं, वहीं कदंब और बरगद पक्षियों और सूक्ष्म जीवों के लिए एक बेहतरीन प्राकृतिक आवास (Habitat) प्रदान करते हैं। कटहल और आम के पौधों को शामिल करने के पीछे सरकार की सोच यह है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं और आय के स्रोतों को भी मजबूती मिले। यह प्रजातिगत विविधता न केवल जलवायु संतुलन बनाए रखने में मदद करेगी, बल्कि राज्य की लुप्त हो रही जैव विविधता को भी पुनर्जीवित करेगी।

विभागीय समन्वय: सामूहिक जिम्मेदारी से पूरा होगा 5 करोड़ का लक्ष्य

​5 करोड़ पौधों का लक्ष्य किसी एक विभाग के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता था, इसलिए बिहार सरकार ने इसे ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ का रूप दिया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने ग्रामीण विकास विभाग और कृषि विभाग के साथ मिलकर एक सुदृढ़ नेटवर्क तैयार किया है। इस अभियान में ‘मनरेगा’ योजना की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, जहाँ जल संरक्षण कार्यों के साथ-साथ पौधों की रोपाई और उनके रखरखाव का काम भी सुनिश्चित किया जाएगा।

​सबसे बड़ा सहयोग ‘जीविका दीदियों’ के माध्यम से मिलने वाला है, जो जमीनी स्तर पर इस अभियान की रीढ़ होंगी। जीविका समूहों को नर्सरी प्रबंधन से लेकर पौधों की सुरक्षा तक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। विभाग का मानना है कि जब महिलाएं इस अभियान से जुड़ेंगी, तो पौधों के बचने की दर (Survival Rate) में काफी सुधार होगा, क्योंकि वे पौधों की देखभाल अपनी संतान की तरह करती हैं। सरकारी तंत्र की यह नई कार्ययोजना आपसी तालमेल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ हर विभाग अपने संसाधनों और मानव बल का उपयोग हरित आवरण बढ़ाने के लिए करेगा।

योजनावार लक्ष्य: आंकड़ों में बिहार की नई हरियाली

​विभाग ने 5 करोड़ के इस जादुई आंकड़े को प्राप्त करने के लिए इसे विभिन्न श्रेणियों और योजनाओं में विभाजित किया है। यह वैज्ञानिक विभाजन सुनिश्चित करेगा कि हर क्षेत्र की निगरानी प्रभावी ढंग से हो सके।

  • विभागीय स्तर: सीधे वन विभाग के माध्यम से 81 लाख 59 हजार 900 पौधे लगाए जाएंगे। ये पौधे मुख्य रूप से वन क्षेत्रों और संरक्षित इलाकों में रोपे जाएंगे।
  • कैम्पा योजना (CAMPA): क्षतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण के माध्यम से 14 लाख 24 हजार 300 पौधों का रोपण होगा।
  • कृषि वानिकी: कृषि वानिकी योजना के अंतर्गत किसानों के सहयोग से 59 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य है, जिससे कृषि भूमि का अधिकतम उपयोग हो सके।
  • जीविका समूह: इस अभियान की सबसे बड़ी भागीदारी जीविका दीदियों की होगी, जो अकेले 97 लाख 92 हजार पौधे लगाने की जिम्मेदारी संभालेंगी।
  • गैर-सरकारी संस्थाएं (NGOs): समाज के विभिन्न वर्गों और एनजीओ के माध्यम से 8 लाख 43 हजार पौधों का रोपण सुनिश्चित किया गया है।

​इसके अतिरिक्त, शेष लक्ष्य को अन्य सहयोगी विभागों और जनभागीदारी के माध्यम से पूरा किया जाएगा। विभाग ने इस बार न केवल रोपण पर, बल्कि पौधों की जीपीएस टैगिंग (GPS Tagging) पर भी जोर दिया है ताकि उनकी निरंतर निगरानी की जा सके।

जुलाई का प्रथम सप्ताह: मानसून की पहली फुहार के साथ होगा शंखनाद

​हरित बिहार अभियान का शंखनाद जुलाई महीने के पहले सप्ताह में होगा। वनस्पति विज्ञान के अनुसार, मानसून की शुरुआत का समय पौधों की जड़ें जमाने के लिए सबसे अनुकूल होता है। जुलाई से शुरू होकर यह अभियान अगस्त और सितंबर के अंत तक जारी रहेगा। विभाग ने सभी जिलों के वन अधिकारियों (DFO) को निर्देश दिया है कि वे जून महीने के अंत तक अपनी नर्सरी में पर्याप्त मात्रा में और स्वस्थ पौधे तैयार रखें।

​जुलाई के पहले सप्ताह को ‘वन महोत्सव’ के रूप में मनाया जाएगा, जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर पंचायत स्तर के प्रतिनिधि तक भाग लेंगे। विभाग ने इस बार ‘एक व्यक्ति, एक पौधा’ का नारा दिया है, ताकि हर नागरिक इस मुहिम का हिस्सा बने। यह समयबद्ध कार्ययोजना यह सुनिश्चित करेगी कि पौधों को पर्याप्त प्राकृतिक सिंचाई मिल सके और वे कड़ाके की ठंड आने से पहले खुद को जमीन में स्थापित कर लें।

जनभागीदारी और मुफ्त वितरण: जनता के द्वार तक पहुँचेगा ‘पर्यावरण’

​सरकार का मानना है कि कोई भी हरित अभियान तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक वह जन-आंदोलन का रूप न ले ले। इसी सोच के साथ विभाग ने स्कूलों, कॉलेजों, वक्फ बोर्डों और स्थानीय संस्थानों को इस अभियान से जोड़ने का निर्णय लिया है। शिक्षण संस्थानों में विशेष ‘इको-क्लब’ बनाए जाएंगे, जहाँ विद्यार्थी न केवल पौधे लगाएंगे बल्कि उनके संरक्षण की शपथ भी लेंगे।

​अभियान के तहत आम लोगों के बीच ‘मुफ्त पौधा वितरण’ की व्यापक योजना बनाई गई है। लोग अपनी पसंद के फलदार या छायादार पौधे सरकारी नर्सरी से प्राप्त कर सकेंगे। विभाग ने मोबाइल वैन के जरिए भी ग्रामीण क्षेत्रों में पौधों के वितरण की व्यवस्था की है। स्थानीय निकायों और वक्फ बोर्ड जैसे धार्मिक संस्थानों को उनकी खाली पड़ी जमीनों पर सघन वनीकरण (Afforestation) के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह जनभागीदारी न केवल हरित आवरण बढ़ाएगी, बल्कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रति समाज को और अधिक संवेदनशील बनाएगी।

पारिस्थितिकी संतुलन और जैव विविधता का संरक्षण

​5 करोड़ पौधों का यह विशाल निवेश बिहार की मिट्टी और वायुमंडल के लिए एक संजीवनी की तरह है। पिछले कुछ वर्षों में बिहार ने अनियमित मानसून और भीषण लू (Heat Wave) का सामना किया है। वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि केवल वृक्षारोपण ही वह हथियार है जो बढ़ते तापमान को नियंत्रित कर सकता है। बरगद और पीपल जैसे ‘अक्षय’ वृक्ष जहां कार्बन सोखने की अद्भुत क्षमता रखते हैं, वहीं सागवान और महोगनी जैसे पेड़ मृदा अपरदन (Soil Erosion) को रोकते हैं।

​इस अभियान से बिहार की जैव विविधता को भी एक नया जीवन मिलेगा। अधिक पेड़ों का अर्थ है अधिक पक्षी, कीट-पतंगे और सूक्ष्म जीव, जो परागण (Pollination) की प्रक्रिया में सहायक होते हैं। इससे अंततः कृषि उत्पादकता में भी सुधार होगा। विभाग का दीर्घकालिक लक्ष्य बिहार के वन क्षेत्र को राष्ट्रीय औसत के करीब ले जाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण विरासत में मिल सके।

सतत निगरानी और पौधों की सुरक्षा की चुनौती

​पौधे लगाना केवल आधा काम है; असली चुनौती उन्हें जीवित रखना और वृक्ष बनाना है। इसके लिए विभाग ने ‘रखरखाव’ पर विशेष बजट का प्रावधान किया है। मनरेगा के तहत ‘वन पोषकों’ की नियुक्ति की जा रही है जो पौधों को पानी देने और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में बाड़ (Fencing) लगाने के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग किया जाएगा।

​विभाग एक मोबाइल ऐप भी विकसित कर रहा है, जिसके माध्यम से लगाए गए पौधों की वर्तमान स्थिति की फोटो अपलोड की जाएगी। यह डिजिटल निगरानी तंत्र भ्रष्टाचार की गुंजाइश को कम करेगा और लक्ष्य की वास्तविक प्रगति को दर्शाएगा। विभाग के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि केवल गड्ढे खोदने और फोटो खिंचवाने से काम नहीं चलेगा; जिस क्षेत्र में पौधों के जीवित रहने की दर कम होगी, वहां के संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।

सुशासन का हरित अध्याय

​बिहार में 2026 की यह वर्षा ऋतु सुशासन और पर्यावरण के संगम का एक नया अध्याय लिखने जा रही है। 5 करोड़ पौधों का लक्ष्य महज एक संख्या नहीं है, बल्कि यह भविष्य के प्रति राज्य सरकार की गंभीरता का प्रमाण है। जब जुलाई की पहली बारिश बिहार की मिट्टी को छुएगी, तब राज्य का हर कोना पौधों की रोपाई के उत्सव में डूबा होगा। यह अभियान बिहार को एक ‘कार्बन सिंक’ के रूप में विकसित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। आम जनता की सक्रिय भागीदारी, जीविका दीदियों का परिश्रम और विभाग की तकनीकी दृष्टि मिलकर बिहार को एक बार फिर से ‘सस्य श्यामला’ बनाने के सपने को साकार करेंगे।

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