
पटना। बिहार की राजनैतिक फिजाओं में ‘परिवारवाद’ का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव द्वारा एनडीए सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर परिवारवाद को लेकर किए गए तीखे हमले ने प्रदेश के सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है। तेजस्वी यादव ने जैसे ही एनडीए के भीतर विभिन्न राजनैतिक परिवारों से आने वाले चेहरों की सूची सार्वजनिक कर तंज कसा, सत्ता पक्ष के दिग्गजों ने मोर्चा संभालते हुए उन पर जवाबी हमला बोल दिया। भाजपा और सहयोगी दलों के नेताओं ने तेजस्वी यादव को आईना दिखाते हुए आरजेडी के उन पुराने फैसलों और सांगठनिक ढांचे की याद दिलाई, जहाँ सत्ता की बागडोर एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है। रविवार, 10 मई 2026 को शुरू हुआ यह जुबानी जंग अब व्यक्तिगत आरोपों और ऐतिहासिक प्रमाणों की लड़ाई में तब्दील हो चुका है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि जो दल खुद परिवारवाद की खाद पर पनपा है, उसे दूसरों के घर में झांकने से पहले अपना दामन देख लेना चाहिए। इस राजनैतिक द्वंद्व ने बिहार के मतदाताओं के बीच एक नई बहस छेड़ दी है कि आखिर असली परिवारवाद कहाँ है और कौन सा दल योग्यता को तरजीह दे रहा है।
तेजस्वी का आरोप: एनडीए के ‘कुनबे’ पर किया सीधा प्रहार
इस पूरे विवाद की शुरुआत तेजस्वी यादव के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने एनडीए गठबंधन के उम्मीदवारों और पदाधिकारियों की एक लंबी फेहरिस्त पेश की। तेजस्वी यादव ने कहा कि भाजपा दूसरों पर परिवारवाद का आरोप लगाती है, लेकिन खुद उसके भीतर ऐसे दर्जनों नेता हैं जो किसी न किसी बड़े राजनेता की संतान हैं या उनके रिश्तेदार हैं। उन्होंने चिराग पासवान की पार्टी से लेकर जीतन राम मांझी और सम्राट चौधरी के परिवार का हवाला देते हुए पूछा कि क्या यह परिवारवाद की श्रेणी में नहीं आता?
तेजस्वी यादव का तर्क था कि एनडीए में योग्यता के बजाय ‘राजनैतिक रसूख’ को टिकट और पद का आधार बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा केवल अपनी सुविधा के अनुसार परिवारवाद की परिभाषा बदलती रहती है। जब कोई विपक्ष में होता है तो वह परिवारवादी है, लेकिन जैसे ही वह एनडीए का हिस्सा बन जाता है, वह राष्ट्रवादी हो जाता है। तेजस्वी यादव की इस आक्रामक शैली ने सत्ता पक्ष को बचाव की मुद्रा में लाने के बजाय उन्हें पलटवार करने का मौका दे दिया।
भाजपा का तीखा जवाब: “शीशे के घर में रहने वाले दूसरों पर पत्थर न मारें”
तेजस्वी यादव के बयान के कुछ ही घंटों के भीतर भाजपा के प्रदेश नेतृत्व और वरिष्ठ मंत्रियों ने एक संयुक्त प्रेस वार्ता कर उन पर जोरदार हमला बोला। भाजपा नेताओं ने कहा कि तेजस्वी यादव को परिवारवाद पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, क्योंकि उनका पूरा राजनैतिक अस्तित्व ही उनके पिता लालू प्रसाद के नाम पर टिका है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं ने बिहार के उन पुराने फैसलों को याद दिलाया जब लालू प्रसाद ने जेल जाने से पहले अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी।
सत्ता पक्ष ने तेजस्वी यादव से कुछ तीखे सवाल पूछे:
- जब आरजेडी में तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया गया, तब योग्यता का पैमाना क्या था?
- पार्टी के भीतर मीसा भारती, तेज प्रताप यादव और अन्य पारिवारिक सदस्यों का वर्चस्व क्या परिवारवाद नहीं है?
- आरजेडी के सांगठनिक ढांचे में लालू प्रसाद के बाद उनके पुत्रों के अलावा किसी और को नेतृत्व की कमान क्यों नहीं मिली?
भाजपा नेताओं ने कहा कि एनडीए में यदि किसी राजनेता का बेटा चुनाव लड़ता है, तो वह जनता के बीच जाकर खुद को साबित करता है, लेकिन आरजेडी में तो पार्टी का मालिकाना हक ही एक परिवार के पास सुरक्षित है।
पुराने फैसलों की खुदाई: आरजेडी के टिकट बंटवारे पर सवाल
भाजपा ने तेजस्वी यादव को उन पुराने चुनावी चक्रों की याद दिलाई जहाँ आरजेडी ने केवल प्रभावशाली परिवारों के सदस्यों को ही टिकट देकर मैदान में उतारा था। सत्ता पक्ष का कहना है कि आरजेडी ने हमेशा से जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की अनदेखी की और उन चेहरों को प्राथमिकता दी जो किसी बड़े बाहुबली या राजनेता के उत्तराधिकारी थे। भाजपा ने आरोप लगाया कि लालू प्रसाद के दौर से लेकर आज तक आरजेडी का मुख्य उद्देश्य एक परिवार की सत्ता को सुरक्षित रखना रहा है।
भाजपा के रणनीतिकारों ने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले के विधानसभा चुनावों में तेजस्वी यादव ने खुद ऐसे कई उम्मीदवारों को टिकट दिया जिनका एकमात्र परिचय उनका परिवार था। सत्ता पक्ष ने तंज कसते हुए कहा कि तेजस्वी यादव को ‘सेलेक्टिव एमनेसिया’ (सुविधाजनक भूलने की बीमारी) हो गई है। वे अपने परिवार के भीतर चल रहे ‘पावर स्ट्रगल’ को भूलकर दूसरों के सांगठनिक फैसलों पर टिप्पणी कर रहे हैं।
क्षेत्रीय दलों का समीकरण और परिवारवाद की जड़ें
बिहार की राजनीति में परिवारवाद कोई नया विषय नहीं है, लेकिन 2026 के इस दौर में यह मुद्दा और अधिक धारदार हो गया है। एनडीए के सहयोगियों जैसे हम (HAM) और लोजपा (R) ने भी तेजस्वी यादव पर हमला बोला है। जीतन राम मांझी के समर्थकों का कहना है कि उनके बेटे संतोष कुमार सुमन ने अपनी योग्यता के दम पर कैबिनेट में जगह बनाई है, जबकि तेजस्वी यादव को विरासत में सत्ता मिली है।
वहीँ, चिराग पासवान की पार्टी की ओर से कहा गया कि उनके पिता रामविलास पासवान के निधन के बाद उन्होंने शून्य से शुरुआत की और जनता के बीच जाकर अपना आधार बनाया। उन्होंने तेजस्वी यादव से पूछा कि क्या वे बिना लालू प्रसाद के फोटो और नाम के चुनाव जीतने का साहस जुटा सकते हैं? इन क्षेत्रीय दलों का तर्क है कि परिवारवाद तब होता है जब किसी अयोग्य को थोपा जाए, लेकिन एनडीए के सहयोगी दल जनता की पसंद बनकर उभरे हैं।
सोशल मीडिया पर छिड़ा ‘डेटा वॉर’
इस विवाद का असर सड़कों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी व्यापक रूप से देखा जा रहा है। आरजेडी और भाजपा के आईटी सेल एक-दूसरे के नेताओं की ‘वंशवृक्ष’ (Family Tree) साझा कर रहे हैं। आरजेडी समर्थकों ने भाजपा के कई केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों की सूची जारी की है जो राजनैतिक परिवारों से आते हैं। इसके जवाब में भाजपा समर्थकों ने लालू परिवार की तीन पीढ़ियों के राजनैतिक पदों का ब्यौरा पेश किया है।
युवा मतदाताओं के बीच इस बहस ने एक नई सोच पैदा की है। जहाँ एक वर्ग का मानना है कि यदि किसी नेता का बेटा योग्य है तो उसे राजनीति में आने से नहीं रोकना चाहिए, वहीं दूसरा वर्ग मानता है कि इससे सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए अवसर कम हो जाते हैं। तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे को उछालकर एनडीए के भीतर के उन कार्यकर्ताओं को उकसाने की कोशिश की है जो वर्षों से टिकट की आस लगाए बैठे हैं लेकिन किसी ‘पुत्र’ या ‘रिश्तेदार’ के कारण पीछे रह जाते हैं।
2026 के विधानसभा चुनावों पर असर
राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ‘परिवारवाद’ का यह मुद्दा 2026 के विधानसभा चुनावों में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। तेजस्वी यादव इसे एनडीए के खिलाफ एक ‘नैतिक हथियार’ के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं, ताकि वे भाजपा के ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाले नारे को चुनौती दे सकें। वहीं भाजपा इस मुद्दे के जरिए तेजस्वी यादव की ‘राजकुमार’ वाली छवि को जनता के बीच पुख्ता करना चाहती है ताकि उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जा सके जिसे बिना संघर्ष के सब कुछ मिल गया।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी इस विवाद में अपनी बात रखते हुए कहा कि बिहार अब लालटेन युग से बाहर निकल चुका है जहाँ केवल एक परिवार का उजाला होता था। अब एलईडी का जमाना है जहाँ हर गरीब और योग्य व्यक्ति को रोशनी मिलती है। उन्होंने तेजस्वी यादव को चुनौती दी कि वे परिवारवाद पर बहस करने के बजाय विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर बात करें।
कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष का डर
तेजस्वी यादव द्वारा उठाए गए इस सवाल ने एनडीए के भीतर भी दबे स्वर में चर्चाएं शुरू कर दी हैं। कई पुराने भाजपा कार्यकर्ता, जो दशकों से दरी बिछा रहे हैं, वे भी अब निजी बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि बाहरी दलों से आए ‘परिवारवादी’ नेताओं को महत्व मिलने से उनकी स्थिति कमजोर हुई है। तेजस्वी यादव का हमला सीधे तौर पर इन्हीं कार्यकर्ताओं की भावनाओं को सहलाने के लिए है।
दूसरी ओर, आरजेडी के भीतर भी एक धड़ा ऐसा है जो मानता है कि पार्टी को अब ‘यादव परिवार’ की छवि से बाहर निकलकर एक व्यापक सामाजिक आधार बनाना चाहिए। लेकिन नेतृत्व की कमान जिस तरह से बंधी हुई है, उसमें किसी भी बदलाव की गुंजाइश कम नजर आती है। परिवारवाद का यह घमासान आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है, क्योंकि कोई भी दल इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं है। बिहार की राजनीति अब उस मोड़ पर है जहाँ ‘संस्कार’ और ‘वंश’ के बीच की रेखा बेहद धुंधली हो चुकी है और मतदाता को यह तय करना है कि वह किसे अपना प्रतिनिधि चुनता है।


