
मोतिहारी। बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में मानव तस्करी के एक बड़े नेटवर्क को ध्वस्त करते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने शनिवार की शाम एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। बापूधाम मोतिहारी रेलवे स्टेशन पर उस समय हड़कंप मच गया जब रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और चाइल्ड लाइन की संयुक्त टीम ने प्लेटफॉर्म संख्या-दो पर घेराबंदी कर 21 मासूम बच्चों को एक संदिग्ध युवक के चंगुल से मुक्त कराया। पकड़े गए बच्चों की उम्र महज पांच से नौ वर्ष के बीच है, जो यह बताने के लिए काफी है कि तस्करों की नजरें कितने अबोध और छोटे बच्चों पर जमी हुई हैं। इस पूरी कार्रवाई ने स्टेशन पर मौजूद यात्रियों और रेल अधिकारियों को हैरत में डाल दिया। तस्कर इन बच्चों को लेकर अवध एक्सप्रेस पकड़ने की फिराक में था, लेकिन समय रहते मिली सटीक सूचना ने मासूमों के भविष्य को अंधकार में जाने से बचा लिया। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि ये बच्चे झारखंड के सुदूर इलाकों और बिहार के भागलपुर क्षेत्र के रहने वाले हैं। इस घटना ने एक बार फिर बिहार और झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय ‘बाल श्रम’ और ‘मानव तस्करी’ के सिंडिकेट की कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है।
प्लेटफॉर्म नंबर-दो पर बिछाया गया ‘सुरक्षा का जाल’
शनिवार की शाम बापूधाम मोतिहारी स्टेशन पर आम दिनों की तरह ही भीड़भाड़ थी। यात्री अपनी-अपनी ट्रेनों का इंतजार कर रहे थे, तभी चाइल्ड लाइन और आरपीएफ की टीम को एक गोपनीय और बेहद संवेदनशील इनपुट मिला। सूचना थी कि एक युवक बड़ी संख्या में छोटे बच्चों को लेकर प्लेटफॉर्म संख्या-दो पर खड़ा है और उसकी गतिविधियां काफी संदिग्ध लग रही हैं। बिना किसी देरी के आरपीएफ के जवान और चाइल्ड लाइन के सदस्य सादे लिबास में प्लेटफॉर्म पर फैले और संदिग्ध युवक की निगरानी शुरू की।
जैसे ही 19038 अवध एक्सप्रेस के आने का समय करीब आया, वह युवक बच्चों को कतारबद्ध कर ट्रेन के कोच की ओर ले जाने की कोशिश करने लगा। इसी बीच अधिकारियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। अचानक हुई इस कार्रवाई से युवक हक्का-बक्का रह गया। जब उससे बच्चों के बारे में और उनके साथ संबंधों के बारे में पूछा गया, तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। बच्चों के चेहरों पर खौफ और अनिश्चितता साफ झलक रही थी। सुरक्षा टीम ने तुरंत सभी 21 बच्चों को अपनी अभिरक्षा में लिया और उन्हें स्टेशन स्थित सुरक्षा कार्यालय ले जाया गया, जहाँ उन्हें भोजन और पानी उपलब्ध कराकर शांत कराने की कोशिश की गई।
झारखंड का ‘फोन्सिस किस्पोटा’ चढ़ा पुलिस के हत्थे
मासूमों के साथ पकड़े गए आरोपित की पहचान फोन्सिस किस्पोटा के रूप में हुई है। वह मूल रूप से झारखंड के रांची जिले के महुआजाड़ी थाना क्षेत्र स्थित कनीजाड़ी गांव का निवासी है। पुलिस की पूछताछ में यह बात सामने आई कि वह एक पेशेवर अंदाज में इन बच्चों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने का काम करता था। आरोपित के पास से कुछ ऐसे दस्तावेज और मोबाइल नंबर भी मिले हैं, जिनकी जांच साइबर सेल और स्थानीय पुलिस कर रही है।
तस्कर ने बताया कि ये बच्चे झारखंड के विभिन्न ग्रामीण अंचलों और भागलपुर के पिछड़े इलाकों से लाए गए थे। हालांकि, इन बच्चों को कहाँ और किस उद्देश्य से ले जाया जा रहा था, इसका पूरा खुलासा अभी नहीं हो पाया है, लेकिन आरपीएफ को संदेह है कि इन्हें उत्तर प्रदेश या गुजरात के चूड़ी कारखानों या अन्य जोखिम भरे उद्योगों में बाल श्रम के लिए भेजा जाना था। फोन्सिस किस्पोटा ने बच्चों के माता-पिता को क्या लालच दिया था या वह उन्हें धोखे से लाया था, यह पुलिसिया तफ्तीश का मुख्य बिंदु बना हुआ है।
चांदवारी मोहल्ले का ‘डार्क’ कनेक्शन: 6 महीने से चल रहा था खेल
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब आरोपित के निवास स्थान की पड़ताल की गई। पुलिस को पता चला कि फोन्सिस किस्पोटा पिछले पांच से छह महीने से मोतिहारी शहर के ही चांदवारी मोहल्ले में एक किराए का मकान लेकर रह रहा था। एक बाहरी व्यक्ति का इतने लंबे समय तक शहर के बीचों-बीच किराए पर रहना और वहां बच्चों को छिपाकर रखना, स्थानीय खुफिया तंत्र और मकान मालिकों की सतर्कता पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।
जांच में यह भी सामने आया है कि वह समय-समय पर बच्चों को वहां लाता और फिर मौका पाकर ट्रेनों के जरिए उन्हें बाहर भेज देता था। चांदवारी मोहल्ले का वह मकान एक तरह से ‘ट्रांजिट पॉइंट’ के रूप में इस्तेमाल हो रहा था। पुलिस अब उस मकान मालिक से भी पूछताछ करने की तैयारी में है जिसने बिना किसी सत्यापन के एक संदिग्ध व्यक्ति को पनाह दी थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कभी गौर नहीं किया कि वहां इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को रखा जा रहा है, क्योंकि तस्कर उन्हें अक्सर घर के भीतर ही रखता था और केवल रात के अंधेरे में या तड़के बाहर निकालता था।
अवध एक्सप्रेस और तस्करी का पुराना रूट
बापूधाम मोतिहारी से होकर गुजरने वाली अवध एक्सप्रेस तस्करों की पसंदीदा ट्रेन मानी जाती है, क्योंकि यह बिहार को उत्तर प्रदेश और फिर सीधे गुजरात के औद्योगिक शहरों से जोड़ती है। शनिवार को भी तस्कर इसी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। तस्करी के इस खेल में अक्सर जनरल कोच का सहारा लिया जाता है ताकि भीड़ का फायदा उठाकर बच्चों को सुरक्षित निकाला जा सके।
आरपीएफ के अधिकारियों ने बताया कि इस रूट पर पहले भी कई बार बच्चों को रेस्क्यू किया गया है, लेकिन 21 बच्चों का एक साथ मिलना यह दर्शाता है कि सिंडिकेट काफी बड़ा है और इसके तार कई राज्यों से जुड़े हुए हैं। पकड़े गए बच्चों में से कई इतने छोटे हैं कि वे अपने माता-पिता का नाम और पूरा पता भी ठीक से नहीं बता पा रहे हैं। भागलपुर और झारखंड के इन मासूमों को जिस तरह से एक अजनबी के हवाले कर दिया गया, वह इन क्षेत्रों में व्याप्त गरीबी और शिक्षा के अभाव को भी दर्शाता है।
मेडिकल परीक्षण और सीडब्ल्यूसी को सौंपने की प्रक्रिया
मुक्त कराए गए सभी 21 बच्चों को वर्तमान में चाइल्ड लाइन के संरक्षण में एक सुरक्षित आश्रय गृह (Shelter Home) में रखा गया है। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम अब इन सभी बच्चों का विस्तृत मेडिकल परीक्षण करा रही है। यह जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है ताकि यह पता चल सके कि इन बच्चों को कोई नशीला पदार्थ तो नहीं दिया गया था या उनके साथ किसी प्रकार की शारीरिक प्रताड़ना तो नहीं हुई थी।
मेडिकल प्रक्रिया पूरी होने के बाद, सभी बच्चों को जिला बाल कल्याण समिति (CWC) के समक्ष पेश किया जाएगा। सीडब्ल्यूसी के अधिकारी बच्चों की काउंसलिंग करेंगे ताकि उनके घर के पतों और माता-पिता की जानकारी जुटाई जा सके। इसके बाद संबंधित जिलों (झारखंड और भागलपुर) की पुलिस और बाल कल्याण समितियों से संपर्क साधा जाएगा ताकि इन बच्चों को उनके परिजनों तक सुरक्षित पहुँचाया जा सके। जब तक उनके परिजन मोतिहारी नहीं पहुँचते, तब तक ये बच्चे सरकारी संरक्षण में ही रहेंगे।
तस्करी के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ और भविष्य की सतर्कता
मोतिहारी के पुलिस अधीक्षक और आरपीएफ के आला अधिकारियों ने इस सफल ऑपरेशन की सराहना की है। अधिकारियों का कहना है कि बापूधाम मोतिहारी स्टेशन पर सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक कड़ा किया जा रहा है। विशेष रूप से उन ट्रेनों पर नजर रखी जा रही है जो लंबी दूरी की हैं और जिनसे तस्करी की संभावना अधिक रहती है।
पुलिस ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि यदि वे किसी स्टेशन, बस स्टैंड या मोहल्ले में बड़ी संख्या में छोटे बच्चों को किसी संदिग्ध व्यक्ति के साथ देखें, तो तुरंत इसकी जानकारी ‘1098’ (चाइल्ड हेल्पलाईन) या नजदीकी पुलिस थाने को दें। फोन्सिस किस्पोटा से पूछताछ के आधार पर बिहार और झारखंड के कुछ अन्य ठिकानों पर भी छापेमारी की योजना बनाई जा रही है। मोतिहारी का यह मामला एक बड़ी चेतावनी है कि हमारे समाज के मासूम आज भी ‘मानव रूपी भेड़ियों’ की नजरों में हैं, और उनकी सुरक्षा के लिए केवल कानून ही नहीं, बल्कि सामाजिक सतर्कता भी उतनी ही जरूरी है। फिलहाल, 21 परिवारों के चिरागों को बुझने से पहले बचा लिया गया है, और प्रशासन अब इस अपराध की जड़ तक पहुँचने की कोशिश में जुटा है।


