
भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (JLNMCH) में शुक्रवार को थैलेसीमिया को लेकर विशेष जागरूकता कार्यक्रम और सेमिनार का आयोजन किया गया। बाल रोग विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में पटना के मेदांता अस्पताल से आए विशेषज्ञ डॉक्टरों ने थैलेसीमिया की रोकथाम, जांच और आधुनिक उपचार पद्धतियों पर विस्तार से जानकारी दी।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य लोगों के बीच इस गंभीर आनुवंशिक बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ाना और मरीजों को सही समय पर उपचार उपलब्ध कराने के महत्व को समझाना था।
सेमिनार में बड़ी संख्या में डॉक्टर, मेडिकल छात्र, मरीज और उनके परिजन मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि थैलेसीमिया ऐसी बीमारी है जिसे जागरूकता और समय पर जांच के जरिए काफी हद तक रोका जा सकता है।
कार्यक्रम में मेदांता अस्पताल, पटना से आए हेमटो-ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अमित कुमार ने थैलेसीमिया की गंभीरता और इसके बढ़ते मामलों पर विस्तार से चर्चा की। उनके साथ डॉक्टर सी.एच. निशांत कुमार, अक्षय कुमार और नंदनी कुमारी सहित अन्य विशेषज्ञों ने भी अपने विचार साझा किए।
वहीं JLNMCH के पीडियाट्रिक विभाग के डॉ. अंकुर प्रियदर्शी, डॉ. राकेश कुमार, डॉ. अनिल कुमार और अन्य वरिष्ठ चिकित्सकों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया।
सेमिनार के दौरान वर्ष 2026 की थीम “Hidden No More: Finding the Undiagnosed, Supporting the Unseen” पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्हें यह पता ही नहीं होता कि वे थैलेसीमिया माइनर से प्रभावित हैं। यही वजह है कि जागरूकता और समय पर जांच बेहद जरूरी हो जाती है।
डॉ. अमित कुमार ने बताया कि थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त संबंधी बीमारी है, जो माता-पिता से बच्चों में पहुंचती है। अगर दोनों माता-पिता थैलेसीमिया माइनर होते हैं, तो उनके बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने की आशंका काफी बढ़ जाती है।
उन्होंने कहा कि थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों को जीवनभर नियमित रूप से खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे मरीजों का इलाज लंबा और महंगा होता है, जिससे परिवारों पर मानसिक और आर्थिक दोनों तरह का दबाव पड़ता है।
विशेषज्ञों ने लोगों से शादी से पहले और परिवार नियोजन से पहले CBC और HPLC टेस्ट कराने की अपील की। उन्होंने कहा कि इन जांचों के जरिए थैलेसीमिया माइनर का पता लगाया जा सकता है और समय रहते सावधानी बरतकर गंभीर मामलों को रोका जा सकता है।
डॉक्टरों ने कहा कि भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी है, वहां थैलेसीमिया के प्रति जागरूकता की बेहद जरूरत है। ग्रामीण और कम जागरूक क्षेत्रों में अब भी लोग इस बीमारी और इसकी जांच को लेकर पर्याप्त जानकारी नहीं रखते।
सेमिनार के दौरान थैलेसीमिया मरीजों के उपचार और देखभाल को लेकर भी विस्तृत चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और आयरन क्लेशन थेरेपी थैलेसीमिया मरीजों के लिए बेहद जरूरी होती है।
डॉ. निशांत कुमार ने बताया कि बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है, जो दिल, लीवर और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसे में आयरन क्लेशन थेरेपी मरीजों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कार्यक्रम में आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों और बोन मैरो ट्रांसप्लांट यानी BMT पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट के जरिए थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी का स्थायी इलाज संभव हो सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक जटिल और महंगी प्रक्रिया है, इसलिए समय पर पहचान और रोकथाम सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।
सेमिनार में मौजूद डॉक्टरों ने कहा कि थैलेसीमिया को केवल मेडिकल समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे सामाजिक जागरूकता से भी जोड़ने की जरूरत है।
विशेषज्ञों ने कहा कि स्कूलों, कॉलेजों और समाज के विभिन्न स्तरों पर जागरूकता अभियान चलाकर इस बीमारी को लेकर लोगों को जागरूक किया जा सकता है।
JLNMCH के डॉक्टरों ने कहा कि अस्पताल में थैलेसीमिया मरीजों के इलाज और परामर्श को लेकर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। आने वाले समय में जागरूकता कार्यक्रमों को और व्यापक स्तर पर आयोजित करने की योजना भी बनाई जा रही है।
कार्यक्रम के दौरान मरीजों और उनके परिजनों ने डॉक्टरों से सवाल भी पूछे। विशेषज्ञों ने उन्हें बीमारी की जांच, उपचार और सावधानियों को लेकर विस्तृत जानकारी दी।
सामाजिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार जैसे राज्यों में थैलेसीमिया को लेकर जागरूकता अब भी सीमित है। ऐसे में इस तरह के सेमिनार और जागरूकता अभियान काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार समय पर जांच और जागरूकता के जरिए थैलेसीमिया मेजर के मामलों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
डॉक्टरों ने यह भी कहा कि समाज में थैलेसीमिया से जुड़े भ्रम और डर को दूर करने की जरूरत है ताकि लोग खुलकर जांच और इलाज के लिए आगे आएं।
कार्यक्रम के अंत में लोगों से अपील की गई कि वे शादी से पहले जरूरी जांच अवश्य कराएं और थैलेसीमिया को लेकर जागरूक रहें।
भागलपुर में आयोजित यह सेमिनार केवल एक चिकित्सा कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोगों को गंभीर आनुवंशिक बीमारियों के प्रति जागरूक करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बनकर सामने आया।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समाज और स्वास्थ्य संस्थान मिलकर लगातार जागरूकता अभियान चलाएं तो आने वाले वर्षों में थैलेसीमिया जैसी बीमारियों के मामलों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।


