​बिहपुर के दो दिग्गज अब सम्राट सरकार के ‘वजीर’: 15 साल की सियासी अदावत का अंत, जब कट्टर प्रतिद्वंद्वी बने कैबिनेट सहयोगी

पटना/भागलपुर। बिहार की सत्ता के गलियारों में गुरुवार, 07 मई 2026 की तारीख एक ऐसी राजनैतिक पटकथा के मिलन का गवाह बनी, जिसकी कल्पना पिछले डेढ़ दशक से अंग जनपद की धरती पर किसी ने नहीं की थी। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार ने भागलपुर जिले के नवगछिया अनुमंडल के दो ऐसे योद्धाओं को एक ही मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है, जो 15 साल तक एक-दूसरे की राजनैतिक जमीन खींचने के लिए संघर्षरत रहे। कुमार शैलेन्द्र और शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल—ये वो दो नाम हैं जिनकी आपसी प्रतिद्वंद्विता ने बिहपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति को लंबे समय तक परिभाषित किया है। यह बिहार के संसदीय इतिहास का संभवतः पहला और सबसे रोचक संयोग है कि बिहपुर विधानसभा क्षेत्र के ही रहने वाले दो पुराने प्रतिद्वंद्वी अब एक साथ कैबिनेट की मेज पर बैठकर राज्य के भविष्य का फैसला करेंगे। नवगछिया अनुमंडल के लिए यह गौरव का क्षण है क्योंकि पहली बार यहाँ के दो विधायकों को एक साथ मंत्रिमंडल में जगह मिली है।

बिहपुर का रणक्षेत्र: 15 साल की चुनावी जंग का सफरनामा

​कुमार शैलेन्द्र और बुलो मंडल के बीच की राजनैतिक जंग महज दो नेताओं का टकराव नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं और व्यक्तिगत जनाधारों का एक ऐसा महायुद्ध था जिसने बिहपुर की रेतीली जमीन को बार-बार चुनावी ताप से तपाया। इस राजनैतिक संघर्ष की शुरुआत उस दौर में हुई जब बिहार की राजनीति करवट ले रही थी। बुलो मंडल, जो उस समय राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के एक कद्दावर और आक्रामक चेहरे के रूप में उभर रहे थे, उन्होंने बिहपुर सीट पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली थी। वे साल 2000, फिर फरवरी 2005 और उसके बाद अक्टूबर 2005 के चुनावों में लगातार निर्वाचित होकर विधानसभा पहुँचे।

​अक्टूबर 2005 का चुनाव वह निर्णायक मोड़ था जहाँ इन दोनों दिग्गजों का सीधा टकराव हुआ। उस चुनाव में बुलो मंडल ने भाजपा के प्रत्याशी कुमार शैलेन्द्र को पराजित कर अपनी श्रेष्ठता साबित की थी। लेकिन राजनीति में वक्त का पहिया घूमते देर नहीं लगती। साल 2010 के विधानसभा चुनाव में बाजी पलट गई। भाजपा के बैनर तले कुमार शैलेन्द्र ने जबरदस्त वापसी की और बुलो मंडल को हराकर पहली बार विधायक की कुर्सी तक पहुँचे। यह हार और जीत का सिलसिला केवल एक सीट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने दोनों नेताओं के बीच एक ऐसी राजनैतिक दीवार खड़ी कर दी जो 15 वर्षों तक अटूट रही।

जब बुलो मंडल बने ‘जायंट किलर’ और शैलेन्द्र की चुनौतियां बढ़ीं

​साल 2014 का दौर बुलो मंडल के राजनैतिक करियर का सबसे बड़ा शिखर लेकर आया। देश में मोदी लहर के बावजूद, बुलो मंडल ने भागलपुर लोकसभा क्षेत्र से राजद के टिकट पर लड़ते हुए भाजपा के दिग्गज नेता सैयद शाहनवाज हुसैन को मात दी और सांसद बनकर दिल्ली पहुँचे। उनके सांसद बनने के बाद बिहपुर की बिसात पर एक नया मोहरा उतरा। 2015 के विधानसभा चुनाव में बुलो मंडल की पत्नी वर्षा रानी मैदान में आईं और उन्होंने एक बार फिर कुमार शैलेन्द्र को शिकस्त देकर बिहपुर की सत्ता पर मंडल परिवार का कब्जा बरकरार रखा।

​राजनैतिक गलियारों में यह माना जाने लगा था कि बिहपुर की जंग अब व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी है। 2020 का चुनाव एक बार फिर इन दोनों प्रतिद्वंद्वियों को आमने-सामने ले आया। इस बार कुमार शैलेन्द्र ने अपनी रणनीतिक कुशलता का परिचय देते हुए बुलो मंडल को फिर से पराजित किया और विधानसभा में अपनी जगह पक्की की। 2020 की इस हार ने बुलो मंडल को अपनी राजनैतिक जमीन और भविष्य के बारे में सोचने पर मजबूर किया, जिसके बाद उन्होंने राजद का साथ छोड़कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का दामन थाम लिया।

2025 का नया समीकरण: प्रतिद्वंद्विता से साझेदारी तक का सफर

​2025 का विधानसभा चुनाव इन दोनों नेताओं के लिए एक नई शुरुआत लेकर आया। एनडीए गठबंधन के भीतर अब समीकरण बदल चुके थे। बुलो मंडल अब जदयू के सिपाही थे और कुमार शैलेन्द्र भाजपा के पुराने स्तंभ। 2025 में जदयू ने एक बड़ा और साहसिक निर्णय लेते हुए गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र से चार बार के विधायक रहे नरेन्द्र कुमार नीरज उर्फ गोपाल मंडल का टिकट काट दिया और वहां से बुलो मंडल को अपना प्रत्याशी बनाया। यह बुलो मंडल के लिए एक नई राजनैतिक पारी की शुरुआत थी, जहाँ उन्होंने गोपालपुर की जनता का भरोसा जीतकर जीत दर्ज की।

​वहीं दूसरी ओर, कुमार शैलेन्द्र ने अपने गढ़ बिहपुर से भाजपा के टिकट पर एक बार फिर जीत का परचम लहराया। इस प्रकार, पहली बार ये दोनों नेता एक ही गठबंधन (NDA) का हिस्सा बनकर सदन में पहुँचे। अब सम्राट चौधरी की सरकार में इन दोनों को मंत्री पद की शपथ दिलाकर एनडीए नेतृत्व ने भागलपुर और नवगछिया क्षेत्र को एक साथ दो सशक्त ‘पॉवर सेंटर’ दे दिए हैं। कुमार शैलेन्द्र जहाँ तीसरी बार विधायक बनकर अपनी प्रशासनिक परिपक्वता के साथ कैबिनेट में आए हैं, वहीं बुलो मंडल चार बार विधायक और एक बार सांसद रहने के विशाल अनुभव के साथ सरकार का हिस्सा बने हैं।

एक ही गांव, एक ही क्षेत्र: बिहपुर की बढ़ी राजनैतिक हनक

​इस पूरे घटनाक्रम की सबसे रोचक बात यह है कि कुमार शैलेन्द्र और बुलो मंडल, दोनों ही बिहपुर विधानसभा क्षेत्र के ही निवासी हैं। भागलपुर जिले के इतिहास में यह दुर्लभ अवसर है जब एक ही छोटे से इलाके के दो लोग राज्य सरकार में कैबिनेट स्तर की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। 15 साल तक एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में खून-पसीना बहाने वाले ये नेता अब जब कैबिनेट की बैठकों में एक साथ बैठेंगे, तो बिहपुर और गोपालपुर की जनता के बीच भी एक सकारात्मक संदेश जाएगा।

​प्रशासनिक स्तर पर इन दोनों की नियुक्ति से नवगछिया अनुमंडल के विकास को ‘डबल बूस्टर’ मिलने की उम्मीद है। कुमार शैलेन्द्र की सधी हुई कार्यशैली और बुलो मंडल का ग्रामीण क्षेत्रों में जबरदस्त जनसंपर्क अब राज्य सरकार के कामकाज में दिखाई देगा। एनडीए नेतृत्व ने इन दोनों पुराने प्रतिद्वंद्वियों को एक साथ लाकर न केवल भागलपुर के राजनैतिक समीकरणों को साधा है, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि विकास के लक्ष्यों के लिए पुरानी कड़वाहट को भुलाकर साथ चलना ही सुशासन की असली पहचान है। अब देखना यह होगा कि 15 साल की सियासी अदावत को पीछे छोड़कर ये दो अनुभवी वजीर बिहार के नवनिर्माण में किस तरह अपनी जुगलबंदी दिखाते हैं।

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