हरित जीविका, हरित बिहार: जीविका दीदियों की मेहनत से बिहार में बढ़ी हरियाली, घर-घर आई खुशहाली

पटना, 2 मई।बिहार में पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण का एक अनूठा मॉडल तेजी से उभरकर सामने आया है। “हरित जीविका, हरित बिहार” कार्यक्रम के तहत जीविका दीदियां न केवल हरियाली बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही हैं, बल्कि यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रही है। पिछले छह वर्षों में इन दीदियों के प्रयासों से राज्यभर में चार करोड़ से अधिक पौधरोपण किया जा चुका है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

यह पहल ग्रामीण विकास विभाग के नेतृत्व में चल रही है, जिसमें स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं। आंकड़ों के अनुसार, करीब एक करोड़ जीविका दीदियां इस अभियान से जुड़ी हुई हैं और वे जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में एक मजबूत सामाजिक शक्ति के रूप में सामने आई हैं।

पर्यावरण और आजीविका का अनोखा संगम

“हरित जीविका, हरित बिहार” केवल एक पौधरोपण कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन का एक सफल मॉडल बन चुका है। इस योजना के तहत वर्ष 2019 से 2024-25 के बीच राज्यभर में 987 नर्सरियों का विकास किया गया है, जिनमें 677 पौधशालाएं सीधे तौर पर जीविका दीदियों द्वारा संचालित की जा रही हैं।

इन नर्सरियों के माध्यम से लाखों पौधे तैयार किए जा रहे हैं, जो बाद में गांवों, खेतों और सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाते हैं। यह मॉडल कम लागत में अधिक उत्पादन का उदाहरण है, जिसमें स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए बड़े पैमाने पर हरियाली बढ़ाई जा रही है।

चार करोड़ से अधिक पौधरोपण, बढ़ी हरियाली

जीविका दीदियों के प्रयासों का सबसे बड़ा परिणाम राज्य में हुए व्यापक पौधरोपण के रूप में सामने आया है। आंकड़ों के अनुसार, अब तक चार करोड़ से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं। इनमें से लगभग 1.04 करोड़ पौधे चार फीट से अधिक ऊंचाई तक विकसित हो चुके हैं, जो इस पहल की सफलता को दर्शाता है।

यह केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि इससे बिहार के ग्रामीण इलाकों में पर्यावरणीय संतुलन बेहतर हुआ है। पेड़ों की संख्या बढ़ने से न केवल जलवायु पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता, जल संरक्षण और जैव विविधता में भी सुधार देखा गया है।

महिलाओं के लिए आय का स्थायी स्रोत

इस योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे महिलाओं के लिए रोजगार और आय के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। नर्सरी संचालन के माध्यम से जीविका दीदियां न केवल पौधे तैयार करती हैं, बल्कि उनकी बिक्री से आर्थिक लाभ भी अर्जित करती हैं।

यह मॉडल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां रोजगार के सीमित अवसर होते हैं, वहां यह पहल महिलाओं के लिए स्थिर आय का साधन बन गई है। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है और सामाजिक स्तर पर उनकी भूमिका भी मजबूत हुई है।

चयन और प्रशिक्षण की सुदृढ़ व्यवस्था

नर्सरी संचालन के लिए जीविका दीदियों का चयन एक व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत किया जाता है। संकुल स्तरीय संघ के माध्यम से उन्हीं महिलाओं को चुना जाता है जो स्वयं सहायता समूह की सक्रिय सदस्य हों और जिनकी वित्तीय साख मजबूत हो।

चयनित दीदियों को विभिन्न विभागों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग उन्हें इमारती लकड़ी के पौधों की तैयारी और संरक्षण का प्रशिक्षण देता है। वहीं, कृषि विभाग के अंतर्गत उद्यान निदेशालय द्वारा फलदार पौधों की देखभाल और उत्पादन के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।

वैशाली के देसारी स्थित सेंटर फॉर एक्सीलेंस में 15 दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां दीदियों को आधुनिक तकनीकों से अवगत कराया जाता है। इससे उनकी कार्यक्षमता और उत्पादन क्षमता दोनों में वृद्धि होती है।

जलवायु परिवर्तन से लड़ने में अहम भूमिका

आज के समय में जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती बन चुका है। ऐसे में बिहार की यह पहल एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में सामने आई है। बड़े पैमाने पर पौधरोपण और हरियाली बढ़ाने से कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलती है।

इसके अलावा, पेड़ों के माध्यम से वर्षा चक्र को संतुलित करने, तापमान को नियंत्रित करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी सहायता मिलती है। इस तरह जीविका दीदियां पर्यावरण की रक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

सामुदायिक भागीदारी से मिली सफलता

इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी ताकत इसकी सामुदायिक भागीदारी है। गांव-गांव में जीविका समूहों के माध्यम से यह अभियान लोगों तक पहुंचा है। इससे लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है और वे स्वयं भी इस अभियान का हिस्सा बन रहे हैं।

पौधरोपण के साथ-साथ पौधों की देखभाल पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिससे उनकी जीवित रहने की दर अधिक हो। यह सुनिश्चित करता है कि लगाए गए पौधे वास्तव में पेड़ों में विकसित हों और लंबे समय तक पर्यावरण को लाभ पहुंचाएं।

भविष्य की दिशा

सरकार का लक्ष्य इस पहल को और व्यापक स्तर पर ले जाने का है। आने वाले वर्षों में और अधिक नर्सरियों की स्थापना, नई तकनीकों का उपयोग और अधिक महिलाओं को इस कार्यक्रम से जोड़ने की योजना है।

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