​सुल्तानगंज का सियासी रसूख: रसोइया से डिप्टी चेयरमैन तक नीलम देवी का सफर, लोजपा के टिकट पर आजमाई थी किस्मत

भागलपुर। सुल्तानगंज नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार की हत्या और उसके बाद मुख्य आरोपी रामधनी यादव के एनकाउंटर ने पूरे बिहार के प्रशासनिक और राजनैतिक हलकों में खलबली मचा दी है। इस सनसनीखेज घटनाक्रम के बीच अब रामधनी यादव के परिवार के गहरे राजनैतिक रसूख की परतें खुलने लगी हैं। रामधनी यादव केवल अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह नहीं था, बल्कि उसने अपने बाहुबल और धनबल के सहारे अपने परिवार को सुल्तानगंज की सत्ता के शीर्ष पर बिठा रखा था। उसकी पत्नी नीलम देवी का राजनैतिक सफर किसी फिल्मी पटकथा की तरह है, जो एक समय प्राथमिक स्कूल में रसोइया का काम करती थीं और आज सुल्तानगंज नगर परिषद की उपमुख्य पार्षद के पद पर काबिज हैं। इतना ही नहीं, नीलम देवी ने अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को विस्तार देते हुए विधानसभा के चुनावी मैदान में भी ताल ठोंकी थी, जहाँ उन्हें हजारों की संख्या में वोट मिले थे।

2020 विधानसभा चुनाव और 10 हजार से अधिक वोट

​नीलम देवी का राजनैतिक कद उस समय चर्चा में आया जब उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में अपनी किस्मत आजमाई। सुल्तानगंज विधानसभा क्षेत्र से उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के आधिकारिक टिकट पर चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में भले ही वे जीत हासिल नहीं कर सकीं, लेकिन उन्होंने अपनी उपस्थिति का अहसास जरूर कराया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बतौर लोजपा प्रत्याशी नीलम देवी को कुल 10,222 वोट मिले थे। चुनाव के दौरान रामधनी यादव ने अपनी पत्नी की जीत के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। हालांकि वे तीसरे नंबर पर रही थीं, लेकिन 10 हजार से अधिक वोट पाना यह दर्शाता था कि सुल्तानगंज के ग्रामीण और शहरी इलाकों में रामधनी यादव का कितना गहरा प्रभाव था। उस समय लोजपा ने उन्हें एक मजबूत महिला उम्मीदवार के रूप में पेश किया था, जो स्थानीय मुद्दों और नगर परिषद के अपने अनुभवों के दम पर चुनाव लड़ रही थीं।

नगर परिषद की सत्ता पर कब्जा: मुख्य पार्षद से उपमुख्य पार्षद तक

​नीलम देवी का स्थानीय निकाय की राजनीति में दबदबा साल 2017 से शुरू हुआ था जब वे पहली बार वार्ड 11 से पार्षद चुनी गई थीं। रामधनी यादव ने अपनी राजनैतिक गोटियां इस तरह फिट की थीं कि 2019 में तत्कालीन सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर उन्हें कुर्सी से हटाया गया और नीलम देवी को सुल्तानगंज नगर परिषद का मुख्य पार्षद (चेयरमैन) बनवाया गया। साल 2019 से लेकर 2022 तक नीलम देवी सुल्तानगंज नगर परिषद की मुख्य पार्षद रहीं।

​साल 2022 में जब दोबारा नगर निकाय चुनाव हुए, तब मुख्य पार्षद की सीट अतिपिछड़ा वर्ग (EBC) श्रेणी के लिए आरक्षित हो गई। इस आरक्षण के कारण नीलम देवी मुख्य पार्षद के पद पर चुनाव नहीं लड़ सकती थीं। ऐसी स्थिति में सत्ता से दूर रहने के बजाय रामधनी ने नई रणनीति बनाई और नीलम देवी ने उपमुख्य पार्षद (डिप्टी चेयरमैन) के पद पर चुनाव लड़कर भारी मतों से जीत हासिल की। वर्तमान में वे इसी पद पर कार्यरत हैं। यह उनके परिवार की सत्ता पर पकड़ ही थी कि आरक्षित सीट होने के बावजूद वे उपमुख्य पार्षद की कुर्सी बचाने में सफल रहीं और नगर परिषद के फैसलों में रामधनी का हस्तक्षेप बरकरार रहा।

लोजपा की सफाई और राजनैतिक दूरी

​रामधनी यादव के एनकाउंटर और ईओ की हत्या के बाद राजनैतिक दलों में अपनी छवि बचाने की होड़ मच गई है। लोजपा की प्रदेश सचिव संगीता तिवारी ने इस पूरे मामले पर पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए एक बयान जारी किया है। संगीता तिवारी ने बताया कि रामधनी यादव स्वयं लोजपा के किसी भी आधिकारिक पद पर कभी नहीं रहे हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि उनकी पत्नी नीलम देवी ने 2020 में सुल्तानगंज विधानसभा चुनाव में लोजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था। पार्टी सूत्रों का कहना है कि उस समय के गठबंधन और स्थानीय समीकरणों के आधार पर उन्हें उम्मीदवार बनाया गया था। एनकाउंटर के बाद अब पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि रामधनी के व्यक्तिगत आपराधिक कृत्यों से दल का कोई लेना-देना नहीं है।

अगली पीढ़ी का नेतृत्व: मनीष कुमार और युवा लोजपा (R)

​रामधनी यादव ने केवल अपनी पत्नी को ही नहीं, बल्कि अपने बेटों को भी राजनैतिक रूप से स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। रामधनी का दूसरा बेटा मनीष कुमार वर्तमान में चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का भागलपुर युवा जिला अध्यक्ष है। मनीष कुमार युवाओं के बीच सक्रिय रहते हैं और लोजपा (आर) के कार्यक्रमों में उनकी अग्रणी भूमिका रहती है। वहीं, उनका बड़ा बेटा सन्नी यादव एमएलसी प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय है। रामधनी का परिवार केवल एक अपराधी का परिवार नहीं रह गया था, बल्कि वह एक ऐसा राजनैतिक कुनबा बन चुका था जिसके तार पटना से लेकर दिल्ली तक जुड़े हुए थे। कई केंद्रीय मंत्रियों और एनडीए के दिग्गज नेताओं के साथ रामधनी और उसके परिवार की तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं, जो यह बताती हैं कि उसने अपराध की काली कमाई को राजनैतिक संरक्षण में कैसे बदला था।

रसोइया से करोड़ों के साम्राज्य की स्वामिनी

​नीलम देवी का सफर सामाजिक और आर्थिक रूप से भी काफी विवादास्पद और चर्चाओं में रहा है। एक दौर था जब रामधनी यादव घर-घर जाकर दूध बेचता था और नीलम देवी सुल्तानगंज के ही एक प्राथमिक विद्यालय में बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) पकाती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी और वे झोपड़ी में रहते थे। लेकिन साल 2000 के बाद जैसे-जैसे रामधनी का अपराध ग्राफ बढ़ा, परिवार की माली हालत भी तेजी से बदलती गई। जमीनों पर कब्जे, बस स्टैंड की ठेकेदारी और रंगदारी के धंधे ने उन्हें देखते ही देखते करोड़ों का मालिक बना दिया। आज नीलम देवी 5 करोड़ से अधिक की चल-अचल संपत्ति की मालकिन हैं। उनके पास आलीशान मकान और कई लग्जरी गाड़ियां हैं। एक रसोइया से लेकर एक रसूखदार राजनेता बनने तक का यह सफर सुल्तानगंज के लोगों के लिए खौफ और आश्चर्य का मिश्रण रहा है।

वर्चस्व की जंग और हिंसक इतिहास

​नीलम देवी के राजनैतिक उत्थान में हिंसा की भी अहम भूमिका रही है। साल 2019 में जब तत्कालीन चेयरमैन दयावती देवी की कुर्सी गई थी, तब नीलम देवी पर उन पर जानलेवा हमला करने का आरोप लगा था। इस मामले में नीलम देवी को जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। रामधनी और नीलम देवी का पूरा राजनैतिक करियर प्रतिद्वंद्वियों को डराने और अविश्वास प्रस्तावों के जरिए कुर्सियां हथियाने पर टिका था। सुल्तानगंज नगर परिषद में रामधनी का खौफ इतना था कि कोई भी ठेकेदार या पार्षद उसके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं करता था। ईओ कृष्ण भूषण कुमार की हत्या भी इसी वर्चस्व की लड़ाई का हिस्सा थी, क्योंकि वे रामधनी के अवैध हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हो रहे थे।

​रामधनी यादव के एनकाउंटर के बाद अब सुल्तानगंज की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। नीलम देवी फिलहाल उपमुख्य पार्षद के पद पर बनी हुई हैं, लेकिन पति की मौत और परिवार पर लगे संगीन आरोपों के बाद उनकी राजनैतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है। जिला प्रशासन अब इस बात की भी जांच कर रहा है कि क्या नीलम देवी के चुनावी खर्च और संपत्तियों में रामधनी की काली कमाई का इस्तेमाल हुआ था। आने वाले दिनों में नीलम देवी की कुर्सी और उनकी राजनैतिक सदस्यता पर भी तलवार लटक सकती है, क्योंकि प्रशासन अब इस माफिया नेटवर्क की आर्थिक जड़ें खोदने में जुट गया है।

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