
मुजफ्फरपुर/मधुबनी। नियति का खेल भी कितना क्रूर होता है, इसकी एक हृदयविदारक बानगी सुल्तानगंज नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) ई. कृष्ण भूषण ठाकुर की शहादत के बाद देखने को मिल रही है। मुजफ्फरपुर के जिस नए आशियाने को उन्होंने बड़े अरमानों से तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था और जहाँ आगामी 2 मई 2026 को मंगल गीतों के बीच ‘गृहप्रवेश’ होना था, वहां नियति ने महज 5 दिन पहले ही उनकी अर्थी पहुँचा दी। सोमवार को ही उन्होंने अपने चचेरे बड़े भाई अजय कुमार और अन्य परिजनों को फोन कर बड़े उत्साह से मुजफ्फरपुर आने का न्योता दिया था। किसी को अंदाजा नहीं था कि वह फोन कॉल उनकी आखिरी विदाई का निमंत्रण बन जाएगा। इस घटना ने न केवल मधुबनी स्थित उनके पैतृक गांव को झकझोर दिया है, बल्कि बिहार के प्रशासनिक गलियारों में भी मातम का सन्नाटा पसरा है।
अधूरा रह गया ‘गृहप्रवेश’ का सपना: 2 मई की तैयारी थी खास
ई. कृष्ण भूषण ठाकुर ने मुजफ्फरपुर में अपना नया घर बनाया था। वे अपने परिवार और बच्चों के साथ वहां बसने का सपना देख रहे थे।
- आखिरी बातचीत: सोमवार को उन्होंने परिजनों से लंबी बात की थी और 2 मई के कार्यक्रम के लिए सभी को आमंत्रित किया था। वे बहुत खुश थे कि आखिरकार उनका अपना घर तैयार हो गया है।
- मातम में बदली तैयारी: जिस घर में रोशनी और उत्सव की तैयारी होनी चाहिए थी, वहां अब केवल आंसुओं और सन्नाटे का पहरा है। सुल्तानगंज में मीटिंग के दौरान हुई उनकी हत्या ने एक हँसते-खेलते परिवार की खुशियों को जड़ से उजाड़ दिया है।
संघर्ष और सफलता की कहानी: भाइयों का थे मजबूत सहारा
कृष्ण भूषण का परिवार शुरू से ही मेधावी और संघर्षशील रहा है। उनके पिता रामचंद्र साह एक प्रोफेसर थे, जिनका निधन 1991 में ही हो गया था। पिता के साये के बिना कृष्ण भूषण ने कड़ी मेहनत की और 2016 में बीपीएससी (BPSC) की परीक्षा पास कर अधिकारी बने। वे चार भाइयों में दूसरे स्थान पर थे और उनका पूरा परिवार समाज में एक ‘एचीवर फैमिली’ के रूप में जाना जाता है:
- बड़े भाई: कृषि विभाग में वरिष्ठ अधिकारी हैं।
- तीसरे भाई: प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में ट्रांसलेटर के रूप में देश की सेवा कर रहे हैं।
- चौथे भाई: सीतामढ़ी पॉलिटेक्निक कॉलेज में कार्यरत हैं।
छठ पर्व पर जब वे घर आए थे, तब स्थानीय लोगों से बहुत गर्मजोशी से मिले थे। समाजसेवी धर्मवीर प्रसाद बताते हैं कि उनका स्वभाव बेहद सरल और मददगार था, जिसकी वजह से वे पूरे इलाके के चहेते थे।
अनाथ हुए मासूम: 2 साल का बेटा और 6 माह की बेटी
इस जघन्य हत्याकांड ने सबसे बड़ा घाव उन मासूम बच्चों को दिया है, जो अभी ‘पिता’ शब्द का मतलब भी ठीक से नहीं समझते।
- मासूमों का भविष्य: कृष्ण भूषण अपने पीछे महज 2 साल का बेटा और 6 माह की छोटी सी बेटी को छोड़ गए हैं।
- पत्नी का दुख: उनकी शादी 2022 में मोतिहारी में हुई थी। उनकी पत्नी (जो स्वयं यूपी में एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर हैं) और बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है। ग्रामीणों का कहना है कि इन मासूमों के सिर से पिता का साया छीनने वाले हत्यारों को ऐसी सजा मिले जो एक नजीर बने।
ग्रामीणों का आक्रोश: “सुरक्षा और नौकरी” की मांग
इस घटना के बाद मधुबनी और मुजफ्फरपुर के स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा है। ग्रामीणों ने दोटूक कहा है कि बिहार में अगर एक अधिकारी अपने दफ्तर के भीतर सुरक्षित नहीं है, तो आम जनता की सुरक्षा का क्या होगा?
ई. कृष्ण भूषण ठाकुर केवल एक अधिकारी नहीं थे, वे अपने परिवार की उम्मीद और अपने इलाके का गौरव थे। मुजफ्फरपुर के उस नए घर की दीवारें आज भी शायद उनके गृहप्रवेश के कदमों का इंतजार कर रही हैं, लेकिन अब वहां केवल उनकी वीरता और कर्तव्यनिष्ठा की यादें ही शेष हैं।


