
पटना। बिहार की सत्ता में हुए युगांतरकारी बदलाव के बाद अब सरकार अपनी पहली राजनैतिक परीक्षा यानी ‘फ्लोर टेस्ट’ के लिए पूरी तरह तैयार है। राजधानी पटना के राजनैतिक गलियारों में इस वक्त सबसे बड़ी चर्चा का विषय मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का कद और उन्हें मिला समर्थन है। उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026 को होने वाले बहुमत परीक्षण से ठीक पहले एक ऐसा बयान दिया है जिसने राज्य की भावी राजनीति की दिशा स्पष्ट कर दी है। विजय चौधरी ने जोर देकर कहा कि बिहार में आज अगर भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री है, तो वह पूरी तरह से नीतीश कुमार की उदारता और उनके ‘आशीर्वाद’ का परिणाम है। यह बयान केवल एक राजनैतिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि उस गहरे रणनीतिक गठबंधन की पुष्टि करता है जिसने बिहार में पहली बार भाजपा को नेतृत्व की मुख्य भूमिका में ला खड़ा किया है। उपमुख्यमंत्री के अनुसार, नीतीश कुमार ने गठबंधन धर्म की मर्यादा को ऊपर रखते हुए स्वयं भाजपा के मुख्यमंत्री का मार्ग प्रशस्त किया, जो बिहार के राजनैतिक इतिहास में एक दुर्लभ उदाहरण है।
त्याग और सम्मान की नई इबारत: नीतीश ने क्यों छोड़ा पद?
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने जदयू कार्यालय में पत्रकारों से संवाद के दौरान उन पर्दों को हटाया जो अब तक सत्ता परिवर्तन की बारीकियों पर पड़े थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि नीतीश कुमार का यह मानना था कि भाजपा ने लंबे समय तक सहयोगी के रूप में उनका साथ निभाया है। कई बार ऐसा हुआ जब विधानसभा चुनाव में भाजपा की सीटें जदयू से अधिक थीं, फिर भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उदारता दिखाते हुए नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाई।
विजय चौधरी ने कहा कि अब समय उस सम्मान को लौटाने का था। नीतीश कुमार ने स्वयं यह इच्छा व्यक्त की कि अब भाजपा का मुख्यमंत्री प्रदेश की कमान संभाले और वे स्वयं संरक्षक की भूमिका में रहें। सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना इसी ‘त्याग और सम्मान’ की राजनीति का हिस्सा है। उपमुख्यमंत्री ने इस बात पर विशेष बल दिया कि सम्राट चौधरी के पास भले ही प्रशासनिक कमान है, लेकिन उनके पीछे नीतीश कुमार का वह व्यापक अनुभव और आशीर्वाद है, जिसने बिहार को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर निकाला है।
बहुमत परीक्षण: एनडीए का प्रचंड शक्ति प्रदर्शन
शुक्रवार को बिहार विधानसभा के भीतर जो दृश्य देखने को मिलेगा, वह विपक्षी दलों की चिंताओं को और बढ़ाने वाला है। विजय कुमार चौधरी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ घोषणा की है कि एनडीए सरकार सदन में प्रचंड बहुमत साबित करेगी। 243 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए के पक्ष में खड़े विधायकों का आंकड़ा इतना मजबूत है कि किसी भी प्रकार की राजनैतिक उथल-पुथल की गुंजाइश शून्य नजर आती है।
वर्तमान संख्या बल पर नजर डालें तो एनडीए के पास 202 विधायकों का ठोस समर्थन है, जो बहुमत के लिए आवश्यक 122 के आंकड़े से कहीं आगे है। इसके विपरीत, राजद और कांग्रेस के नेतृत्व वाला महागठबंधन केवल 41 विधायकों के साथ हाशिए पर खड़ा है। उपमुख्यमंत्री ने विपक्ष के ‘खेला होगा’ जैसे दावों को हवा-हवाई करार देते हुए कहा कि एनडीए के सभी घटक दल चट्टान की तरह एकजुट हैं। सम्राट चौधरी की सरकार के स्थायित्व को लेकर कोई संशय नहीं है क्योंकि इसकी नींव नीतीश कुमार के भरोसे पर टिकी है।
पुराना रास्ता, नया सारथी: नीतीश मॉडल पर चलेगी सरकार
विजय कुमार चौधरी ने उन आशंकाओं को भी खारिज कर दिया जिनमें यह कहा जा रहा था कि भाजपा के मुख्यमंत्री आने से सरकार की प्राथमिकताएं बदल जाएंगी। उन्होंने साफ किया कि सरकार भले ही नई है, लेकिन लक्ष्य और रास्ता वही पुराना है जो नीतीश कुमार ने तय किया था। सरकार का मुख्य संकल्प उन अधूरे कार्यों को पूरा करना है जिनका वादा पिछले विधानसभा चुनाव में जनता से किया गया था।
सरकार की कार्ययोजना के प्रमुख बिंदु:
- सुशासन की निरंतरता: कानून के राज के साथ कोई समझौता नहीं होगा।
- अधूरे संकल्पों की पूर्ति: सात निश्चय और अन्य विकास योजनाओं को और भी तीव्र गति से आगे बढ़ाया जाएगा।
- पारदर्शी वित्तीय व्यवस्था: राज्य के आर्थिक संसाधनों का सदुपयोग जनता के हित में होगा।
विजय चौधरी ने कहा कि बिहार की जनता ने पिछले दो दशकों में नीतीश कुमार के विकास मॉडल को बार-बार सराहा है। ऐसे में नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती उस भरोसे को कायम रखना है। सम्राट चौधरी का नेतृत्व इस विकास यात्रा को नई ऊर्जा प्रदान करेगा, लेकिन इसकी आत्मा ‘नीतीश मॉडल’ ही रहेगी।
विपक्ष के ‘खाली खजाने’ वाले आरोपों पर पलटवार
राजद और अन्य विपक्षी दलों द्वारा लगातार यह नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि सरकार का खजाना खाली हो चुका है और बिहार वित्तीय संकट की ओर बढ़ रहा है। उपमुख्यमंत्री ने इन आरोपों को ‘बेबुनियाद और राजनैतिक विद्वेष से प्रेरित’ बताया। उन्होंने राजद शासनकाल की याद दिलाते हुए कहा कि उस दौर में वित्त विभाग हमेशा ‘रेड मार्क’ (लाल घेरे) में रहता था और पारदर्शिता का नामोनिशान नहीं था।
उन्होंने आंकड़ों के साथ दावा किया कि आज बिहार की वित्तीय स्थिति पहले से कहीं अधिक पारदर्शी और सुदृढ़ है। सरकार के पास न केवल वेतन और भत्तों के लिए पर्याप्त पैसा है, बल्कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए भी संसाधनों की कोई कमी नहीं है। विजय चौधरी ने कहा कि विपक्ष हताशा में ऐसे बयान दे रहा है क्योंकि उनके पास सरकार की कार्यकुशलता पर सवाल उठाने के लिए कोई ठोस मुद्दा नहीं है।
राष्ट्रीय राजनीति: बंगाल की हिंसा और तमिलनाडु का भविष्य
प्रेस वार्ता के दौरान विजय कुमार चौधरी ने बिहार की सीमाओं से बाहर निकलकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की राजनैतिक स्थितियों पर भी तीखी टिप्पणी की। बंगाल में पहले चरण के मतदान के दौरान हुई हिंसा का जिक्र करते हुए उन्होंने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) को ‘हिंसा की जननी’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल में लोकतंत्र को बंधक बना लिया गया है, जहाँ चुनाव आयोग के कर्मियों और न्यायिक अधिकारियों तक को अपनी ड्यूटी करने में सुरक्षा का अभाव महसूस होता है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि जिस तरह बंगाल की जनता बदलाव की ओर देख रही है, वही स्थिति तमिलनाडु की भी है। विजय चौधरी के अनुसार, तमिलनाडु की वर्तमान सरकार के प्रति जनता में गहरा आक्रोश है और वहां भी एनडीए के पक्ष में एक मजबूत लहर तैयार हो रही है। उनके इन बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया कि बिहार एनडीए केवल राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि वह राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्ष की नीतियों के खिलाफ एक सशक्त मोर्चा खोले हुए है।
सम्राट चौधरी की चुनौती और मंत्रिमंडल का विस्तार
बिहार के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी के पास चुनौतियों और अवसरों का एक बड़ा पहाड़ है। फ्लोर टेस्ट के बाद, सबकी नजरें मंत्रिमंडल के विस्तार पर टिकी होंगी, जो मई के पहले सप्ताह में होने की उम्मीद है। वर्तमान में सम्राट चौधरी ने 29 मंत्रालयों की जिम्मेदारी खुद संभाली हुई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे प्रशासन पर अपनी पकड़ को पहले दिन से ही मजबूत करना चाहते हैं।
विजय कुमार चौधरी ने विश्वास जताया कि सम्राट चौधरी और उनके सहयोगियों की टीम बिहार को विकास के अगले स्तर पर ले जाएगी। उन्होंने दोहराया कि नीतीश कुमार का मार्गदर्शन इस सरकार के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा। भाजपा और जदयू के बीच का यह नया समीकरण न केवल 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए आधार तैयार कर रहा है, बल्कि यह देश को यह संदेश भी दे रहा है कि राजनैतिक समन्वय और त्याग के जरिए बड़े लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।


