1857 की क्रांति के महानायक की हुंकार से गूंजी राजधानी: विजय दिवस पर पटना में उमड़ा सैलाब; सम्राट चौधरी और राज्यपाल ने टेका माथा

पटना। इतिहास के पन्नों में 23 अप्रैल की तारीख केवल एक अंक नहीं, बल्कि बिहार के उस शौर्य का प्रतीक है जिसने अस्सी बरस की उम्र में भी फिरंगियों की चूलें हिला दी थीं। गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 को राजधानी पटना एक बार फिर उसी ऐतिहासिक गौरव और राष्ट्रीय चेतना के रंग में रंगी नजर आई। 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह के विजय दिवस के अवसर पर पूरा शहर ‘जय कुंवर’ के उद्घोष से गुंजायमान रहा। इस गौरवमयी अवसर पर राजधानी के ‘वीर कुंवर सिंह आजादी पार्क’ में एक राजकीय समारोह का आयोजन किया गया, जहाँ सत्ता के शीर्ष नेतृत्व से लेकर आम आवाम तक ने उस महान योद्धा के चरणों में अपनी श्रद्धा निवेदित की। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पार्क में स्थापित बाबू वीर कुंवर सिंह की भव्य अश्वारोही प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। यह आयोजन केवल एक श्रद्धांजलि सभा नहीं थी, बल्कि यह 2026 के आधुनिक बिहार का अपनी ऐतिहासिक जड़ों से जुड़ने और भविष्य के संकल्पों को दोहराने का एक सशक्त माध्यम बना।

आजादी पार्क में शौर्य का वंदन: अश्वारोही प्रतिमा पर अर्पित किए श्रद्धासुमन

​सुबह की पहली किरण के साथ ही आजादी पार्क का वातावरण देशभक्ति की लहरों से सराबोर हो गया था। पार्क के केंद्र में स्थित बाबू वीर कुंवर सिंह की प्रतिमा, जो उनके अदम्य साहस और युद्ध कौशल को दर्शाती है, उसे विशेष रूप से पुष्पों से सुसज्जित किया गया था। राज्यपाल सैयद अता हसनैन और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक साथ प्रतिमा के समीप पहुँचकर पुष्पचक्र अर्पित किए। माल्यार्पण के बाद दोनों नेताओं ने कुछ क्षण मौन रहकर उस महान सेनानायक के बलिदान को याद किया, जिन्होंने अपनी घायल बांह को स्वयं काटकर गंगा मैया को समर्पित कर दिया था, लेकिन दुश्मनों के सामने सिर नहीं झुकाया।

​समारोह में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने याद दिलाया कि 23 अप्रैल 1858 को ही कुंवर सिंह ने जगदीशपुर के पास ब्रिटिश सेना की टुकड़ियों को धूल चटाकर अपने किले पर विजय पताका फहराई थी। आज का यह समारोह उसी ऐतिहासिक जीत की याद में आयोजित किया गया। मुख्यमंत्री ने प्रतिमा के समक्ष झुककर यह संदेश दिया कि बिहार की अस्मिता और स्वाभिमान का संरक्षण ही उनके शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

प्रमुख राजनैतिक और सामाजिक हस्तियों की गरिमामयी उपस्थिति

​इस राजकीय समारोह में बिहार की राजनैतिक बिसात के लगभग सभी प्रमुख चेहरे एक मंच पर नजर आए। दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर जनप्रतिनिधियों ने कुंवर सिंह की वीरता को राष्ट्र की साझी विरासत बताया।

श्रद्धांजलि अर्पित करने वाले प्रमुख नाम:

  • विजय कुमार चौधरी (उप मुख्यमंत्री)
  • बिजेन्द्र प्रसाद यादव (उप मुख्यमंत्री)
  • संजय सरावगी (भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सह विधायक)
  • विजय कुमार सिन्हा (पूर्व उप मुख्यमंत्री)
  • श्रवण कुमार (विधायक)
  • नीरज कुमार सिंह (विधायक)
  • श्याम रजक (विधायक)
  • संजय कुमार सिंह उर्फ गांधी जी (विधान पार्षद)
  • संजय सिंह (विधान पार्षद)
  • कुमुद वर्मा (विधान पार्षद)

​इनके अलावा बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न दलों के नेताओं ने भी अश्वारोही प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए। इस दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे, लेकिन लोगों का उत्साह सुरक्षा घेरों पर भारी पड़ता दिखा।

सहकारी भूमि विकास बैंक परिसर: परंपरा और सम्मान का संगम

​आजादी पार्क में माल्यार्पण के पश्चात मुख्यमंत्री का काफिला ‘सहकारी भूमि विकास बैंक समिति’ परिसर पहुँचा। यहाँ भी बाबू वीर कुंवर सिंह की एक आदमकद प्रतिमा स्थापित है, जहाँ मुख्यमंत्री ने दूसरी बार माल्यार्पण कर अपनी अटूट श्रद्धा प्रकट की। इस परिसर का वातावरण पूरी तरह पारंपरिक उत्सव जैसा नजर आया।

​यहाँ मुख्यमंत्री का स्वागत अत्यंत भव्य और पारंपरिक तरीके से किया गया। हाउसिंग बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह विधान पार्षद विजय कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री को पारंपरिक पगड़ी पहनाई और एक विशाल फूलों की माला से उनका अभिनंदन किया। सबसे विशेष क्षण वह था जब विजय कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री को एक तलवार भेंट की। यह तलवार केवल एक उपहार नहीं, बल्कि वीर कुंवर सिंह की उस लड़ाकू भावना और न्यायप्रियता का प्रतीक थी, जिसे आज के नेतृत्व को आत्मसात करने की अपील की गई। मुख्यमंत्री ने तलवार को माथे से लगाकर यह स्वीकार किया कि शासन में ‘शक्ति’ और ‘सेवा’ का संतुलन ही असली सुशासन है।

सांस्कृतिक छटा: संगीत के माध्यम से इतिहास का पुनरुद्धार

​समारोह के दौरान सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से समां बांध दिया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत पारंपरिक आरती पूजन के साथ हुई। इसके बाद कलाकारों ने ‘बिहार गीत’ गाकर राज्य की गौरवशाली संस्कृति का बखान किया।

​भजन और देशभक्ति गीतों के दौर ने उपस्थित लोगों की आँखों में नमी और हृदय में गर्व भर दिया। विशेष रूप से 1857 के विद्रोह पर आधारित लोकगीतों ने उस समय के संघर्ष की यादें ताजा कर दीं। गीतों के बोलों में कुंवर सिंह की वीरता, गंगा की लहरों में उनके रक्त के समर्पण और जगदीशपुर की माटी की खुशबू का ऐसा चित्रण किया गया कि पूरा परिसर भावुक हो उठा। इन गीतों ने यह साबित कर दिया कि इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि बिहार के लोक संगीत और जनश्रुतियों में भी जिंदा है।

ऐतिहासिक संदर्भ: 80 की उम्र और 1857 की वो ललकार

​2026 में वीर कुंवर सिंह का विजय दिवस मनाते हुए यह समझना आवश्यक है कि उनका संघर्ष आज भी क्यों प्रासंगिक है। जब 1857 में भारत के अधिकांश हिस्सों में विद्रोह की ज्वाला सुलग रही थी, तब जगदीशपुर के अस्सी वर्षीय जमींदार कुंवर सिंह ने यह दिखा दिया कि संकल्प की आयु नहीं होती। उन्होंने अपनी छापामार युद्ध नीति (Guerrilla Warfare) से ब्रिटिश सेना के जनरल डगलस और कैप्टन ली ग्रैंड जैसे योद्धाओं को बार-बार पराजित किया।

​उनका सबसे प्रसिद्ध प्रसंग वह है जब गंगा पार करते समय उनकी बांह में अंग्रेजों की गोली लग गई थी। जहर फैलने के डर से उन्होंने बिना हिचकिचाए अपनी बांह तलवार से काट दी और उसे ‘हे गंगा मैया, तोरा चरण में अर्पित बा’ कहते हुए प्रवाहित कर दिया। 23 अप्रैल 1858 को उन्होंने जगदीशपुर में प्रवेश कर अंतिम बार अपनी जीत दर्ज की थी, हालांकि इस युद्ध के घावों के कारण कुछ दिनों बाद उनका देहावसान हो गया।

2026 का बिहार: विरासत और विकास का मेल

​आज जब सम्राट चौधरी और राज्यपाल महोदय ने इन प्रतिमाओं पर माल्यार्पण किया, तो इसका राजनैतिक और सामाजिक अर्थ काफी गहरा है। 2026 के इस दौर में बिहार अपनी सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री का बार-बार कुंवर सिंह की स्मृतियों से जुड़ना यह दर्शाता है कि वर्तमान सरकार राज्य के महानायकों के माध्यम से युवाओं में ‘बिहार फर्स्ट’ की भावना जागृत करना चाहती है।

​इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि बाबू वीर कुंवर सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि न्याय के लिए लड़ना ही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि आजादी पार्क और कुंवर सिंह से जुड़े अन्य ऐतिहासिक स्थलों के सौंदर्यीकरण और संरक्षण में कोई कमी न छोड़ी जाए।

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