​भागलपुर: झंडापुर में जमीन विवाद ने लिया खूनी मोड़; हरियो गांव में जमकर चले लाठी-डंडे, चार लहूलुहान

भागलपुर/बिहपुर। बिहार में भूमि विवादों की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अदालती आदेश और कानूनी प्रक्रियाएं भी अक्सर हिंसा को रोकने में बौनी साबित हो रही हैं। ताजा मामला भागलपुर जिले के झंडापुर थाना क्षेत्र अंतर्गत हरियो गांव से सामने आया है, जहाँ पैतृक जमीन के एक टुकड़े के लिए खूनी संघर्ष छिड़ गया। गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 को हुए इस हिंसक टकराव में एक ही पक्ष के चार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। इस घटना की सबसे चिंताजनक कड़ी यह है कि जिस विवाद को सुलझाने के लिए वर्ष 2009 से न्यायालय में टाइटल सूट लंबित है, उसे बाहुबल के जरिए हल करने की कोशिश की गई। पीड़ित परिवार ने स्थानीय पुलिस पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं कि संकट के समय उन्हें सुरक्षा या कानूनी सहायता देने के बजाय केवल अस्पताल का रास्ता दिखा दिया गया। फिलहाल, सभी घायलों का उपचार भागलपुर के मायागंज अस्पताल में चल रहा है, जहाँ उनकी स्थिति नाजुक बनी हुई है।

विवाद की पृष्ठभूमि: 17 साल पुराना कानूनी संघर्ष और जबरन कब्जे की कोशिश

​हरियो गांव निवासी उदय पासवान (पिता स्वर्गीय बेचू पासवान) और उनके परिजनों के लिए यह विवाद नया नहीं है। जमीन का यह टुकड़ा पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय से विवादों के घेरे में है। पीड़ित पक्ष के अनुसार, इस जमीन को लेकर वर्ष 2009 से न्यायालय में मामला विचाराधीन है। कानून की सामान्य समझ यह कहती है कि जब कोई विषय ‘सब-ज्यूडिस’ (न्यायालय के अधीन) हो, तो उस पर यथास्थिति बनी रहनी चाहिए। लेकिन विपक्षी पक्ष ने कानून को ठेंगा दिखाते हुए गुरुवार की सुबह वर्चस्व दिखाने की कोशिश की।

​घटनाक्रम के अनुसार, गुरुवार सुबह विपक्षी खेमे के आधा दर्जन से अधिक लोग अचानक विवादित स्थल पर पहुँच गए। उनके पास निर्माण सामग्री और जमीन को घेरने के लिए खंभे व खूँटियाँ थीं। बिना किसी पूर्व सूचना या कानूनी आदेश के, उन्होंने उदय पासवान की पैतृक भूमि पर कब्जा करने की नीयत से घेराबंदी शुरू कर दी। जब उदय पासवान और उनके परिवार को इस बात की भनक लगी, तो वे मौके पर पहुँचे और शालीनता से न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए काम रोकने का आग्रह किया। लेकिन संवाद की जगह वहां केवल हिंसा के लिए तैयार भीड़ मौजूद थी।

लाठी-डंडों से जानलेवा हमला: चार लोग हुए गंभीर रूप से घायल

​जैसे ही उदय पासवान ने अपनी पैतृक जमीन पर हो रहे अवैध निर्माण का विरोध किया, वहां मौजूद 6 से 7 हमलावरों ने उन पर धावा बोल दिया। हमलावरों ने पहले से ही लाठी-डंडों और धारदार हथियारों की तैयारी कर रखी थी। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हमला इतना अचानक और भीषण था कि उदय पासवान को संभलने का मौका तक नहीं मिला।

​इस हिंसक झड़प में निम्नलिखित लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं:

  1. उदय पासवान: हमले के मुख्य शिकार, जिन्हें सिर और शरीर के अंदरूनी हिस्सों में गहरी चोटें आई हैं।
  2. अन्य तीन परिजन: उदय के साथ मौजूद परिवार के तीन अन्य सदस्य भी इस हमले में लहूलुहान हो गए।

​ग्रामीणों ने जब शोर सुना और मौके पर भीड़ जुटने लगी, तब जाकर हमलावर वहां से धमकी देते हुए फरार हुए। स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप के कारण एक बड़ी अनहोनी तो टल गई, लेकिन तब तक चारों घायलों की स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी। पूरे गांव में इस घटना के बाद तनाव का माहौल व्याप्त है और दलित परिवार के बीच असुरक्षा की भावना गहरा गई है।

पुलिसिया कार्यप्रणाली पर सवाल: इंजरी रिपोर्ट न देने का आरोप

​इस घटना का दूसरा और अधिक विवादास्पद पहलू झंडापुर थाना की भूमिका को लेकर है। पीड़ित परिजनों का आरोप है कि हमले के तुरंत बाद वे कराहते हुए और खून से लथपथ हालत में झंडापुर थाना पहुँचे थे। उनकी उम्मीद थी कि पुलिस तत्काल उनकी शिकायत दर्ज करेगी, दोषियों के खिलाफ छापेमारी करेगी और उन्हें मेडिकल सहायता के लिए आधिकारिक ‘इंजरी रिपोर्ट’ उपलब्ध कराएगी।

​परंतु, पीड़ित पक्ष का दावा है कि थाने में तैनात अधिकारियों ने उनकी पीड़ा को गंभीरता से नहीं लिया। आरोप है कि:

  • ​पुलिस ने किसी भी प्रकार की प्राथमिक कागजी कार्रवाई या सनहा दर्ज करने से इनकार कर दिया।
  • ​घायलों को बिना इंजरी रिपोर्ट दिए सीधे अस्पताल जाने की सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
  • ​दोषियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने के बजाय उन्हें भागलपुर जाने को कह दिया गया।

​कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, मारपीट के मामलों में पुलिस द्वारा दी गई इंजरी रिपोर्ट न्यायालय में साक्ष्य के रूप में बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसके बिना मामले को कमजोर माना जा सकता है। पुलिस के इस उदासीन रवैये से पीड़ित परिवार में गहरा रोष है और वे इसे प्रशासन की विपक्षी पक्ष के साथ कथित साठगांठ के रूप में देख रहे हैं।

मायागंज अस्पताल में उपचार: न्याय की प्रतीक्षा में पीड़ित

​झंडापुर थाना से निराशा हाथ लगने के बाद, परिजनों ने निजी वाहनों की मदद से सभी चारों घायलों को भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल (मायागंज) पहुँचाया। इमरजेंसी वार्ड में डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें भर्ती कर लिया है। उदय पासवान के सिर में टांके आए हैं और अन्य घायलों के अंगों में फ्रैक्चर की आशंका जताई जा रही है।

​अस्पताल के बेड पर पड़े उदय पासवान ने रुंधे गले से बताया कि विपक्षी पक्ष आर्थिक और सामाजिक रूप से रसूखदार है, इसलिए वे लगातार कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। 2009 से कोर्ट के चक्कर काटते-काटते परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है, और अब जान का भी खतरा पैदा हो गया है। उनका कहना है कि अगर प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह जमीन विवाद किसी बड़ी अनहोनी या हत्या का कारण बन सकता है।

प्रशासनिक सक्रियता और भूमि विवादों की बढ़ती चुनौती

​हरियो गांव की यह घटना भागलपुर जिले में भूमि विवादों के निपटारे के लिए चलाए जा रहे ‘जनता दरबार’ और ‘थाना दिवस’ जैसे कार्यक्रमों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। बिहार सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि भूमि विवादों को प्राथमिकता के आधार पर सुलझाया जाए, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।

​इस घटना ने कई सुलगते सवाल छोड़ दिए हैं:

  1. ​जब मामला न्यायालय में लंबित है, तो स्थानीय प्रशासन ने विवादित जमीन पर काम शुरू होने से पहले ही निगरानी क्यों नहीं रखी?
  2. ​थाने पहुँचे गंभीर रूप से घायल लोगों को बिना किसी कागजी प्रक्रिया के वापस भेजना क्या कर्तव्यहीनता की श्रेणी में नहीं आता?
  3. ​क्या भागलपुर पुलिस मुख्यालय इस मामले में संज्ञान लेकर दोषी पुलिसकर्मियों और हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई करेगा?
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