
पटना। लोक व्यवस्था और अनुशासन की प्रतिमूर्ति मानी जाने वाली पुलिस वर्दी की गरिमा को सोशल मीडिया के ग्लैमर से बचाने के लिए बिहार पुलिस मुख्यालय ने अब तक का सबसे कड़ा रुख अख्तियार किया है। बुधवार, 22 अप्रैल 2026 को पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी एक आधिकारिक आदेश के बाद उन पुलिसकर्मियों के बीच हड़कंप मच गया है, जो ड्यूटी के दौरान या वर्दी पहनकर वीडियो रील बनाने के शौकीन हैं। पुलिस विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्दी कोई ‘कॉस्ट्यूम’ नहीं, बल्कि राज्य की शक्ति और जिम्मेदारी का प्रतीक है। मुख्यालय के सोशल मीडिया सेंटर की गहन मॉनिटरिंग के बाद ऐसे 40 पुलिसकर्मियों की सूची तैयार की गई है, जिन्होंने विभागीय नियमों और मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) को दरकिनार कर सोशल मीडिया पर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास किया। इन सभी चिन्हित पदाधिकारियों और कर्मियों के विरुद्ध अब अनुशासनात्मक और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
मुख्यालय का सख्त रुख: एआईजी ने जारी किया निर्देश
बिहार पुलिस मुख्यालय के स्तर से जारी इस कड़े दिशा-निर्देश वाले पत्र ने यह साफ कर दिया है कि अब सोशल मीडिया पर ‘लाइक्स’ और ‘व्यूज’ के लिए वर्दी की मर्यादा से समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह पत्र सहायक पुलिस महानिरीक्षक (कल्याण) के स्तर से जारी किया गया है और इसे राज्य के सभी जिलों के वरीय पुलिस अधीक्षक (एसएसपी), पुलिस अधीक्षक (एसपी) और रेल इकाई के प्रमुखों को भेजा गया है।
इस पत्र में उल्लेख किया गया है कि पुलिस मुख्यालय ने पहले ही सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर एक व्यापक ‘मानक संचालन प्रक्रिया’ (SOP) जारी कर रखी है। इस एसओपी में स्पष्ट निर्देश हैं कि ड्यूटी के दौरान या वर्दी में किसी भी प्रकार का मनोरंजक वीडियो, रील या आपत्तिजनक पोस्ट साझा करना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। बावजूद इसके, कई पुलिसकर्मी लगातार इन नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। मुख्यालय ने अब सभी जिला प्रमुखों को निर्देश दिया है कि वे अपने अधीन काम करने वाले कर्मियों से इस एसओपी का अक्षरशः पालन सुनिश्चित कराएं और उल्लंघनकर्ताओं पर नियमानुकूल कठोर कार्रवाई करें।
पटना जिला अव्वल: महिला सिपाहियों की संख्या सर्वाधिक
पुलिस मुख्यालय के सोशल मीडिया सेंटर द्वारा की गई डिजिटल मॉनिटरिंग में जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। चिन्हित किए गए 40 पुलिसकर्मियों की सूची में राज्य की राजधानी पटना का प्रदर्शन सबसे चिंताजनक रहा है। कुल चिन्हित कर्मियों में से सर्वाधिक 10 कर्मी अकेले पटना जिले से हैं।
पदों और रैंक के विश्लेषण से पता चलता है कि यह प्रवृत्ति केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है। रील बनाने वालों की इस सूची में सिपाही से लेकर दारोगा (सब-इंस्पेक्टर) स्तर के पदाधिकारी शामिल हैं। हालांकि, आंकड़ों के अनुसार इस अनुशासनहीनता में सर्वाधिक संख्या महिला सिपाहियों की पाई गई है। मुख्यालय ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि कानून के रक्षक ही नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। पत्र के साथ भेजी गई सूची में उन सभी कर्मियों के सोशल मीडिया हैंडल्स और उनके द्वारा पोस्ट की गई रील के साक्ष्य भी संलग्न किए गए हैं, ताकि जिले स्तर पर होने वाली कार्रवाई में कोई तकनीकी बाधा न आए।
एसओपी का उल्लंघन: क्यों है यह खतरनाक?
पुलिस सेवा एक ’24×7′ वाली अनुशासित सेवा है। जब कोई पुलिसकर्मी वर्दी में रील बनाता है, तो वह केवल एक वीडियो नहीं होता, बल्कि वह पुलिस की उस गंभीर छवि को धूमिल करता है जिसे बनाने में दशकों का समय लगता है। एसओपी के उल्लंघन को मुख्यालय ने निम्नलिखित आधारों पर गंभीर माना है:
- कर्तव्य में लापरवाही: रील बनाने की प्रक्रिया में समय और ध्यान दोनों की आवश्यकता होती है, जो ड्यूटी के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा से समझौता हो सकता है।
- गोपनीयता का खतरा: कई बार रील बनाने के चक्कर में थानों के भीतर के संवेदनशील दृश्य, हथियार या सरकारी दस्तावेज अनजाने में सार्वजनिक हो जाते हैं।
- जनता का विश्वास: पुलिस को देखकर जनता के मन में सुरक्षा का भाव आना चाहिए। यदि पुलिसकर्मी फिल्मी गानों पर थिरकते नजर आएंगे, तो अपराधियों में खौफ और आम जनता में सम्मान कम होगा।
- विभागीय मर्यादा: वर्दी राज्य की संप्रभुता का प्रतीक है। इसे मनोरंजन का साधन बनाना आचार संहिता का सीधा उल्लंघन है।
सोशल मीडिया सेंटर: चौबीसों घंटे निगरानी
बिहार पुलिस का सोशल मीडिया सेंटर अब किसी भी निजी खुफिया इकाई से कम नहीं है। मुख्यालय के इस केंद्र में तैनात विशेषज्ञों की टीम फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) और यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म्स पर लगातार नजर रख रही है। यह टीम न केवल भ्रामक खबरों और साइबर अपराधों को ट्रैक करती है, बल्कि विभाग के भीतर के उन ‘डिजिटल सितारों’ को भी चिह्नित करती है जो वर्दी की मर्यादा भूल चुके हैं।
अब तक की मॉनिटरिंग में यह देखा गया है कि कई पुलिसकर्मी गश्ती के दौरान, थानों के भीतर डेस्क पर बैठकर या हथियारों के साथ रील बनाकर पोस्ट कर रहे हैं। कुछ मामलों में तो ‘स्लो-मोशन’ वॉक और बॉलीवुड डायलॉग्स का भी सहारा लिया गया है। सोशल मीडिया सेंटर द्वारा तैयार की गई सूची अब संबंधित जिलों के कप्तानों के पास पहुँच चुकी है, जहाँ से इन कर्मियों को शो-कॉज (कारण बताओ) नोटिस जारी करने और उनके वेतन वृद्धि रोकने या निलंबन जैसी कार्रवाई की तैयारी है।
भविष्य की चेतावनी: शिद्दत से होगा पालन
मुख्यालय ने साफ कर दिया है कि यह केवल एक चेतावनी पत्र नहीं है, बल्कि एक कार्य योजना है जिसे ‘पूरी शिद्दत’ के साथ लागू किया जाएगा। सभी जिलों के एसपी को आदेश दिया गया है कि वे समय-समय पर अपने जिले के सोशल मीडिया ट्रेंड्स की जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि कोई भी कर्मी वर्दी का मजाक न बनाए।
यह आदेश उन हजारों समर्पित पुलिसकर्मियों के सम्मान की रक्षा के लिए भी जरूरी है जो दिन-रात कठिन परिस्थितियों में अपनी ड्यूटी निभाते हैं। मुख्यालय का मानना है कि मुट्ठी भर लोगों की ‘वायरल’ होने की चाहत पूरी फोर्स की छवि खराब नहीं कर सकती। आने वाले दिनों में चिन्हित 40 कर्मियों पर होने वाली कार्रवाई अन्य कर्मियों के लिए एक नजीर (उदाहरण) पेश करेगी।
अनुशासन ही पुलिस की असली ताकत
बिहार पुलिस द्वारा उठाया गया यह कदम आधुनिक दौर की चुनौतियों और पारंपरिक अनुशासन के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है। सोशल मीडिया एक शक्तिशाली माध्यम है, लेकिन लोक सेवकों के लिए इसके उपयोग की एक सीमा रेखा है। वर्दी पहनकर रील बनाना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह उस शपथ का भी अपमान है जो हर पुलिसकर्मी सेवा में आने के समय लेता है।
अब जबकि पटना सहित अन्य जिलों के लगभग 40 कर्मियों की सूची सार्वजनिक हो चुकी है और कार्रवाई की तलवार लटक रही है, यह उम्मीद की जा सकती है कि बिहार पुलिस के जवान डिजिटल दुनिया की चकाचौंध से निकलकर अपनी मूल जिम्मेदारी यानी ‘जनता की सेवा और सुरक्षा’ पर अधिक ध्यान केंद्रित करेंगे। वॉयस ऑफ बिहार (VOB) प्रशासन के इस सुधारात्मक कदम की सराहना करता है, क्योंकि एक अनुशासित पुलिस ही एक सुरक्षित समाज की नींव रख सकती है।


