​जमुई: गिद्धेश्वर पहाड़ियों के हजारों साल पुराने शैल चित्रों का होगा संरक्षण

जमुई/पटना। बिहार का ऐतिहासिक और पुरातात्विक वैभव एक बार फिर वैश्विक चर्चा का केंद्र बनने जा रहा है। जमुई वन प्रमंडल के अंतर्गत आने वाली गिद्धेश्वर पहाड़ियों के शैलाश्रयों (Rock Shelters) में खोजे गए हजारों साल पुराने शैल चित्रों (Rock Paintings) को अब बिहार सरकार ने संरक्षित करने का निर्णय लिया है। बुधवार, 22 अप्रैल 2026 को आधिकारिक सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इन प्राचीन कलाकृतियों को न केवल सुरक्षित रखा जाएगा, बल्कि इन्हें गहन शोध और अनुसंधान (Research) के लिए भी उपयोग में लाया जाएगा। ये शैल चित्र मानव सभ्यता के उस दौर की गवाही देते हैं जब लिखित इतिहास का अस्तित्व नहीं था और मनुष्य अपनी भावनाओं व अनुभवों को पत्थरों पर उकेर कर भविष्य के लिए सुरक्षित करता था। जमुई वन विभाग की टीम द्वारा किया गया यह सर्वेक्षण बिहार की सांस्कृतिक विरासत को एक नई पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

खोज की पृष्ठभूमि: 2022 से शुरू हुई थी कवायद

​जमुई की इन पहाड़ियों में प्राचीन सभ्यता के अवशेषों की खोज की शुरुआत वर्ष 2022 के आसपास हुई थी। जमुई वन प्रमंडल की एक विशेष टीम ने दुर्गम पहाड़ियों और प्राकृतिक गुफाओं का सर्वेक्षण किया, जिसके दौरान कई महत्वपूर्ण शैलाश्रय मिले। इन गुफाओं की दीवारों और छतों पर निर्मित चित्र नवपाषाण काल (Neolithic Period) से लेकर प्रारंभिक इतिहास काल तक के माने जा रहे हैं। पुरातात्विक विशेषज्ञों के अनुसार, इन शैल चित्रों की विविधता और उनकी बनावट यह स्पष्ट करती है कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों तक मानव गतिविधियों का केंद्र रहा है।

​वन प्रमंडल पदाधिकारी तेजस जायसवाल ने बताया कि इन शैल चित्रों की खोज के बाद अब इनके संरक्षण का कार्य प्राथमिकता के आधार पर शुरू किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह खोज प्रक्रिया केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय में भी इस पहल को जारी रखा जाएगा ताकि पहाड़ियों के अन्य हिस्सों में छिपे संभावित पुरातात्विक रहस्यों का भी अनावरण किया जा सके।

शैल चित्रों का महत्व: नवपाषाण काल की जीवंत झांकी

​प्रागैतिहासिक काल के इन शैल चित्रों को समझना केवल कला का अध्ययन नहीं, बल्कि उस समय के मानव जीवन के सामाजिक और पारिस्थितिक ताने-बाने को समझना है। विशेषज्ञों के अनुसार:

    • काल निर्धारण: ये चित्र लगभग 10,000 ईसा पूर्व से 2,000 ईसा पूर्व के बीच के माने जा रहे हैं, जो वह समय था जब मनुष्य ने खानाबदोश जीवन छोड़कर खेती और पशुपालन की शुरुआत की थी।
    • चित्रण का विषय: सर्वेक्षण के दौरान मिले चित्रों में तत्कालीन मानवीय गतिविधियों और जंगली जानवरों को प्रमुखता से दर्शाया गया है।
    • सभ्यता का प्रमाण: ये चित्र इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि जमुई का यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल में सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध था।
    • तकनीकी पक्ष: उस दौर के लोगों ने प्राकृतिक रंगों और पत्थरों के औजारों का उपयोग कर इन चित्रों को उकेरा था, जो हजारों साल बाद भी काफी हद तक सुरक्षित हैं।

​”गिद्धेश्वर पहाड़ियों में मिले ये मानव निर्मित शैल चित्र हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के परिचायक हैं। इन्हें सुरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है।” — वन विभाग रिपोर्ट

अनुसंधान और संरक्षण की कार्ययोजना

​बिहार सरकार इन चित्रों के संरक्षण के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार कर रही है। इसमें न केवल भौतिक सुरक्षा शामिल है, बल्कि वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग कर इन चित्रों के क्षरण को रोकना भी शामिल है।

संरक्षण के चरण

प्रस्तावित कार्य

डिजिटल रिकॉर्डिंग

उच्च गुणवत्ता वाली फोटोग्राफी और 3D स्कैनिंग ताकि चित्रों का डिजिटल बैकअप रहे।

भौतिक घेराबंदी

शैलाश्रयों के चारों ओर सुरक्षा जाली या घेराबंदी ताकि मानवीय हस्तक्षेप को रोका जा सके।

अनुसंधान केंद्र

शोधार्थियों और पुरातत्वविदों के लिए क्षेत्र को एक ‘ओपन एयर म्यूजियम’ के रूप में विकसित करना।

पर्यटन विकास

पर्यावरण और विरासत को नुकसान पहुँचाए बिना नियंत्रित इको-टूरिज्म को बढ़ावा देना।

वन प्रमंडल पदाधिकारी तेजस जायसवाल के नेतृत्व में इस सर्वेक्षण को सफलतापूर्वक संपन्न किया गया। इस महत्वपूर्ण कार्य में उनके साथ फॉरेस्टर मिथिलेश कुमार, वनरक्षक दीपु रविदास और धीरेंद्र कुमार सहित टीम के अन्य सदस्यों ने भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया है।

बिहार के इतिहास में एक नया अध्याय

​जमुई की पहाड़ियों में मिले ये शैल चित्र बिहार के इतिहास को और भी प्राचीन और गहरा बनाते हैं। अक्सर मगध और वैशाली के गौरवशाली इतिहास की चर्चा होती है, लेकिन प्रागैतिहासिक काल के ये साक्ष्य यह बताते हैं कि बिहार की जड़ें मानव सभ्यता के शुरुआती चरणों से जुड़ी हुई हैं। सरकार द्वारा इन चित्रों को रिसर्च के लिए खोलने से भविष्य में कई नए ऐतिहासिक तथ्यों के सामने आने की उम्मीद है।

​जमुई वन प्रमंडल ने इस धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए कड़े कदम उठाने का संकल्प लिया है ताकि यह केवल पत्थरों पर बनी लकीरें न रहें, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत बनी रहें। ‘वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) इस प्रकार की ऐतिहासिक विरासतों के संरक्षण की सराहना करता है और इस परियोजना के हर अपडेट को आप तक पहुँचाता रहेगा।

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