​इंजीनियरिंग और आस्था का संगम: अगुवानी-सुल्तानगंज पुल की बाधाएं दूर करने के लिए चंडी पाठ; 2028 तक पूरा होगा ‘सपनों का सेतु’

सुल्तानगंज/भागलपुर। बिहार की महत्वाकांक्षी और बहुचर्चित परियोजनाओं में से एक अगुवानी-सुल्तानगंज गंगा पुल के निर्माण को लेकर अब विज्ञान के साथ-साथ आध्यात्म का भी सहारा लिया जा रहा है। बार-बार तकनीकी बाधाओं और हादसों का शिकार रहे इस पुल को निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए निर्माण कंपनी एसपी सिंगला कंस्ट्रक्शन ने एक बड़ा धार्मिक अनुष्ठान शुरू किया है। अजगैविनाथ धाम की पावन धरती पर बनारस के सात विद्वान पंडितों द्वारा पांच दिवसीय ‘चंडी पाठ’ पूजन का विधि-विधान से शुभारंभ किया गया। प्रोजेक्ट मैनेजर रविशंकर कुमार की उपस्थिति में शुरू हुए इस अनुष्ठान का उद्देश्य उन तमाम अदृश्य बाधाओं को दूर करना है, जो पिछले कई वर्षों से इस महापरियोजना की राह में रोड़ा बनी हुई हैं। एक ओर जहाँ अत्याधुनिक मशीनों और नई तकनीक के जरिए गंगा की लहरों के बीच पिलर खड़े किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मंत्रोच्चार की गूँज से वातावरण को सकारात्मक बनाया जा रहा है। निर्माण कंपनी का दावा है कि अब यह कार्य ‘युद्ध स्तर’ पर चल रहा है और वर्ष 2028 तक यह पुल आम जनता के आवागमन के लिए पूरी तरह तैयार हो जाएगा।

बनारस के विद्वानों द्वारा चंडी पाठ: पांच दिनों तक चलेगा अनुष्ठान

​अजगैविनाथ धाम सुल्तानगंज में आयोजित इस विशेष पूजन कार्यक्रम में काशी (वाराणसी) से आए सात उच्च कोटि के विद्वान ब्राह्मणों की टोली जुटी है। इस अनुष्ठान का नेतृत्व आचार्य विनोद तिवारी कर रहे हैं। पूजन के पहले दिन गंगा तट पर मंत्रों की गूँज के साथ कलश स्थापना की गई। आचार्य विनोद तिवारी ने बताया कि ‘चंडी पाठ’ माता शक्ति की आराधना का वह रूप है जो घोर संकट और कार्यों में आ रही निरंतर बाधाओं के नाश के लिए किया जाता है।

​यह पूजन आगामी पांच दिनों तक निरंतर चलेगा, जिसमें आहुति, हवन और विशेष तांत्रिक-वैदिक अनुष्ठान शामिल हैं। निर्माण कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर रविशंकर कुमार ने स्वयं इस पूजन की कमान संभाली है। उन्होंने बताया कि इस धार्मिक स्थल पर काम करना एक बड़ी जिम्मेदारी है। चूंकि यहाँ सावन माह में लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं और यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है, इसलिए आध्यात्मिक शांति और सुरक्षा के लिए यह पूजन अनिवार्य समझा गया। कंपनी के दर्जनों कर्मचारी और अभियंता भी इस दौरान मौजूद रहे, जिन्होंने सामूहिक रूप से पुल के जल्द निर्माण की कामना की।

बाधाओं का इतिहास और नई तकनीक का भरोसा

​अगुवानी-सुल्तानगंज पुल का इतिहास काफी उथल-पुथल भरा रहा है। पूर्व में दो बार इस पुल के स्ट्रक्चर के गिरने से न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुँचा, बल्कि कंपनी की साख पर भी सवाल खड़े हुए थे। बार-बार आ रही इन रुकावटों ने स्थानीय जनता और सरकार के बीच संशय की स्थिति पैदा कर दी थी। प्रोजेक्ट मैनेजर रविशंकर कुमार ने स्वीकार किया कि इस परियोजना में बार-बार विघ्न उत्पन्न हो रहे थे।

​यही कारण है कि इस बार निर्माण कंपनी ने दोहरी रणनीति अपनाई है:

  1. आध्यात्मिक शुद्धि: चंडी पाठ के जरिए बाधाओं का निवारण।
  2. तकनीकी सुदृढ़ीकरण: पुराने अनुभवों से सीख लेते हुए इस बार पुल के निर्माण में ‘हाई-ग्रेड कंक्रीट’ और ‘एडवांस सस्पेंशन टेक्नोलॉजी’ का उपयोग किया जा रहा है।

​प्रोजेक्ट मैनेजर ने बताया कि अब पिलर और स्पैन के डिजाइन में व्यापक बदलाव किए गए हैं ताकि गंगा की तेज धारा और मिट्टी के कटाव का इस पर कोई असर न पड़े। निर्माण कार्य अब केवल दिन में ही नहीं, बल्कि शिफ्टों में रात को भी जारी है, जिसे ‘युद्ध स्तर’ की तैयारी कहा जा सकता है।

2028 की डेडलाइन: उत्तर और दक्षिण बिहार के बीच बढ़ेगी कनेक्टिविटी

​अगुवानी-सुल्तानगंज पुल केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह उत्तर बिहार के खगड़िया को दक्षिण बिहार के भागलपुर और मुंगेर से जोड़ने वाली एक लाइफलाइन है। वर्तमान में लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है या नाव का सहारा लेना पड़ता है। निर्माण कंपनी ने अब आधिकारिक रूप से 2028 को पूर्णता की समय-सीमा तय की है।

​इस पुल के बन जाने से:

  • ​खगड़िया और भागलपुर के बीच की दूरी घंटों से घटकर मिनटों में रह जाएगी।
  • ​कृषि उत्पादों, विशेषकर केला और मक्का के व्यापार को एक नया बाजार मिलेगा।
  • ​स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुँच आसान होगी, क्योंकि खगड़िया और सहरसा के मरीज आसानी से भागलपुर के मायागंज अस्पताल पहुँच सकेंगे।

​आचार्य विनोद तिवारी ने विश्वास जताया कि मां चंडी के आशीर्वाद से अब यह कार्य बिना किसी रुकावट के पूरा होगा। कंपनी के कर्मचारियों में भी इस पूजन के बाद एक नई ऊर्जा देखी जा रही है।

अजगैविनाथ धाम और सावन का महत्व

​सुल्तानगंज का भौगोलिक और धार्मिक महत्व इस पुल की उपयोगिता को और बढ़ा देता है। यहाँ स्थित अजगैविनाथ धाम वह स्थान है जहाँ से सावन के महीने में लाखों कांवड़िये जल भरकर देवघर (झारखंड) की पदयात्रा शुरू करते हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से यह स्थल काफी जाग्रत माना जाता है। प्रोजेक्ट मैनेजर रविशंकर कुमार का कहना है कि यह पुल श्रद्धालुओं के लिए भी वरदान साबित होगा, क्योंकि कई श्रद्धालु गंगा के उस पार से आते हैं।

​चंडी पाठ के दौरान कंपनी ने स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की भावनाओं का भी पूरा सम्मान किया है। एसपी सिंगला कंपनी के कर्मियों ने बताया कि वे केवल एक संरचना नहीं बना रहे, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र में विकास का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। 2028 तक इस सपने के साकार होने की उम्मीद ने सुल्तानगंज के व्यापारियों और आम नागरिकों में भी उत्साह भर दिया है।

विज्ञान और विश्वास का संतुलन

​अगुवानी-सुल्तानगंज पुल का निर्माण अब एक ऐसी अवस्था में है जहाँ सावधानी और संकल्प दोनों की आवश्यकता है। एक ओर जहाँ बनारस के विद्वानों की टोली अपनी आध्यात्मिक शक्ति से विघ्न-बाधाओं को हरने का प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी ओर इंजीनियरों की टीम तकनीकी बारीकियों को दुरुस्त करने में जुटी है। विज्ञान और विश्वास का यह अनूठा संतुलन अक्सर भारत की बड़ी परियोजनाओं में देखने को मिलता है, जहाँ मनुष्य अपनी सीमाओं के बाद ईश्वर की शरण लेता है।

​प्रोजेक्ट मैनेजर रविशंकर कुमार और उनकी टीम के लिए 2028 की समय-सीमा एक बड़ी चुनौती है, लेकिन जिस ‘युद्ध स्तर’ से काम शुरू हुआ है, वह इस बार सफलता की कहानी लिखता प्रतीत हो रहा है। ‘The Voice of Bihar’ की टीम इस पुल के हर निर्माण चरण की निगरानी करती रहेगी। बिहार के लोगों के लिए यह पुल विकास का वह सेतु बनेगा, जो उम्मीदों को हकीकत से जोड़ेगा। अब इंतज़ार है उस दिन का, जब गंगा की लहरों के ऊपर गाड़ियाँ दौड़ेंगी और बिहार की तरक्की को एक नया आयाम मिलेगा।

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