
भागलपुर। अप्रैल के महीने में ही सूर्यदेव के तल्ख तेवर और आसमान से बरसती आग ने भागलपुर के जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। जैसे-जैसे पारा 40 डिग्री सेल्सियस के ऊपर जा रहा है, वैसे-वैसे सिल्क सिटी के लोग गर्मी से निजात पाने के लिए आधुनिक संसाधनों को छोड़कर अब अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। भागलपुर के बाजारों में इन दिनों एक बार फिर ‘गरीबों के फ्रिज’ कहे जाने वाले मिट्टी के घड़ों और सुराही की धूम मची हुई है। कभी बिजली और फ्रिज की चकाचौंध में खो चुकी यह पारंपरिक संस्कृति अब एक बार फिर आधुनिकता पर भारी पड़ती नजर आ रही है। शहर के घंटाघर, आदमपुर और तिलकामांझी जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्रों पर मिट्टी के बर्तनों की दुकानों पर ग्राहकों की भारी भीड़ देखी जा रही है। लोग न केवल पानी को ठंडा रखने के लिए, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य और प्राकृतिक जीवनशैली को अपनाने के लिए मिट्टी के बर्तनों की खरीदारी कर रहे हैं। यह बदलाव न केवल भागलपुर के स्थानीय कुम्हारों की आर्थिक स्थिति में सुधार ला रहा है, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता का भी परिचायक है।
घंटाघर का बाजार: पारंपरिक बर्तनों का नया हब
भागलपुर के हृदय स्थल ‘घंटाघर’ के आसपास इन दिनों मिट्टी के बर्तनों का एक बड़ा बाजार सज चुका है। यहाँ की फुटपाथों पर सजे रंग-बिरंगे और अलग-अलग डिजाइनों के घड़े और सुराही राहगीरों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। यहाँ वर्षों से मिट्टी के बर्तन बेचने वाले दुकानदार दीपक कुमार बताते हैं कि इस बार गर्मी के सीजन की शुरुआत से ही बिक्री में जबरदस्त इजाफा हुआ है। दीपक के अनुसार, पिछले दो-तीन वर्षों की तुलना में इस साल घड़ों की मांग करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ गई है।
बाजार का मिजाज अब बदल चुका है; जहाँ पहले लोग केवल सादे घड़े मांगते थे, अब वे ‘नल वाले घड़े’ और ‘डिजाइनर सुराही’ की तलाश में रहते हैं। शाम ढलते ही यहाँ ग्राहकों की भारी चहल-पहल देखी जा सकती है। दिन भर की चिलचिलाती धूप और गर्म हवाओं (लू) के थपेड़ों से परेशान लोग जब शाम को बाजार निकलते हैं, तो उनकी पहली पसंद मिट्टी की सुराही होती है। दीपक कुमार का कहना है कि लोग अब इस बात को समझ रहे हैं कि फ्रिज का पानी भले ही बहुत ठंडा हो, लेकिन वह प्यास बुझाने के बजाय शरीर को नुकसान पहुँचाता है। मिट्टी के घड़े की बिक्री बढ़ना स्थानीय छोटे व्यापारियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
स्वास्थ्य और विज्ञान: क्यों बेहतर है घड़े का पानी?
मिट्टी के घड़े और सुराही के प्रति बढ़ते इस रुझान के पीछे केवल परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपा विज्ञान और स्वास्थ्य लाभ भी हैं। भागलपुर के प्रबुद्ध नागरिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी के बर्तनों में पानी रखने से वह प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है, जो शरीर के तापमान के साथ बेहतर सामंजस्य बिठाता है।
- क्षारीय प्रकृति (Alkalinity): मिट्टी की प्रकृति क्षारीय होती है। जब हम इसमें पानी रखते हैं, तो मिट्टी के तत्व पानी की अम्लता (Acidity) के साथ मिलकर उसके पीएच (pH) लेवल को संतुलित कर देते हैं। इससे पाचन तंत्र बेहतर रहता है और गैस व एसिडिटी की समस्या कम होती है।
- गले के लिए सुरक्षित: फ्रिज का अत्यधिक ठंडा पानी अक्सर गले की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाता है और सर्दी-खांसी का कारण बनता है। इसके विपरीत, घड़े का पानी ‘मृदु’ होता है जो गले के लिए अत्यंत सुखद और सुरक्षित माना जाता है।
- मेटाबॉलिज्म में सुधार: मिट्टी के बर्तन में रखे पानी में टेस्टोस्टेरोन का स्तर संतुलित रहता है, जिससे शरीर का मेटाबॉलिज्म बढ़ता है। प्लास्टिक की बोतलों में रखे पानी में हानिकारक रसायनों (जैसे बीपीए) का खतरा रहता है, जबकि मिट्टी पूरी तरह प्राकृतिक और सुरक्षित है।
इन तमाम लाभों के कारण भागलपुर की नई पीढ़ी भी अब प्लास्टिक की बोतलों को छोड़कर मिट्टी की सुराही अपना रही है।
स्थानीय कुम्हारों के चाक ने पकड़ी रफ्तार
बढ़ती मांग ने भागलपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के कुम्हारों के जीवन में नई उम्मीदें जगा दी हैं। वर्षों से अपनी कला को बचाने की जद्दोजहद कर रहे कुम्हारों के लिए यह सीजन काफी व्यस्तता भरा है। जगदीशपुर, लोदीपुर और सबौर जैसे इलाकों के कुम्हार दिन-रात मेहनत कर मिट्टी को आकार देने में जुटे हैं। उनके चाक अब थम नहीं रहे हैं, क्योंकि बाजार से लगातार नए ऑर्डर आ रहे हैं।
कुम्हारों के अनुसार, एक अच्छा घड़ा या सुराही बनाने में काफी मेहनत और समय लगता है। उपयुक्त मिट्टी का चयन, उसे गूंधना, चाक पर आकार देना और फिर विशेष भट्टी में पकाना एक लंबी प्रक्रिया है। हालांकि, कोयले और लकड़ी की बढ़ती कीमतों के कारण लागत में भी इजाफा हुआ है, लेकिन मांग अधिक होने के कारण उन्हें उचित मूल्य मिल पा रहा है। भागलपुर के स्थानीय कलाकारों ने अब आधुनिक मांग के अनुसार सुराही में नक्काशी और पेंटिंग का काम भी शुरू किया है, जिससे ये बर्तन ड्राइंग रूम की शोभा भी बढ़ा रहे हैं।
फ्रिज की निर्भरता कम, पारंपरिकता का पुनर्जागरण
एक समय था जब मध्यवर्गीय परिवारों में फ्रिज को प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। लोग मिट्टी के घड़ों को पुराने जमाने की चीज मानकर त्याग रहे थे। लेकिन 2026 के इस दौर में, जहाँ लोग ‘बैक टू रूट्स’ (अपनी जड़ों की ओर) जाने की बात कर रहे हैं, भागलपुर में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। अमीर हो या गरीब, हर वर्ग के लोग अब पारंपरिक सुराही को तरजीह दे रहे हैं।
किफायती दर पर उपलब्ध ये घड़े न केवल पानी ठंडा करते हैं, बल्कि बिजली की बचत भी करते हैं। एक अच्छी गुणवत्ता वाला घड़ा 100 से 250 रुपये के बीच आसानी से उपलब्ध है, जो एक फ्रिज की तुलना में नगण्य खर्च है। पर्यावरण के प्रति जागरूक लोगों का कहना है कि फ्रिज से निकलने वाली क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसें ओजोन परत को नुकसान पहुँचाती हैं, जबकि मिट्टी के बर्तन पूरी तरह इको-फ्रेंडली हैं।
बाजार में विविधता: सुराही से लेकर मिट्टी की बोतलों तक
इस साल भागलपुर के बाजारों में मिट्टी के बर्तनों में काफी विविधता देखी जा रही है। केवल घड़े और सुराही ही नहीं, बल्कि ‘मिट्टी की बोतलें’ (Clay Water Bottles) भी काफी चलन में हैं। कॉलेज जाने वाले युवा और दफ्तर जाने वाले लोग इन मिट्टी की बोतलों को पसंद कर रहे हैं, क्योंकि इन्हें ले जाना आसान है और ये पानी को घंटों तक प्राकृतिक रूप से ठंडा रखती हैं।
घंटाघर के पास खरीदारी करने आए एक स्थानीय नागरिक का कहना है कि मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ पानी पीने का अपना ही एक अलग आनंद है। यह हमें बचपन की यादों और अपनी संस्कृति से जोड़ता है। विक्रेताओं ने बताया कि इस बार सफेद मिट्टी (White Clay) और लाल मिट्टी के अलग-अलग पैटर्न वाले बर्तनों की मांग अधिक है। कुछ घड़े ऐसे भी हैं जिनमें नीचे की तरफ फिल्टर या नल लगा हुआ है, जिससे पानी निकालना काफी सुविधाजनक हो गया है।
संस्कृति और स्वावलंबन का संगम
भागलपुर में मिट्टी के बर्तनों की बढ़ती मांग केवल एक मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और पारंपरिक ज्ञान की जीत है। जब आधुनिक तकनीक स्वास्थ्य और पर्यावरण की कसौटी पर फेल होने लगती है, तो सदियों पुरानी परंपराएं ही समाधान बनकर सामने आती हैं। सिल्क सिटी की चिलचिलाती गर्मी में मिट्टी के ये घड़े न केवल लोगों की प्यास बुझा रहे हैं, बल्कि स्थानीय कलाकारों के घरों में खुशहाली भी ला रहे हैं।
प्रशासन और स्थानीय निकायों को भी चाहिए कि वे इन कुम्हारों को उचित स्थान और बाजार उपलब्ध कराएं ताकि यह प्राचीन कला भविष्य में और भी फल-फूल सके। फिलहाल, भागलपुर की गलियों में सजे ये लाल और भूरे रंग के मिट्टी के बर्तन अपनी सोंधी महक के साथ सुशासन और स्वावलंबन की एक नई कहानी लिख रहे हैं। अगर आप भी इस गर्मी में बीमारियों से बचना चाहते हैं और अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं, तो एक मिट्टी का घड़ा आपके लिए सबसे बेहतरीन निवेश साबित हो सकता है।


