​विक्रमशिला सेतु पर ‘सिस्टम’ का पहिया जाम: ओवरटेक की होड़ ने शनिवार को बनाया बंधक

भागलपुर। भागलपुर की लाइफलाइन और उत्तर-दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला एकमात्र सेतु ‘विक्रमशिला पुल’ एक बार फिर अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही का गवाह बना। शनिवार, 18 अप्रैल 2026 की सुबह जब लोग अपने गंतव्य की ओर निकल रहे थे, तब उन्हें यह भनक तक नहीं थी कि वे अगले तीन घंटे तक कंक्रीट के इस गर्म पिंजरे में कैद होने जा रहे हैं। सुबह 8 बजे से 11 बजे तक विक्रमशिला पुल पर ‘महाजाम’ का जो नजारा दिखा, उसने न केवल यातायात व्यवस्था की पोल खोल दी, बल्कि जिला प्रशासन के उस ‘मुस्तैदी’ के दावे को भी ध्वस्त कर दिया जहाँ ट्रैफिक कंट्रोल की बात कही जाती है। ओवरटेक की एक छोटी सी गलती और नियम तोड़ने की होड़ ने देखते ही देखते पुल से लेकर नवगछिया जीरोमाइल तक वाहनों की लंबी कतार लगा दी। इस दौरान तेज धूप और उमस भरी गर्मी ने लोगों के सब्र का इम्तिहान लिया। सबसे दुखद पहलू यह रहा कि जब हजारों लोग सड़क पर पसीने से तर-बतर होकर जूझ रहे थे, तब मौके पर एक भी ट्रैफिक पुलिसकर्मी व्यवस्था संभालने के लिए मौजूद नहीं था।

ओवरटेक की सनक और तीन घंटे का ‘ट्रैफिक टॉर्चर’

​शनिवार की सुबह अमूमन अन्य दिनों की तुलना में व्यस्त होती है। सुबह 8 बजे जैसे ही वाहनों का दबाव बढ़ा, कुछ चालक कम समय में पुल पार करने की होड़ में लग गए। पुल पर संकीर्ण रास्ते के बावजूद भारी वाहनों और बसों के बीच ओवरटेक करने की कोशिश ने पूरे ट्रैफिक को उलझा दिया। एक वाहन के गलत दिशा में जाने के कारण सामने से आ रहे वाहनों का रास्ता बंद हो गया और देखते ही देखते वाहनों की रेंगने वाली स्थिति पूरी तरह से ‘लॉक’ में बदल गई।

​सुबह 8 बजे शुरू हुआ यह जाम धीरे-धीरे विकराल होता गया। विक्रमशिला पुल के बीचों-बीच फँसे वाहन न आगे बढ़ पा रहे थे और न ही उनके लिए पीछे हटने का कोई रास्ता बचा था। जाम का असर इतना व्यापक था कि पुल का पूरा विस्तार और नवगछिया के जीरोमाइल तक का इलाका वाहनों से खचाखच भर गया। लगभग तीन घंटे तक हजारों लोग इस ‘ट्रैफिक टॉर्चर’ का शिकार रहे। भागलपुर और नवगछिया के बीच का यह सफर, जो कुछ मिनटों का होना चाहिए था, वह शनिवार को एक लंबी और कष्टदायक प्रतीक्षा में बदल गया।

तपती धूप और उमस: स्कूली बच्चों के लिए भारी पड़ी लापरवाही

​इस जाम का सबसे मार्मिक और चिंताजनक पक्ष उन मासूम स्कूली बच्चों से जुड़ा था, जो अपनी वैन और बसों में फँसे हुए थे। अप्रैल के इस महीने में जब पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार जा रहा है, बंद गाड़ियों के भीतर की उमस जानलेवा साबित हो रही थी। सुबह 9 बजे के बाद धूप के तेवर तीखे होने लगे और वाहनों के इंजन से निकलने वाली गर्मी ने स्थिति को और भी नारकीय बना दिया।

​स्कूली बच्चे, जो सुबह-सुबह तरोताजा होकर विद्यालय के लिए निकले थे, वे जाम के कारण घंटों तक पसीने से लथपथ होकर रोते-बिलखते देखे गए। अभिभावकों और शिक्षकों के चेहरे पर बेबसी साफ झलक रही थी। तपती धूप में पानी की कमी और बढ़ते तापमान के कारण कई बच्चों की तबीयत बिगड़ने जैसी स्थिति बन गई थी। वाहनों में बैठे बुजुर्ग और मरीज भी इस उमस भरी गर्मी में तड़पने को मजबूर थे। यह स्थिति यह बताने के लिए काफी है कि प्रशासन की एक छोटी सी अनदेखी कैसे आम जनता, विशेषकर बच्चों और मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।

वर्दी नदारद: जब रक्षकों ने मोड़ ली आंखें

​हैरानी की बात यह रही कि इतने बड़े पैमाने पर लगे जाम और हजारों लोगों की परेशानी के बावजूद मौके पर कानून व्यवस्था का कोई भी प्रतिनिधि नजर नहीं आया। पुल जैसे संवेदनशील स्थान पर, जहाँ रोजाना जाम की संभावना बनी रहती है, वहां एक भी पुलिसकर्मी या ट्रैफिक जवान की तैनाती नहीं होना प्रशासन की संवेदनशून्यता को उजागर करता है। पुल के दोनों छोरों पर लगे सीसीटीवी कैमरों और वायरलेस सेट की उपयोगिता पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।

​जाम में फँसे लोगों का कहना था कि अगर शुरुआत में ही एक-दो पुलिसकर्मी पहुँचकर ओवरटेक करने वाले वाहनों को रोक देते, तो स्थिति इतनी भयावह नहीं होती। लेकिन घंटों तक लोग पुलिस की मदद का इंतजार करते रहे और कोई नहीं आया। प्रशासन का यह रवैया दर्शाता है कि विक्रमशिला पुल जैसे महत्वपूर्ण रूट पर ट्रैफिक मैनेजमेंट केवल कागजों तक ही सीमित है। जब जनता को सुरक्षा और सहयोग की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब ‘खाकी’ नदारद रही।

जब आम जनता बनी ‘ट्रैफिक पुलिस’: खुद संभाला मोर्चा

​प्रशासन की बेरुखी और बढ़ती तपिश को देखते हुए अंततः वाहन चालकों और आम जनता ने ही साहस दिखाया। जब यह साफ हो गया कि कोई सरकारी मदद नहीं मिलने वाली, तो बस चालकों, छोटे वाहन मालिकों और स्थानीय राहगीरों ने खुद मोर्चा संभाला। कड़ी धूप में लोग अपने वाहनों से नीचे उतरे और स्वयं ही ट्रैफिक का संचालन करने लगे।

​लोगों ने एक-एक करके फँसे हुए वाहनों को पीछे कराया और गलत दिशा में खड़े ट्रकों को साइड लगवाया। वाहन चालकों ने आपस में तालमेल बिठाकर ‘वन-वे’ व्यवस्था लागू की और धीरे-धीरे फँसे हुए पहियों को गति दी। लगभग 11 बजे के आसपास, जनता की इसी सामूहिक कोशिश के कारण जाम धीरे-धीरे खुलना शुरू हुआ। यह दृश्य एक ओर जहाँ जनता की एकता को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन के चेहरे पर एक करारा तमाचा भी है कि जिस काम के लिए सरकारी तंत्र को वेतन मिलता है, वह काम अंततः पीड़ित जनता को ही करना पड़ा।

नियमित ट्रैफिक पोस्ट की मांग: आखिर कब जागेगा प्रशासन?

​विक्रमशिला पुल पर जाम की समस्या नई नहीं है, लेकिन शनिवार की इस घटना ने जनता के आक्रोश को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है। जाम में फँसे यात्रियों और चालकों ने एक सुर में प्रशासन से मांग की है कि पुल पर ट्रैफिक पुलिस की नियमित और स्थाई तैनाती होनी चाहिए। पुल के दोनों सिरों पर 24 घंटे गश्त की आवश्यकता है ताकि ओवरटेक करने वाले मनबढ़ चालकों पर तत्काल कार्रवाई की जा सके।

​लोगों का तर्क है कि भागलपुर जैसे स्मार्ट सिटी की ओर बढ़ते शहर में एक महत्वपूर्ण सेतु पर ट्रैफिक पोस्ट न होना दुर्भाग्यपूर्ण है। स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और रेल एसपी से अपील की है कि विक्रमशिला पुल के आसपास एक विशेष ट्रैफिक यूनिट बनाई जाए जो केवल इस मार्ग की निगरानी करे। भारी वाहनों के प्रवेश की समय-सीमा का कड़ाई से पालन हो और जो भी नियम तोड़े, उसका मौके पर ही भारी चालान काटा जाए। यदि भविष्य में ऐसी स्थिति फिर से बनी, तो जनता का आक्रोश सड़कों पर प्रदर्शन के रूप में भी फूट सकता है।

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