​बिहार में चीनी मिलों का पुनर्जन्म: 25 नई मिलों के लिए बिछेगा गन्ने का जाल, एनएफसीएसएफ को डीपीआर तैयार करने का जिम्मा

पटना। बिहार की ठप पड़ी औद्योगिक नसों में एक बार फिर ‘मीठी’ रफ़्तार भरने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना ‘सात निश्चय-3’ के तहत बिहार को देश के प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों की श्रेणी में वापस लाने के लिए एक बड़ा ब्लूप्रिंट तैयार किया है। इस विजन को धरातल पर उतारने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए गन्ना उद्योग विभाग ने राज्य में बंद पड़ी चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ 25 नई चीनी मिलों की स्थापना की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। इसी कड़ी में शनिवार, 18 अप्रैल 2026 को विभाग ने नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय सहकारी शक्कर कारखाना संघ (एनएफसीएसएफ) को चिह्नित जिलों में गन्ना विस्तार के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने का औपचारिक निर्देश जारी किया है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि नई मिलों की स्थापना केवल इमारतों और मशीनों तक सीमित नहीं रह सकती; उनकी सफलता के लिए सबसे अनिवार्य शर्त ‘कच्चे माल’ यानी गन्ने की पर्याप्त उपलब्धता है। यही कारण है कि मिलों के निर्माण से पहले उन क्षेत्रों में गन्ने की खेती के रकबे को बढ़ाने और उन्नत किस्म के बीजों के वितरण के लिए एक व्यापक रणनीति बनाई जा रही है।

सात निश्चय-3: बिहार की औद्योगिक क्रांति का नया संकल्प

​बिहार में चीनी मिलों का इतिहास गौरवशाली रहा है, लेकिन समय के साथ कई मिलें तकनीकी और आर्थिक कारणों से बंद हो गईं। अब सरकार ने इसे अपनी शीर्ष प्राथमिकता में रखा है। सात निश्चय-3 के तहत राज्य के विभिन्न जिलों में 25 नई चीनी मिलों की स्थापना का आदेश पारित किया गया है। गन्ना उद्योग विभाग ने इस विशाल परियोजना को तकनीकी रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए एनएफसीएसएफ (NFCSF) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए हैं।

​इस एमओयू का मुख्य उद्देश्य केवल नई मिलों का निर्माण करना ही नहीं है, बल्कि बिहार की जलवायु और मिट्टी के अनुरूप गन्ने की ऐसी प्रजातियों को विकसित करना है जो कम पानी में अधिक पैदावार दे सकें। विभाग का मानना है कि जब तक किसानों को गन्ने की खेती में लाभ नहीं दिखेगा, तब तक चीनी मिलों का संचालन सफल नहीं हो सकता। इसीलिए, एनएफसीएसएफ को जिम्मेदारी दी गई है कि वह उन जिलों का सूक्ष्म अध्ययन करे जहाँ मिलें लगनी हैं और वहां गन्ना उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘एक्शन प्लान’ तैयार करे।

ईख आयुक्त का निर्देश: डीपीआर में छिपी है विकास की कुंजी

​गन्ना उद्योग विभाग के ईख आयुक्त अनिल कुमार झा ने इस संबंध में एनएफसीएसएफ के प्रबंध निदेशक को पत्र भेजकर त्वरित कार्रवाई का आग्रह किया है। ईख आयुक्त के अनुसार, किसी भी चीनी मिल की वायबिलिटी (Viability) इस बात पर निर्भर करती है कि उसके ‘कमांड एरिया’ में कितना गन्ना उपलब्ध है। डीपीआर तैयार करने का निर्देश इसी दिशा में उठाया गया कदम है। इस रिपोर्ट में केवल कृषि संबंधी डेटा ही नहीं होगा, बल्कि इसमें लॉजिस्टिक्स, सिंचाई के साधन, किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और खाद-बीज की उपलब्धता का भी पूरा खाका खींचा जाएगा।

​विभाग चाहता है कि चीनी मिलों के निर्माण के साथ-साथ गन्ने की फसल भी तैयार रहे ताकि मिल चालू होते ही उसे पेराई के लिए पर्याप्त गन्ना मिल सके। ईख आयुक्त ने पत्र में स्पष्ट किया है कि चयनित जिलों में गन्ना विस्तार की प्रक्रिया को ‘मिशन मोड’ में चलाया जाना चाहिए। इसके लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञों और किसानों के साथ समन्वय स्थापित कर ऐसी व्यवस्था बनाई जाएगी जिससे किसानों को फसल की बिक्री और भुगतान के लिए भटकना न पड़े।

प्रथम चरण: सासामुसा से समस्तीपुर तक धड़केंगी मिलें

​सरकार ने इस महापरियोजना को विभिन्न चरणों में विभाजित किया है। प्रथम चरण में उन इलाकों को प्राथमिकता दी गई है जहाँ पहले से ही चीनी मिलों का आधारभूत ढांचा मौजूद है या जहाँ की मिट्टी गन्ने के लिए अत्यंत उर्वर है। इस सूची में शामिल प्रमुख स्थान निम्नलिखित हैं:

  • सासामुसा (गोपालगंज): यहाँ की बंद मिल को पुनर्जीवित करने के साथ विस्तार की योजना है।
  • वारसलीगंज (नवादा): दक्षिण बिहार के इस क्षेत्र में चीनी मिल की स्थापना से स्थानीय रोजगार को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
  • बनमनखी (पूर्णिया): पूर्णिया और आसपास के जिलों के किसानों के लिए यह मिल वरदान साबित होगी।
  • मढौरा (सारण): औद्योगिक पहचान खो चुके मढौरा को फिर से जीवंत करने की तैयारी है।
  • मोतीपुर (मुजफ्फरपुर): तिरहुत प्रमंडल के इस क्षेत्र में गन्ने की पैदावार की अपार संभावनाएं हैं।
  • समस्तीपुर: यहाँ नई अत्याधुनिक मिल स्थापित करने की संभावनाओं पर काम हो रहा है।

​इन जिलों में गन्ना विस्तार की तैयारी शुरू कर दी गई है। कृषि वैज्ञानिकों की टीम इन इलाकों का दौरा कर रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मिल की क्षमता के अनुसार वहां गन्ने का उत्पादन शुरू हो सके।

किसानों की आय और रोजगार के नए अवसर

​नई चीनी मिलों की स्थापना केवल चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं है। आज की आधुनिक चीनी मिलें ‘कंपोजिट यूनिट’ (Composite Unit) की तरह काम करती हैं, जहाँ गन्ने से चीनी के अलावा एथेनॉल, बिजली और जैविक खाद का भी उत्पादन होता है। बिहार सरकार का विजन एथेनॉल हब बनने का भी है, जिसके लिए गन्ने का रस सबसे प्रमुख स्रोत है।

​25 नई मिलें खुलने से राज्य में लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे। मिलों के संचालन, गन्ने की तुलाई, लोडिंग-अनलोडिंग और परिवहन में बड़ी संख्या में युवाओं को काम मिलेगा। सबसे बड़ा लाभ उन किसानों को होगा जो वर्तमान में कम लाभ वाली फसलों पर निर्भर हैं। गन्ने की खेती नकद आय का स्रोत है और मिलों की मौजूदगी से उन्हें उचित मूल्य की गारंटी मिलेगी। विभाग का लक्ष्य है कि किसानों को उनके गन्ने का भुगतान डिजिटल माध्यम से पारदर्शी तरीके से किया जाए, जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो सके।

तकनीकी सहयोग और एनएफसीएसएफ की भूमिका

​एनएफसीएसएफ (National Federation of Cooperative Sugar Factories) को इस परियोजना का तकनीकी सलाहकार बनाने के पीछे सरकार की सोच वैश्विक मानकों को अपनाना है। यह संस्था चीनी मिलों के प्रबंधन और गन्ना विकास में महारत रखती है। डीपीआर में इस बात पर भी जोर दिया जाएगा कि बिहार की मिलों में ‘हाई रिकवरी’ वाली मशीनें लगाई जाएं ताकि गन्ने की पेराई से अधिकतम चीनी और बाई-प्रोडक्ट्स प्राप्त किए जा सकें।

​अनिल कुमार झा ने निर्देश दिया है कि गन्ना विस्तार के लिए किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराए जाएं। इसके लिए विभाग नर्सरी विकसित करने और ‘सीड ट्रीटमेंट’ जैसी आधुनिक तकनीकों को किसानों तक पहुँचाने की योजना पर काम कर रहा है। विभाग का मानना है कि यदि गन्ना विस्तार का कार्य वैज्ञानिक तरीके से किया गया, तो बिहार आने वाले 5 वर्षों में देश के शीर्ष तीन चीनी उत्पादक राज्यों में शामिल हो जाएगा।

निष्कर्ष के बिना: एक कड़वा अतीत और मीठे भविष्य की उम्मीद

​18 अप्रैल 2026 की यह दोपहर बिहार के उन लाखों किसानों के लिए नई उम्मीद की किरण लेकर आई है जो अपनी बंद पड़ी मिलों के गेट खुलने का दशकों से इंतजार कर रहे थे। सासामुसा से लेकर वारसलीगंज तक के अंचल अब फिर से गन्ने की सरसराहट से गूँजेंगे। सरकार की यह पहल केवल उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए नहीं है, बल्कि यह बिहार की उस पुरानी साख को वापस पाने की लड़ाई है जब इसे ‘भारत का चीनी कटोरा’ कहा जाता था।

​डीपीआर तैयार होने के बाद निर्माण की प्रक्रिया में तेजी आएगी और वह दिन दूर नहीं जब बिहार की इन 25 नई मिलों से निकलने वाली चीनी की मिठास न केवल देश बल्कि विदेशी बाजारों तक पहुँचेगी। सम्राट चौधरी की सरकार ने जिस तरह से सात निश्चय-3 को लागू करने में गंभीरता दिखाई है, उससे यह स्पष्ट है कि बिहार अब औद्योगिक पिछड़ेपन को पीछे छोड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। गन्ना उद्योग विभाग के इस कदम ने न केवल कृषि को उद्योगों से जोड़ा है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए एक अभेद्य दीवार खड़ी कर दी है। अब नजरें एनएफसीएसएफ की उस रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो बिहार के ‘श्वेत क्रांति’ के अगले अध्याय की नींव रखेगी।

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