
भागलपुर। देश की सर्वोच्च पंचायत यानी लोकसभा में महिला आरक्षण बिल 2026 के पारित न हो पाने की गूँज अब बिहार के राजनैतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाओं के साथ सुनाई दे रही है। पूर्व राज्यसभा सांसद और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) की राष्ट्रीय महासचिव कहकशां परवीन ने इस घटनाक्रम पर कड़ा रुख अपनाते हुए कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष को ‘महिला विरोधी’ करार दिया है। शनिवार, 18 अप्रैल 2026 को जारी एक बयान में उन्होंने कहा कि संसद के भीतर जो कुछ भी हुआ, उसने विपक्षी दलों के उस दोहरे चरित्र को बेनकाब कर दिया है जो सार्वजनिक मंचों पर तो महिला सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन जब वास्तव में उन्हें अधिकार और भागीदारी देने का समय आता है, तो वे पीछे हट जाते हैं। कहकशां परवीन ने इस विधायी असफलता को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक काला अध्याय बताते हुए कहा कि विपक्ष ने देश की आधी आबादी के सपनों और उनके संवैधानिक हक के साथ बड़ा विश्वासघात किया है।
विपक्ष की ‘असली सोच’ पर तीखा प्रहार
कहकशां परवीन ने अपनी प्रतिक्रिया में किसी भी प्रकार की नरमी न बरतते हुए कहा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण बिल के खिलाफ मतदान कर यह साबित कर दिया है कि उनकी नजर में महिलाएं केवल एक ‘वोट बैंक’ हैं, नेतृत्व की हकदार नहीं। उन्होंने तर्क दिया कि जब देश की नारी शक्ति को लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत भागीदारी देकर उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाने का अवसर आया, तब विपक्ष ने अपनी संकीर्ण राजनैतिक विचारधारा को राष्ट्रहित से ऊपर रखा।
जदयू नेत्री के अनुसार, बिल का गिरना केवल एक तकनीकी हार नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों महिलाओं के स्वाभिमान पर चोट है जो वर्षों से अपनी राजनैतिक पहचान की प्रतीक्षा कर रही थीं। उन्होंने सवाल उठाया कि जो दल स्वयं को प्रगतिशील बताते हैं, उन्होंने आखिर किस मंशा से इस ऐतिहासिक सुधार को रोकने का काम किया? कहकशां परवीन ने कहा कि जनता और विशेषकर देश की महिलाएं इस घटना को भूलेंगी नहीं और आने वाले समय में वे उन चेहरों को जरूर पहचानेंगी जिन्होंने संसद के भीतर उनके हक की आवाज को दबाने का प्रयास किया है।
नीतीश मॉडल: महिला सशक्तिकरण की एक सफल मिसाल
विपक्ष की विफलता की तुलना करते हुए कहकशां परवीन ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में हुए क्रांतिकारी बदलावों का विस्तार से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जहाँ केंद्र में विपक्ष बाधाएं उत्पन्न कर रहा है, वहीं बिहार ने पूरे देश को रास्ता दिखाया है कि महिलाओं को वास्तव में कैसे सशक्त बनाया जाता है। उन्होंने रेखांकित किया कि नीतीश कुमार ने वर्षों पहले ही पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्हें सत्ता की मुख्यधारा से जोड़ने का साहसी फैसला लिया था।
उन्होंने बिहार सरकार की विभिन्न योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि साइकिल योजना और पोशाक योजना ने जहाँ लड़कियों की शिक्षा के स्तर को सुधारा, वहीं जीविका जैसी योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया है। कहकशां परवीन ने कहा, “बिहार का मॉडल आज पूरे देश के लिए एक नजीर है। हमने केवल नारे नहीं दिए, बल्कि जमीन पर काम करके दिखाया है। आज बिहार की बेटियां हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं, और यह सब नीतीश कुमार के उस अटूट विजन का परिणाम है जो महिलाओं को समाज की आधी नहीं, बल्कि बराबर की आबादी मानता है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि एनडीए सरकार की नीतियां हमेशा से महिला सुरक्षा और उनके सम्मान पर केंद्रित रही हैं।
संसद का वह घटनाक्रम और विपक्ष की ‘साजिश’
शुक्रवार की मध्यरात्रि को लोकसभा में जो दृश्य दिखा, उसे कहकशां परवीन ने एक सोची-समझी राजनैतिक साजिश का हिस्सा बताया। उल्लेखनीय है कि संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 के पक्ष में 298 मत पड़े थे, जबकि इसके विरोध में 230 वोट दर्ज किए गए। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण यह बिल कानून नहीं बन सका।
कहकशां परवीन का कहना है कि विपक्ष ने ‘कोटे के अंदर कोटा’ और ‘परिसीमन’ जैसे तकनीकी बहाने बनाकर जानबूझकर इस बिल का रास्ता रोका। उन्होंने कहा कि अगर विपक्ष की मंशा नेक होती, तो वे बिल को पारित होने देते और बाद में उसमें सुधार के सुझाव दे सकते थे। लेकिन उन्होंने बिल को गिराना ही बेहतर समझा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे महिलाओं को संसद की दहलीज पार करते नहीं देखना चाहते। उन्होंने कहा कि यह घटना भारतीय संसदीय इतिहास में विपक्ष के लिए एक स्थायी कलंक के रूप में जानी जाएगी।
एनडीए की प्रतिबद्धता और भविष्य का संकल्प
जदयू की राष्ट्रीय महासचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही संसद में यह बिल फिलहाल रुक गया हो, लेकिन जदयू और एनडीए का संकल्प कमजोर नहीं पड़ा है। उन्होंने कहा कि एनडीए सरकार महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उनके सर्वांगीण विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। कहकशां परवीन ने भरोसा जताया कि भविष्य में इस बिल को दोबारा लाया जाएगा और तब तक देश की जनता विपक्ष की इन बाधाओं को उखाड़ फेंकने का मन बना चुकी होगी।
उन्होंने भागलपुर सहित पूरे बिहार की महिलाओं से अपील की कि वे इस घटनाक्रम को गंभीरता से लें और यह समझें कि कौन सा दल उनके साथ खड़ा है और कौन केवल राजनैतिक लाभ के लिए उनके अधिकारों की बलि चढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि जदयू का हर कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर विपक्ष के इस महिला विरोधी चेहरे को उजागर करेगा। कहकशां परवीन के अनुसार, महिलाओं का सशक्तिकरण कोई राजनैतिक मुद्दा नहीं बल्कि एक सामाजिक अनिवार्यता है, जिसे नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में आगे बढ़ाया जाता रहेगा।
भागलपुर की राजनीति और कहकशां परवीन का प्रभाव
कहकशां परवीन का यह बयान भागलपुर के राजनैतिक हलकों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पूर्व राज्यसभा सांसद के रूप में उनकी पहचान एक प्रखर वक्ता और महिलाओं की समस्याओं को मुखरता से उठाने वाली नेत्री की रही है। उनके इस आक्रामक रुख से स्थानीय स्तर पर भी विपक्ष को सफाई देने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। भागलपुर जैसे संवेदनशील और जागरूक क्षेत्र में महिला आरक्षण का मुद्दा हमेशा से चर्चा में रहा है, और अब कहकशां परवीन ने इसे विपक्ष के खिलाफ एक बड़े हथियार में तब्दील कर दिया है।
उन्होंने अपने बयान के अंत में कहा कि बिहार में जिस तरह से पुलिस भर्ती से लेकर शिक्षण संस्थानों तक में महिलाओं के लिए जगह सुरक्षित की गई है, वैसी ही व्यवस्था राष्ट्रीय स्तर पर करने की कोशिश को विपक्ष ने नाकाम किया है। लेकिन यह जीत क्षणिक है, क्योंकि देश की नारी शक्ति अब जागृत हो चुकी है। जदयू की यह वरिष्ठ नेत्री आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर अन्य जिलों में भी संवाद करने की योजना बना रही हैं।
निष्कर्ष के बिना: एक वैचारिक युद्ध की शुरुआत
18 अप्रैल 2026 की यह रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि महिला आरक्षण बिल का गिरना केवल दिल्ली तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि इसने बिहार के सुदूर इलाकों तक राजनैतिक ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा कर दी है। कहकशां परवीन की यह कड़ी प्रतिक्रिया आने वाले चुनावों में एक बड़ा नैरेटिव (विमर्श) सेट करने का काम करेगी। जहाँ एक ओर विपक्ष अपनी मांगों को लेकर अड़ा है, वहीं जदयू और एनडीए ने इसे ‘महिला सम्मान बनाम अपमान’ की लड़ाई बना दिया है। बिहार की राजनीति, जो हमेशा से महिला सशक्तिकरण की प्रयोगशाळा रही है, वहां अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता इस राजनैतिक रस्साकशी को किस रूप में लेती है। कहकशां परवीन ने अपनी बात स्पष्टता से रख दी है—अब फैसला बिहार की ‘नारी शक्ति’ की अदालत में होना है।


