​गया की मोक्षभूमि पर उद्योगपति विनोद शांतिलाल अडानी: पितरों के उद्धार के लिए फल्गु तट पर किया पिंडदान

गया। विश्व प्रसिद्ध मोक्षदायिनी भूमि गया जी के इतिहास में एक और विशिष्ट अध्याय उस समय जुड़ गया, जब देश के दिग्गज उद्योगपति और अडानी समूह के अध्यक्ष गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद शांतिलाल अडानी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विष्णु नगरी पहुँचे। शुक्रवार को फल्गु नदी के तट से लेकर अक्षयवट की छांव तक श्रद्धा और समर्पण का एक अनूठा दृश्य देखने को मिला। वैश्विक व्यापार जगत के बड़े हस्ताक्षरों में शुमार विनोद शांतिलाल अडानी ने अपनी पत्नी के साथ पूरी सादगी और धार्मिक निष्ठा के साथ गया श्राद्ध का कर्मकांड संपन्न किया। तीर्थ पुरोहितों के मंत्रोच्चार और फल्गु की अंतःसलिला धारा के साक्षी भाव में उन्होंने अपने माता-पिता और समस्त पूर्वजों के निमित्त पिंडदान कर उनके मोक्ष की कामना की। इस हाई-प्रोफाइल आध्यात्मिक यात्रा को लेकर गया प्रशासन और विष्णुपद मंदिर प्रबंधन की ओर से सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए थे। यह यात्रा न केवल अडानी परिवार की धार्मिक जड़ों को दर्शाती है, बल्कि गया जी की उस वैश्विक महत्ता को भी रेखांकित करती है, जहाँ रंक हो या राजा, हर कोई अपने पितरों के उद्धार के लिए नतमस्तक होता है।

फल्गु के तट पर श्रद्धा का तर्पण: आध्यात्मिक यात्रा का आरंभ

​शुक्रवार की सुबह गया जी की फिजाओं में एक अलग ही हलचल थी। अडानी समूह के महत्वपूर्ण स्तंभ विनोद शांतिलाल अडानी अपनी पत्नी के साथ गया हवाई अड्डे पर उतरे और वहां से सीधे विष्णुपद क्षेत्र के लिए रवाना हुए। गया जी में पिंडदान का विधान अत्यंत प्राचीन और कड़ा माना जाता है। एक दिवसीय पिंडदान के संकल्प के साथ विनोद शांतिलाल अडानी ने अपनी यात्रा की शुरुआत पवित्र फल्गु नदी के तट से की। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, फल्गु नदी को माता सीता का श्राप मिला था, जिसके कारण यह नदी ऊपर से सूखी दिखती है लेकिन इसके भीतर जल की अविरल धारा बहती रहती है।

​विनोद शांतिलाल अडानी ने इसी अंतःसलिला फल्गु के तट पर बैठकर रेत के पिंड बनाए। उनके साथ मौजूद गयापाल पंडा और श्री विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष शंभू लाल विट्ठल ने शास्त्रोक्त विधि से मंत्रों का पाठ कराया। पारंपरिक वेशभूषा में सजे अडानी ने हाथ में तिल, कुशा और जल लेकर अपने पितरों का आह्वान किया। इस दौरान उनके चेहरे पर व्यापारिक व्यस्तताओं की जगह एक गहरे आत्मिक संतोष के भाव थे। उन्होंने पितरों के नाम पर तर्पण कर यह प्रार्थना की कि उनके कुल के जितने भी ज्ञात-अज्ञात पूर्वज हैं, उन्हें भगवान विष्णु के चरणों में स्थान प्राप्त हो।

विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट का विधान: मोक्ष की अंतिम सीढ़ी

​फल्गु तट पर कर्मकांड पूरा करने के बाद विनोद शांतिलाल अडानी विष्णुपद मंदिर परिसर पहुँचे। यह मंदिर भगवान विष्णु के पदचिह्नों के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है। यहाँ उन्होंने काले पत्थर पर अंकित भगवान विष्णु के चरण कमलों के दर्शन किए और वहां पिंडदान का दूसरा चरण संपन्न किया। शंभू लाल विट्ठल की देखरेख में उन्होंने विष्णु चरण पर पिंड अर्पित किए। गया श्राद्ध में विष्णु चरण का दर्शन और वहां पिंडदान करना पितरों को नरक के दुखों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। मंदिर परिसर में इस दौरान कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी ताकि सामान्य श्रद्धालुओं को असुविधा न हो और उद्योगपति भी अपनी धार्मिक क्रियाएं निर्बाध रूप से पूरी कर सकें।

​धार्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव अक्षयवट रहा। गया जी में ऐसी मान्यता है कि जब तक अक्षयवट के नीचे पिंडदान और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा नहीं दी जाती, तब तक गया श्राद्ध पूर्ण नहीं माना जाता। विनोद शांतिलाल अडानी ने इस विशाल और प्राचीन वट वृक्ष की छाया में बैठकर अपने पूर्वजों के लिए अंतिम पिंड दान किया। अक्षयवट को अमरता का प्रतीक माना जाता है, और यहाँ पिंडदान करने का अर्थ है कि पितरों को अक्षय तृप्ति प्राप्त हो। कर्मकांड के दौरान उनकी पत्नी ने भी बराबर की भागीदारी निभाई और परिवार की सुख-समृद्धि के साथ-साथ पूर्वजों के मोक्ष की कामना की।

प्रशासनिक सतर्कता और गयापाल समाज का सम्मान

​एक बड़े कॉर्पोरेट घराने के सदस्य की उपस्थिति को देखते हुए गया जिला प्रशासन ने सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए थे। विष्णुपद मंदिर जाने वाले रास्तों पर सादे लिबास में पुलिस बल तैनात थे। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने स्वयं सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। अडानी ग्रुप के सुरक्षा अधिकारी भी स्थानीय पुलिस के साथ समन्वय बना रहे थे। हालांकि, विनोद शांतिलाल अडानी ने पूरी प्रक्रिया के दौरान सादगी बनाए रखी और एक सामान्य श्रद्धालु की तरह कतारों और नियमों का पालन किया।

​पिंडदान की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद श्री विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति की ओर से एक संक्षिप्त सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। समिति के अध्यक्ष शंभू लाल विट्ठल ने विनोद शांतिलाल अडानी को अंगवस्त्र और भगवान विष्णु का स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। शंभू लाल विट्ठल ने बताया कि अडानी परिवार के तीर्थ पुरोहित के रूप में उनके पूर्वजों का रिकॉर्ड उनके पास सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि विनोद शांतिलाल अडानी का गया जी आना इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति चाहे कितनी भी ऊंचाइयों पर पहुँच जाए, अपनी संस्कृति और पितृ ऋण को चुकाना सबसे बड़ा धर्म होता है। समिति के अन्य सदस्यों ने भी उनकी इस धार्मिक निष्ठा की सराहना की।

पिंडदान का महत्व और अडानी परिवार की जड़ें

​सनातन धर्म में गया श्राद्ध का महत्व सर्वोपरि है। कहा जाता है कि ‘गया’ शब्द की उत्पत्ति गयासुर नामक असुर के नाम पर हुई थी, जिसे स्वयं भगवान विष्णु ने वरदान दिया था कि जो भी इस भूमि पर पिंडदान करेगा, उसके पितर सीधे स्वर्ग जाएंगे। विनोद शांतिलाल अडानी ने जिस तन्मयता से अपने माता-पिता के लिए यह अनुष्ठान किया, वह उनके पारिवारिक मूल्यों को दर्शाता है। गौतम अडानी और विनोद शांतिलाल अडानी जैसे सफल उद्यमियों के जीवन में अध्यात्म का यह पुट अक्सर देखने को मिलता है।

​गया जी के पंडा समाज में अडानी परिवार का आगमन चर्चा का विषय बना रहा। पुरोहितों के अनुसार, विनोद शांतिलाल अडानी ने अपने कुल के कई पीढ़ियों का नाम लेकर उनके उद्धार की प्रार्थना की। गया की इस माटी में यह शक्ति है कि यहाँ आने वाला व्यक्ति अपने अहंकार को त्याग कर केवल एक ‘पुत्र’ और ‘वंशज’ की भूमिका में होता है। अडानी ने भी इस परंपरा का निर्वहन कर समाज को यह संदेश दिया कि आधुनिकता के दौर में भी सनातन परंपराएं अटूट हैं।

भविष्य की स्मृतियाँ और गया का आध्यात्मिक पर्यटन

​विनोद शांतिलाल अडानी की इस यात्रा से गया जी के आध्यात्मिक पर्यटन को भी एक नई पहचान मिली है। जब वैश्विक स्तर के लोग गया जी पहुँचते हैं, तो इससे स्थानीय बुनियादी ढांचे और पर्यटन की संभावनाओं पर भी दुनिया का ध्यान जाता है। गया हवाई अड्डे से लेकर विष्णुपद मंदिर तक के मार्ग पर प्रशासन की मुस्तैदी और मंदिर समिति का प्रबंधन इस बात का संकेत है कि बिहार अब वीवीआईपी (VVIP) पर्यटन के लिए पूरी तरह तैयार है।

​शाम को अपनी यात्रा पूरी करने के बाद विनोद शांतिलाल अडानी ने गया जी की महिमा की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस भूमि पर पैर रखते ही एक असीम शांति का अनुभव होता है। पिंडदान का कर्मकांड संपन्न होने के बाद वे काफी भावुक नजर आए और उन्होंने अपने तीर्थ पुरोहितों का आभार व्यक्त किया। अडानी परिवार की यह संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण यात्रा अब गया के रिकॉर्ड रूम (बही-खाता) में दर्ज हो गई है, जहाँ सदियों से भारत के महान वंशों का इतिहास सुरक्षित है।

पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग

​18 अप्रैल 2026 की यह दोपहर गया की सड़कों और मंदिरों के लिए खास रही। विनोद शांतिलाल अडानी का आना और एक आम श्रद्धालु की तरह पिंडदान करना यह साबित करता है कि आस्था के केंद्र में पद और प्रतिष्ठा गौण हो जाते हैं। गया की फल्गु नदी ने आज एक बार फिर अपनी लहरों में एक और वंशज की प्रार्थनाओं को समेट लिया। जैसे-जैसे सूरज पश्चिम की ओर ढला, अडानी परिवार का विमान गया से उड़ान भर गया, लेकिन पीछे छोड़ गया उन पितरों के लिए मोक्ष की गूँज, जिनकी तृप्ति के लिए विनोद शांतिलाल अडानी ने गया की इस पवित्र माटी को स्पर्श किया था।

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