
जमुई। न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी जरूर बंधी होती है, लेकिन उसके कान और इंसाफ की तराजू कभी सुस्त नहीं पड़ते। बिहार के जमुई जिले से न्याय की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जो न केवल समाज के लिए एक कड़ा सबक है, बल्कि उन अपराधियों के लिए मौत की घंटी भी है जो समझते हैं कि वक्त की धूल उनके गुनाहों को दफन कर देगी। जमुई पोक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश महेश्वर दुबे की अदालत ने रिश्तों को शर्मसार करने वाले एक वहशी दरिंदे को उसके किए की ऐसी सजा सुनाई है कि आने वाली पीढ़ियां भी थर्रा जाएंगी। आरोपी पंकज कुमार सिन्हा, जिसे एक मासूम बच्ची ‘मामा’ कहकर पुकारती थी, उसे अपनी पूरी जिंदगी अब जेल की सलाखों के पीछे काटनी होगी। अदालत ने उसे अंतिम सांस तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह मामला केवल एक अदालती फैसला नहीं है, बल्कि एक 6 साल की बच्ची के उस असहनीय दर्द, खामोश आंसू और 13 साल के लंबे इंतजार की दास्तां है, जिसका अंत एक नई उम्मीद के साथ हुआ है।
भरोसे का कत्ल: जब ‘मामा’ बन गया मासूम का शिकारी
यह घटना आज से करीब 13-14 साल पहले की है, जब जमुई के सिरचंद नवादा इलाके में रहने वाली एक मासूम बच्ची की उम्र महज 6 साल थी। वह बचपन की दहलीज पर खड़ी दुनिया को अपनी मासूम आंखों से देख ही रही थी कि उसके पड़ोस में रहने वाले पंकज कुमार सिन्हा की काली नजर उस पर पड़ गई। पंकज को वह बच्ची ‘मामा’ कहती थी और उस पर अटूट भरोसा करती थी। एक दिन पंकज ने उसी भरोसे का गला घोंट दिया। वह बच्ची को अपने बच्चों के साथ खिलाने के बहाने अपने घर ले गया। वहां उसने कमरे की कुंडी बंद की और उस 6 साल की मासूम के साथ वहशीपन की सारी हदें पार कर दीं।
आरोपी ने न केवल उसके साथ दुष्कर्म किया, बल्कि अप्राकृतिक यौनाचार (Unnatural Sex) जैसी घृणित वारदात को अंजाम दिया। वह बच्ची इतनी छोटी थी कि उसे यह भी समझ नहीं आया कि उसके साथ क्या हो रहा है। वह न चिल्ला सकी, न विरोध कर पाई। वह दरिंदा अपनी हवस मिटाता रहा और वह मासूम लहूलुहान होकर बेहोश हो गई। उस दिन केवल एक बच्ची का शरीर घायल नहीं हुआ था, बल्कि मानवता और पड़ोसी जैसे पवित्र रिश्ते का भी कत्ल हो गया था।
10 साल का खामोश दर्द: कान और मुंह से बहता रहा खून
इस घटना के बाद उस बच्ची की जिंदगी एक कभी न खत्म होने वाले बुरे सपने में तब्दील हो गई। डर और लोक-लाज के कारण वह मासूम इस राज को अपने सीने में दबाए रही, लेकिन उसका शरीर गवाही देने लगा था। अगले 10-12 वर्षों तक उस बच्ची की हालत ऐसी रही कि उसके मुंह और कान से अक्सर खून निकलने लगता था। उसकी मां अपनी इकलौती बेटी की यह दशा देखकर व्याकुल रहती थी। वे उसे जमुई के स्थानीय डॉक्टरों से लेकर पटना के बड़े से बड़े विशेषज्ञों के पास ले गईं।
डॉक्टरों ने तमाम शारीरिक जांच कीं, लेकिन उन्हें कोई बीमारी समझ में नहीं आ रही थी। बच्ची का व्यवहार पूरी तरह बदल चुका था। वह गुमसुम रहने लगी, उसने पढ़ाई छोड़ दी और किसी से बात करना बंद कर दिया। वह मानसिक और शारीरिक रूप से अंदर ही अंदर टूट रही थी। किसी को अंदाजा भी नहीं था कि उस बच्ची के कान से निकलने वाला खून दरअसल उसके भीतर दबे उस राज की गूँज है, जिसे वह दुनिया को बता नहीं पा रही थी। 10 साल तक उस बच्ची ने मौत से भी बदतर जिंदगी जी, लेकिन इंसाफ का सूरज अभी उगना बाकी था।
दिल्ली की डॉक्टर बनीं देवदूत: काउंसलिंग में खुला 13 साल पुराना राज
इलाज की तलाश में दर-दर भटकता परिवार अंततः दिल्ली के प्रसिद्ध राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल पहुँचा। वहां उनकी मुलाकात मनोचिकित्सक डॉ. सुनीता कुमारी से हुई। डॉ. सुनीता ने भांप लिया कि यह मामला केवल शारीरिक बीमारी का नहीं है। उन्होंने उस किशोरी (जो अब 16 साल की हो चुकी थी) के साथ काउंसलिंग के कई सत्र आयोजित किए। डॉ. सुनीता की संवेदनशीलता और विश्वास ने वह जादू कर दिखाया जो 10 साल में कोई न कर सका।
एक दिन काउंसलिंग के दौरान वह लड़की फूट-फूटकर रो पड़ी और उसने 6 साल की उम्र में हुई उस दरिंदगी का सारा सच उगल दिया। डॉ. सुनीता यह सुनकर सन्न रह गईं कि जिस बच्ची का वे इलाज कर रही हैं, वह एक दशक से अधिक समय से इस भयानक कड़वे सच को ढो रही है। डॉक्टर ने केवल दवा नहीं दी, बल्कि न्याय का मार्ग भी दिखाया। उन्होंने तत्काल राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग, दिल्ली को सूचित किया और ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई। इसी शिकायत के आधार पर 29 अप्रैल 2024 को जमुई महिला थाने में मामला दर्ज हुआ और अगले ही दिन पुलिस ने पंकज सिन्हा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
अदालती कार्यवाही और ऐतिहासिक फैसला: 33 पन्नों में न्याय की गाथा
जमुई की अदालत में जब यह मामला पहुँचा, तो चुनौतियां कम नहीं थीं। घटना 13 साल पुरानी थी और साक्ष्यों को जुटाना मुश्किल था। लेकिन डॉ. सुनीता कुमारी की गवाही और पीड़िता के अडिग बयानों ने केस की दिशा बदल दी। डॉ. सुनीता ने दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी गवाही दर्ज कराई और विस्तार से बताया कि कैसे उस पुरानी घटना ने पीड़िता के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को तबाह कर दिया था। अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक मनोज कुमार शर्मा ने दलील दी कि यह ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में आने वाला अपराध है, जहाँ एक पड़ोसी ने रिश्ते का फायदा उठाकर मासूम का भविष्य बर्बाद कर दिया।
पोक्सो कोर्ट के जज महेश्वर दुबे ने अपने 33 पन्नों के विस्तृत फैसले में कानून की सूक्ष्मताओं पर प्रकाश डाला। हालांकि, पोक्सो एक्ट में 2019 के संशोधन के बाद अब ऐसे मामलों में मृत्युदंड तक का प्रावधान है, लेकिन चूँकि यह अपराध 2019 से पहले का था, इसलिए जज ने तत्कालीन कानून के तहत मिलने वाली अधिकतम सजा सुनाई। अदालत ने पंकज कुमार सिन्हा को दोषी पाते हुए ‘अंतिम सांस तक आजीवन कारावास’ (Natural Life Imprisonment) की सजा सुनाई। साथ ही, उस पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। कोर्ट ने पीड़िता को संबल देने के लिए ‘पीड़िता प्रतिकार योजना’ के तहत 7 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।
समाज के लिए संदेश: न्याय में देरी हो सकती है, अंधेर नहीं
जमुई का यह फैसला उन सभी अपराधियों के लिए एक बड़ा सबक है जो यह सोचते हैं कि वे कानून से बच निकलेंगे। 13 साल बाद मिली यह जीत यह साबित करती है कि अगर हिम्मत और सही मार्गदर्शन मिले, तो इंसाफ मिलकर ही रहता है। इस केस में डॉ. सुनीता कुमारी का योगदान यह सिखाता है कि चिकित्सा और सामाजिक जिम्मेदारी एक-दूसरे के पूरक हैं। जमुई की इस बेटी ने जो साहस दिखाया है, वह बिहार की उन तमाम बेटियों के लिए प्रेरणा है जो किसी न किसी रूप में शोषण का शिकार होती हैं।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि समाज में पड़ोसियों और रिश्तेदारों के प्रति बढ़ते अविश्वास को रोकने के लिए ऐसे कठोर फैसलों की सख्त जरूरत है। दोषी पंकज सिन्हा अब अपनी पूरी जिंदगी जेल की चहारदीवारी के पीछे बिताएगा, जहाँ वह हर पल उस मासूम की चीखें सुनेगा जिसे उसने सालों पहले दबा दिया था। यह फैसला जमुई पुलिस की कार्यकुशलता और न्यायपालिका की संवेदनशीलता पर जनता का विश्वास और बढ़ाएगा।
सुरक्षा और जागरूकता: हेल्पलाइन 112 का सहारा
इस घटना के सामने आने के बाद बिहार पुलिस और प्रशासन ने एक बार फिर अपील की है कि किसी भी प्रकार की हिंसा या शोषण के खिलाफ चुप न रहें। पुलिस विभाग महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए लगातार अभियान चला रहा है। यदि किसी महिला या बच्चे के साथ कोई अप्रिय घटना घटती है, या उन्हें किसी भी प्रकार का खतरा महसूस होता है, तो वे तुरंत आपातकालीन नंबर 112 डायल कर सकते हैं।
बिहार पुलिस की डायल 112 सेवा अब हाई-टेक हो चुकी है और सूचना मिलते ही पुलिस की टीम मौके पर पहुँचती है। इसके अलावा, स्कूलों और कॉलेजों में भी काउंसलिंग के जरिए बच्चों को ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में जागरूक किया जा रहा है ताकि भविष्य में कोई और पंकज सिन्हा किसी मासूम का बचपन न छीन सके। जमुई की इस बहादुर बेटी को मिला इंसाफ यह संदेश देता है कि न्याय के द्वार हमेशा खुले हैं, बस एक कदम उठाने की हिम्मत चाहिए।


