​नीतीश की विदाई पर छलका मांझी का दर्द: ‘दलित के बेटे को पहचान दी’, सम्राट युग पर भी जताया भरोसा

पटना। बिहार की सत्ता में आज 15 अप्रैल 2026 की दोपहर जब एक नया इतिहास लिखा जा रहा था, तब पटना के राजनैतिक गलियारों में केवल नारों की गूँज ही नहीं थी, बल्कि भावनाओं का एक ऐसा ज्वार भी था जिसने पुराने दिग्गजों को भावुक कर दिया। लोकभवन में सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही जहाँ भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच जश्न का माहौल है, वहीं एनडीए के सबसे वरिष्ठ नेताओं में शुमार और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की आँखों से आँसू छलक आए। शपथ ग्रहण समारोह के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने एक ऐसी बात कह दी, जिसने बिहार की पिछले दो दशकों की राजनीति के उस मानवीय पक्ष को उजागर कर दिया जिसे अक्सर चुनावी गणित के पीछे भुला दिया जाता है। मांझी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे जो कुछ भी हैं, उसके पीछे नीतीश कुमार की वह पहचान है जो उन्होंने साल 2014 में एक दलित के बेटे को मुख्यमंत्री बनाकर दी थी। यह बयान उस समय आया है जब नीतीश कुमार खुद सक्रिय राज्य राजनीति से हटकर राज्यसभा की ओर प्रस्थान कर रहे हैं और बिहार की कमान पहली बार भारतीय जनता पार्टी के किसी चेहरे के पास आई है।

मांझी के आँसू: एक पहचान की कृतज्ञता

​जीतन राम मांझी का भावुक होना केवल एक राजनैतिक औपचारिकता नहीं थी। उनकी आवाज में वह भारीपन था जो दशकों के संघर्ष के बाद मिलने वाली पहचान के प्रति सम्मान को दर्शाता है। मांझी ने कहा, “आज जो जीतन मांझी है, वह नीतीश कुमार के द्वारा ही पहचानित है। अगर 2014 में उन्होंने मुझे मुख्यमंत्री नहीं बनाया होता, तो आज पूरे देश में हमारी इतनी चर्चा नहीं होती।” मांझी ने उस ऐतिहासिक पल को याद किया जब नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव में हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ दिया था और अपनी जगह एक महादलित समुदाय से आने वाले कार्यकर्ता को बिहार की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठाया था। उन्होंने कहा कि एक साधारण पृष्ठभूमि से आए व्यक्ति के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचना किसी सपने जैसा था। मांझी ने रुंधे गले से कहा, “सबसे बड़ी बात यह है कि एक दलित के बच्चे को उन्होंने वह पद और सम्मान दिया। स्वाभाविक है कि जब वे जा रहे हैं, तो मेरी आँखों से आँसू कैसे न आते।” मांझी का यह बयान उस सामाजिक न्याय के संघर्ष की भी याद दिलाता है जिसमें पिछड़े और अति-पिछड़े वर्गों के नेतृत्व को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया गया।

20 साल का सुशासन और ‘सम्राट’ से उम्मीदें

​मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी की ताजपोशी पर भी जीतन राम मांझी ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने नीतीश कुमार के दो दशकों के शासन को एक मजबूत नींव बताया। मांझी का मानना है कि नीतीश कुमार ने जिस तरह से बिहार में ‘सुशासन’ का मॉडल स्थापित किया, उसने राज्य को एक नई दिशा दी है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि 20 साल के लंबे कार्यकाल में शासन में कुछ कमियाँ रह जाना स्वाभाविक है।

​सम्राट चौधरी को शुभकामनाएं देते हुए मांझी ने कहा, “नीतीश कुमार ने जैसी सरकार 20 साल तक चलाई, वह सराहनीय है। हम समझते हैं कि यदि उस शासन में कोई कमी रही भी होगी, तो उसे पूरा करके सम्राट चौधरी बिहार को आगे ले जाएंगे।” मांझी का यह भरोसा सम्राट चौधरी के लिए एक बड़ी चुनौती और जिम्मेदारी दोनों है। उन्होंने नए मुख्यमंत्री से अपेक्षा की कि वे नीतीश कुमार द्वारा खींची गई विकास की लकीर को और आगे बढ़ाएंगे और बिहार की जनता की बदलती हुई आकांक्षाओं पर खरा उतरेंगे।

गया की मिट्टी से लोकभवन तक का सफर: मांझी का संघर्ष

​जीतन राम मांझी का यह बयान उनके अपने संघर्षमय अतीत की कड़ियों को जोड़ता है। 6 अक्टूबर 1944 को गया जिले के खिजरसराय क्षेत्र के महकार गांव में जन्मे मांझी का जीवन गरीबी और अभावों के बीच शुरू हुआ था। उनके पिता रामजीत राम मांझी और माता सुकरी देवी खेतिहर मजदूर थे। एक मुसहर (महादलित) परिवार में जन्म लेने के बाद शिक्षा प्राप्त करना और राजनीति के शीर्ष तक पहुँचना उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।

​मांझी ने मगध विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद डाक और तार विभाग में लिपिक (क्लर्क) के रूप में 13 साल तक नौकरी की थी। लेकिन 1980 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा और कांग्रेस के टिकट पर फतेहपुर से विधायक बने। इसके बाद उन्होंने राजद और फिर जदयू के साथ काम किया। 2014 में नीतीश कुमार द्वारा उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद उनके राजनैतिक जीवन में जो मोड़ आया, उसने उन्हें न केवल बिहार बल्कि देश की राजनीति में एक बड़ी पहचान दिलाई। भले ही बाद में नीतीश कुमार और मांझी के रिश्तों में खटास आई और 2015 में एक बड़ा राजनैतिक संकट पैदा हुआ, लेकिन आज 2026 के इस सत्ता परिवर्तन के मोड़ पर मांझी ने उन तमाम कड़वाहटों को भुलाकर केवल उस ‘पहचान’ को याद रखा जो उन्हें नीतीश कुमार से मिली थी।

नीतीश-मांझी की जुगलबंदी और 2015 का वह टकराव

​बिहार की राजनीति को करीब से जानने वाले जानते हैं कि नीतीश कुमार और जीतन राम मांझी का रिश्ता कभी बहुत करीब तो कभी धुर विरोधी रहा है। 2014 में मुख्यमंत्री बनने के नौ महीने बाद जब नीतीश कुमार ने वापस लौटने का मन बनाया था, तब मांझी ने पद छोड़ने से इनकार कर दिया था। उस समय हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) का जन्म हुआ और मांझी ने नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। लेकिन समय का चक्र ऐसा घूमा कि 2026 आते-आते ये दोनों नेता फिर से एनडीए के एक ही पाले में खड़े नजर आए।

​मांझी का आज का बयान यह साबित करता है कि राजनीति में कोई भी रिश्ता स्थायी नहीं होता, लेकिन राजनैतिक कृतज्ञता हमेशा बनी रहती है। उन्होंने जिस तरह से ‘दलित का बच्चा’ शब्द का प्रयोग किया, वह बिहार की उस जातीय राजनीति पर भी चोट करता है जहाँ अभी भी कई समुदायों को नेतृत्व के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। मांझी ने यह जता दिया कि उनके मन में आज भी नीतीश कुमार के प्रति वही सम्मान है जो 2014 में शपथ लेने के समय था।

सम्राट युग के लिए मांझी का ‘अनुभव’ होगा मार्गदर्शक

​अब जबकि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बन चुके हैं, जीतन राम मांझी की भूमिका एक ‘वरिष्ठ मार्गदर्शक’ की होने वाली है। एनडीए के भीतर मांझी का अनुभव सम्राट चौधरी के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। मांझी ने संकेत दिया कि नई सरकार को केवल विकास के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे उस सामाजिक समरसता और हाशिए पर खड़े लोगों के उत्थान के लिए भी काम करना चाहिए जिसे नीतीश कुमार ने शुरू किया था।

​उन्होंने विश्वास जताया कि सम्राट चौधरी की युवा ऊर्जा और नीतीश कुमार के अनुभवों का संगम बिहार को एक विकसित राज्य की श्रेणी में लेकर जाएगा। मांझी के अनुसार, नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन ‘गैप्स’ (दूरियों) को भरने की है जो लंबे समय तक शासन में रहने के कारण पैदा हो जाते हैं। वे चाहते हैं कि दलितों और पिछड़ों का जो विश्वास एनडीए पर है, वह इस नए नेतृत्व में और अधिक मजबूत हो।

बिहार की राजनीति में विदाई और स्वागत का संगम

​15 अप्रैल की यह शाम पटना के लिए विदाई और स्वागत के एक अनूठे संगम की गवाह रही। एक तरफ नीतीश कुमार का भावुक विदाई संदेश था, तो दूसरी ओर सम्राट चौधरी का जोश से भरा शपथ ग्रहण। इन सबके बीच जीतन राम मांझी के आँसू एक ऐसी कहानी कह रहे थे जो सत्ता के लालच से परे, व्यक्तिगत रिश्तों और पहचान की राजनीति से जुड़ी है। मांझी ने यह संदेश दिया कि बिहार को विकसित बनाने का सपना केवल एक दल या एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि यह उन तमाम लोगों का साझा संकल्प है जिन्होंने इस माटी के लिए काम किया है।

​नीतीश कुमार द्वारा दी गई पहचान और सम्राट चौधरी द्वारा जगाई गई नई उम्मीद के बीच, जीतन राम मांझी आज बिहार के उस स्थिर राजनैतिक चरित्र के रूप में खड़े नजर आए, जो हर बदलाव को एक नई संभावना के रूप में देखता है। उनके आँसू खुशी के भी हैं और एक युग के अंत की उदासी के भी। अब देखना यह होगा कि सम्राट चौधरी, मांझी के इस विश्वास और नीतीश की इस विरासत को कितना आगे बढ़ा पाते हैं।

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