​बिहार में आंगनबाड़ी केंद्रों की ‘स्वच्छता परीक्षा’: 1.13 लाख केंद्रों की जारी होगी रैंकिंग, अब सफाई से तय होगा ‘मॉडल’ का दर्जा

पटना। बिहार के आंगनबाड़ी केंद्रों की तस्वीर अब बदलने वाली है। अब इन केंद्रों पर न केवल पोषण और पढ़ाई पर ध्यान दिया जाएगा, बल्कि ‘स्वच्छता’ को भी सफलता का सबसे बड़ा पैमाना माना जाएगा। राज्य सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए प्रदेश के सभी 1.13 लाख आंगनबाड़ी केंद्रों की ‘स्वच्छता रैंकिंग’ जारी करने का निर्णय लिया है। रविवार, 12 अप्रैल 2026 को विभाग द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस रैंकिंग का मुख्य उद्देश्य इन केंद्रों को बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित, स्वच्छ और सुव्यवस्थित बनाना है। जो केंद्र इस रैंकिंग में अव्वल आएंगे, उन्हें भविष्य में ‘मॉडल’ केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। यह पहल न केवल बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार करेगी, बल्कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और जीविका दीदियों के बीच एक नई ऊर्जा और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को भी जन्म देगी। बिहार जैसे विशाल राज्य में, जहाँ कुपोषण और स्वच्छता से जुड़ी बीमारियां एक बड़ी चुनौती रही हैं, वहां यह कदम दूरगामी परिणाम लेकर आने वाला साबित हो सकता है।

रैंकिंग की कसौटी: किन पैमानों पर कसे जाएंगे आंगनबाड़ी केंद्र?

​स्वच्छता रैंकिंग की यह प्रक्रिया केवल एक औपचारिक कवायद नहीं होगी, बल्कि इसके लिए सरकार ने अत्यंत कड़े और वैज्ञानिक मापदंड तय किए हैं। प्रत्येक केंद्र को अलग-अलग श्रेणियों में परखा जाएगा और उसी के आधार पर उन्हें अंक (Points) दिए जाएंगे।

​सबसे पहला और महत्वपूर्ण मानक परिसर की स्वच्छता को बनाया गया है। इसके तहत आंगनबाड़ी केंद्र के भवन के अंदर की सफाई के साथ-साथ उसके आसपास के वातावरण का भी सूक्ष्म निरीक्षण किया जाएगा। अक्सर देखा गया है कि केंद्रों के बाहर जलजमाव या गंदगी का ढेर रहता है, जो बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अब ऐसी स्थिति होने पर केंद्र की रैंकिंग गिर जाएगी।

​दूसरा प्रमुख बिंदु शौचालय की स्थिति है। केवल शौचालय का निर्माण होना ही काफी नहीं होगा, बल्कि उसका क्रियाशील होना, वहां नियमित सफाई की व्यवस्था और पर्याप्त पानी की उपलब्धता अनिवार्य है। बच्चों को बचपन से ही स्वच्छता की आदत डालने के लिए यह एक बुनियादी आवश्यकता है।

पेयजल की गुणवत्ता को भी रैंकिंग में विशेष स्थान दिया गया है। बच्चों के लिए शुद्ध और सुरक्षित पीने के पानी की व्यवस्था हर केंद्र पर सुनिश्चित करनी होगी। दूषित पानी से होने वाली बीमारियों को रोकने के लिए विभाग अब पानी के भंडारण और उसके वितरण के तरीकों पर कड़ी नजर रखेगा।

​चौथा महत्वपूर्ण पैमाना हाथ धुलाई की सुविधा (Hand Washing Facility) है। बच्चों को भोजन से पहले और बाद में हाथ धोने के लिए साबुन और पानी की उपलब्धता अनिवार्य की गई है। इसके जरिए बच्चों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है।

​इसके अतिरिक्त, कचरा प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। सूखे और गीले कचरे का सही तरीके से निपटान करना और केंद्र परिसर को कचरा मुक्त रखना रैंकिंग में अच्छे अंक दिलाएगा।

​अंत में, बाल अनुकूल वातावरण का मूल्यांकन किया जाएगा। केंद्र का परिवेश ऐसा होना चाहिए जो बच्चों के लिए आकर्षक, स्वस्थ और सुरक्षित हो। बैठने की समुचित व्यवस्था, हवादार कमरे और खेलने के लिए स्वच्छ स्थान जैसे पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।

त्रिस्तरीय सहयोग: ICDS, जीविका और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान का संगम

​इस विशाल मूल्यांकन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक धरातल पर उतारने के लिए बिहार सरकार ने एक ‘त्रिकोणीय’ कार्ययोजना तैयार की है। यह रैंकिंग किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं होगी, बल्कि आईसीडीएस (ICDS), जीविका और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (LSBA) के आपसी समन्वय से तैयार की जाएगी।

​इस समन्वय का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि निगरानी तंत्र मजबूत होगा। राज्य स्तर से लेकर जिला, प्रखंड और संकुल (Cluster) स्तर तक अलग-अलग टीमें बनाई जाएंगी जो समय-समय पर केंद्रों का दौरा करेंगी। जीविका दीदियों को इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण ‘निरीक्षक’ और ‘सहयोगी’ की भूमिका दी गई है। चूंकि जीविका दीदियाँ जमीनी स्तर पर समुदायों से जुड़ी होती हैं, इसलिए वे स्वच्छता के संदेश को घर-घर पहुँचाने और आंगनबाड़ी केंद्रों की जवाबदेही तय करने में सक्षम होंगी।

​विभागीय अधिकारियों का कहना है कि रैंकिंग जारी करने से न केवल केंद्रों की वर्तमान स्थिति का पता चलेगा, बल्कि एक डेटाबेस भी तैयार होगा जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन क्षेत्रों में सुधार की सबसे ज्यादा जरूरत है। यह डेटा आधारित गवर्नेंस सुशासन की दिशा में एक बड़ा कदम है।

रैंकिंग का उद्देश्य: सुधार और प्रोत्साहन का ‘डबल इंजन’

​इस रैंकिंग प्रणाली के पीछे सरकार की सोच बहुआयामी है। सबसे पहला उद्देश्य स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (Healthy Competition) को बढ़ावा देना है। जब केंद्रों को पता होगा कि उनकी स्वच्छता रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी और उसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा, तो वहां कार्यरत कर्मी अपनी साख बचाने के लिए बेहतर प्रदर्शन करेंगे।

​दूसरा बड़ा उद्देश्य मॉडल केंद्रों का निर्माण है। जो आंगनबाड़ी केंद्र रैंकिंग में लगातार अच्छा प्रदर्शन करेंगे, उन्हें ‘मॉडल’ का दर्जा दिया जाएगा और वहां अन्य केंद्रों के कर्मियों को ‘बेस्ट प्रैक्टिस’ सीखने के लिए भेजा जाएगा।

​तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू सुधार के लिए विशेष अभियान है। जो केंद्र रैंकिंग में पिछड़ जाएंगे, उन्हें छोड़ नहीं दिया जाएगा, बल्कि विभाग वहां की कमियों को दूर करने के लिए विशेष फंड और संसाधन उपलब्ध कराएगा। इसका अंतिम लक्ष्य यह है कि बिहार का कोई भी आंगनबाड़ी केंद्र स्वच्छता के मानकों से नीचे न रहे।

कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की भूमिका और जिम्मेदारी

​इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं हैं। रैंकिंग प्रणाली उन्हें स्वच्छता के प्रति अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह बनाएगी। अच्छी रैंकिंग मिलने पर न केवल केंद्र का नाम होगा, बल्कि वहां कार्यरत कर्मियों को विभाग की ओर से विशेष प्रशस्ति पत्र और प्रोत्साहन भी दिया जाएगा।

​इससे पहले बिहार में ‘मिशन सक्षम आंगनबाड़ी’, ‘पोषण माह’ और ‘हाथ धुलाई दिवस’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए व्यापक जागरूकता फैलाई गई है। लेकिन ‘स्वच्छता रैंकिंग’ इन सभी प्रयासों को एक व्यवस्थित और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बना देगी। विभाग के अनुसार, यह रैंकिंग हर तीन महीने में अपडेट की जाएगी, जिससे स्वच्छता की स्थिति स्थिर न रहकर लगातार बेहतर होती रहे।

सुशासन और स्वस्थ बचपन की ओर बढ़ते कदम

​बिहार सरकार की यह पहल राज्य के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लाखों बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने का एक प्रयास है। 1.13 लाख केंद्रों की निगरानी करना निस्संदेह एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है, लेकिन तकनीक और सामुदायिक सहयोग के जरिए इसे मुमकिन बनाया जा रहा है। The Voice of Bihar (VOB) की टीम इस कदम को एक ‘गेम-चेंजर’ के रूप में देखती है। एक स्वच्छ आंगनबाड़ी केंद्र ही एक स्वस्थ और सशक्त समाज की नींव रख सकता है।

​जब बच्चे एक स्वच्छ वातावरण में अपना बचपन बिताएंगे, तो उनमें बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ेगी और वे अपनी पढ़ाई व पोषण पर बेहतर ध्यान दे सकेंगे। अब देखना यह होगा कि इस रैंकिंग के लागू होने के बाद बिहार के कौन से जिले ‘स्वच्छता के चैंपियन’ बनकर उभरते हैं। यह पहल बिहार की छवि को एक ऐसे राज्य के रूप में पेश करेगी जो अपने बच्चों के बुनियादी स्वास्थ्य और गरिमा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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