​बिहार के गांवों में ‘गोबर’ बना ‘गोवर्धन’: पाइपलाइन से रसोई तक पहुँच रही बायोगैस, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदली तस्वीर

पटना। बिहार के ग्रामीण अंचल अब धुएं से मुक्त होकर ‘स्मार्ट ऊर्जा’ की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। कभी जिस गोबर को केवल उपले बनाने या बेकार कचरे के रूप में देखा जाता था, वह आज ‘गोवर्धन योजना’ के जरिए गांवों के लिए वरदान साबित हो रहा है। राज्य में एलपीजी की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति की चुनौतियों के बीच ग्रामीण विकास विभाग की यह पहल न केवल रसोई को स्वच्छ ईंधन दे रही है, बल्कि ग्रामीण आजीविका और पर्यावरण संतुलन के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आई है। रविवार, 12 अप्रैल 2026 को जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, बिहार में अब तक बायोगैस की 23 इकाइयां पूरी तरह संचालित हो चुकी हैं, जबकि 15 अन्य इकाइयों पर काम अंतिम चरण में है। यह पहल ‘लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान’ (LSBA) के तहत गांवों की तस्वीर बदलने का एक सशक्त माध्यम बन गई है।

धुएं से आजादी: पाइपलाइन के जरिए सीधे रसोई तक गैस

​बिहार के गांवों में सदियों से महिलाएं लकड़ी और उपलों के धुएं के बीच खाना बनाने को मजबूर थीं, जिससे न केवल उनके फेफड़ों पर बुरा असर पड़ता था, बल्कि पर्यावरण को भी भारी नुकसान होता था। गोबरधन योजना ने इस समस्या का एक वैज्ञानिक और टिकाऊ समाधान निकाला है। ग्रामीण विकास विभाग द्वारा स्थापित बायोगैस इकाइयां अब पाइपलाइन के माध्यम से सीधे ग्रामीण घरों तक गैस पहुँचा रही हैं।

​वर्तमान में संचालित 23 इकाइयां राज्य के विभिन्न जिलों में एक ‘मॉडल’ के रूप में उभरी हैं। इसके अलावा, जिन 15 नई इकाइयों का निर्माण पूरा हो चुका है, वहां फीडिंग और पाइपलाइन फिटिंग का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। अधिकारियों का मानना है कि इन सभी इकाइयों के शुरू होने के बाद, ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी। प्रत्येक इकाई औसतन 35 से 40 घरों को गैस की आपूर्ति कर रही है, जिससे ग्रामीणों को अब महंगे सिलेंडरों के लिए लंबी कतारों में लगने की जरूरत नहीं पड़ रही है।

वैज्ञानिक प्रबंधन: 2,000 किलो गोबर का हर दिन प्रसंस्करण

​यह योजना केवल गैस बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कचरा प्रबंधन का एक बेहतरीन उदाहरण है। स्थापित की गई बायोगैस इकाइयों की क्षमता लगभग 2 केएलडी (किलो लीटर प्रतिदिन) है। ये इकाइयां एक बार में करीब 2,000 किलोग्राम गोबर का प्रसंस्करण करने में सक्षम हैं।

​वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत, पशुओं के गोबर को डाइजेस्टर में डाला जाता है, जहाँ एनारोबिक पाचन (Anaerobic Digestion) के जरिए मीथेन गैस उत्पन्न होती है। यही गैस पाइपलाइन के जरिए चूल्हों तक पहुँचती है। इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह मीथेन के उत्सर्जन को कम करती है, जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार एक प्रमुख गैस है। इस प्रकार, बिहार के गांव अनजाने में ही जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध वैश्विक लड़ाई में अपना योगदान दे रहे हैं।

स्लरी का जादू: जैविक खाद से खेतों में बढ़ेगी चमक

​बायोगैस उत्पादन के बाद जो अवशेष बचता है, उसे ‘स्लरी’ कहा जाता है। किसानों के लिए यह स्लरी किसी सोने से कम नहीं है। पोषक तत्वों से भरपूर इस तरल और ठोस अवशेष का उपयोग जैविक उर्वरक के रूप में किया जा रहा है।

  • उर्वरक की बचत: इस जैविक खाद के उपयोग से किसानों को महंगे रासायनिक खादों (जैसे यूरिया और डीएपी) पर निर्भरता कम हो गई है।
  • मिट्टी की सेहत: रासायनिक खाद के अत्यधिक उपयोग से बंजर होती जमीन को यह स्लरी नया जीवन दे रही है।
  • अतिरिक्त आय: कई गांवों में स्वयं सहायता समूह इस स्लरी को सुखाकर और पैकेट बंद कर जैविक खाद के रूप में बेच रहे हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी हो रही है।

महिला सशक्तिकरण: जीविका दीदियों के हाथों में कमान

​बिहार में किसी भी बड़ी ग्रामीण योजना की सफलता के पीछे ‘जीविका’ की महिलाओं का बड़ा हाथ होता है। गोबरधन योजना की सफलता का श्रेय भी इन्हीं प्रशिक्षित महिलाओं को जाता है। बायोगैस इकाइयों का संचालन और देखरेख मुख्य रूप से जीविका स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की महिलाएं ही कर रही हैं।

​इन महिलाओं को बायोगैस संयंत्र के तकनीकी संचालन, गोबर के सही अनुपात में मिश्रण और पाइपलाइन के रख-रखाव के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। इससे न केवल गांवों में रोजगार के नए अवसर सृजित हुए हैं, बल्कि महिलाओं के भीतर नेतृत्व क्षमता और तकनीकी कौशल का भी विकास हुआ है। अब ये महिलाएं स्वयं ‘ऊर्जा उद्यमी’ के रूप में अपनी पहचान बना रही हैं।

शिक्षा संस्थानों में बदलाव: बेगूसराय से गोपालगंज तक सफलता की कहानी

​इस योजना की सफलता के कई चमकते उदाहरण राज्य के विभिन्न जिलों में देखने को मिल रहे हैं:

  1. बेगूसराय: यहाँ के बरौनी-सेकेंड में स्थित बायोगैस संयंत्र पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित है। यह संयंत्र प्रतिदिन लगभग 2 मीट्रिक टन गोबर का प्रसंस्करण कर स्वच्छ ईंधन और जैविक खाद दोनों का उत्पादन कर रहा है।
  2. नालंदा और भोजपुर: इन जिलों में गोबरधन इकाइयों को कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालयों से जोड़ा गया है। इससे इन विद्यालयों की रसोई अब पूरी तरह ‘धुआं मुक्त’ हो गई है, जिससे छात्राओं और रसोइयों को एक स्वच्छ वातावरण मिल रहा है।
  3. गोपालगंज: यहाँ के जवाहर नवोदय विद्यालय में बायोगैस का उपयोग बड़े पैमाने पर भोजन बनाने के लिए किया जा रहा है, जिससे स्कूल के ईंधन खर्च में भारी कटौती हुई है।

स्वच्छता और स्वास्थ्य का ‘डबल इंजन’

​लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत लागू यह योजना गांवों की गलियों को साफ रखने में भी मददगार साबित हो रही है। पहले जिस गोबर को सड़कों या नालियों के किनारे फेंक दिया जाता था, जिससे बीमारियां फैलती थीं, अब उसे लोग जमा कर संयंत्र तक पहुँचा रहे हैं। इससे गांवों में स्वच्छता बढ़ी है और मच्छर जनित बीमारियों के जोखिम में कमी आई है। यह एक ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ का बेहतरीन मॉडल है, जहाँ कचरा ही संसाधन बनकर वापस समाज को लाभ पहुँचा रहा है।

ग्रामीण विकास मंत्री का विजन: पर्यावरण और आजीविका का संगम

​ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे बिहार के ग्रामीण विकास में मील का पत्थर बताया है। उन्होंने कहा कि गोबरधन योजना केवल ऊर्जा संकट का समाधान नहीं है, बल्कि यह स्वच्छ पर्यावरण और ग्रामीण आजीविका सुधारने की एक दूरदर्शी सोच है। प्रचुर मात्रा में उपलब्ध गोबर और कृषि अपशिष्ट को बायोगैस एवं जैविक खाद में परिवर्तित कर हम ऊर्जा की जरूरतों और पर्यावरणीय चुनौतियों, दोनों का एक साथ समाधान कर रहे हैं। उनके अनुसार, विभाग का लक्ष्य आने वाले समय में पशुधन समृद्ध हर गांव में ऐसी इकाइयों का विस्तार करना है।

बिहार के गांवों की नई पहचान

​बिहार में गोबरधन योजना ने यह साबित कर दिया है कि तकनीक और स्थानीय संसाधनों का सही मेल किसी भी व्यवस्था को बदल सकता है। पाइपलाइन से आती गैस की लौ केवल भोजन नहीं पका रही, बल्कि यह बिहार के गांवों में बढ़ते आत्मविश्वास और आधुनिकता की लौ है। 23 संचालित इकाइयों से शुरू हुआ यह सफर अब 15 और इकाइयों के जुड़ने के साथ और भी व्यापक होगा।

​जैसे-जैसे यह योजना विस्तार लेगी, बिहार के गांव न केवल ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेंगे, बल्कि जैविक खेती के माध्यम से स्वस्थ समाज के निर्माण में भी अग्रणी भूमिका निभाएंगे। गोबर को ‘गोवर्धन’ में बदलने की यह यात्रा वास्तव में सुशासन और विकास के उस संकल्प का परिणाम है, जो गांवों को शहरों के समकक्ष खड़ा करने का सपना देखती है।

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