मुजफ्फरपुर में ‘कुरुक्षेत्र’ सी त्रासदी: भाइयों के अहंकार की वेदी पर चढ़ा मूकबधिर भाई, जवान बेटे का शव देख मां ने भी तोड़ा दम; एक साथ उठी दो अर्थियां, रो पड़ा पूरा गांव

मुख्य बिंदु:

  • हृदयविदारक घटना: बोचहां थाना क्षेत्र की करणपुर दक्षिणी पंचायत में दो भाइयों के झगड़े ने ली पूरे परिवार की खुशियां।
  • दोहरी मौत: धक्का लगने से मूकबधिर भाई रामबाबू सहनी की मौत, सदमे में मां पुकारी देवी का भी प्राणांत।
  • विवाद की जड़: बीमार मां की देखभाल और ‘मरणासन्न’ समझकर अगरबत्ती दिखाने को लेकर हुआ था भाइयों में विवाद।
  • अंतिम विदाई: गांव वालों की मौजूदगी में मां-बेटे का एक साथ हुआ अंतिम संस्कार; भाइयों ने भरा सुलह का बॉन्ड।
  • इंसानी संवेदना: मूकबधिर भाई, जो बोल नहीं सकता था, वह अपनी संवेदनाओं से भाइयों को बचाने की कोशिश में खुद कुर्बान हो गया।

मुजफ्फरपुर। रिश्तों की डोर जब अहंकार और गुस्से की कैंची से कटती है, तो उसका परिणाम कितना भयावह हो सकता है, इसकी एक रूह कंपा देने वाली मिसाल मुजफ्फरपुर जिले के बोचहां में देखने को मिली है। शनिवार, 11 अप्रैल 2026 की सुबह जब सूरज की पहली किरण करणपुर दक्षिणी पंचायत के वार्ड 6 में पड़ रही थी, तो किसी ने नहीं सोचा था कि एक ही आंगन से दो अर्थियां एक साथ निकलेंगी। दो भाइयों के बीच मामूली बात पर शुरू हुई तकरार ने न केवल उनके सबसे छोटे और मूकबधिर भाई की जान ले ली, बल्कि ममता के उस आंचल को भी हमेशा के लिए खामोश कर दिया जिसने उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया था। यह कहानी केवल एक अपराध की नहीं है, बल्कि यह रिश्तों के बिखरने, संवेदनाओं के मरने और एक बेजुबान की उस मूक पुकार की है जो अपनों के बीच बीच-बचाव करते हुए खुद मौत की आगोश में सो गया।

बीमार मां और भाइयों का विखंडित प्रेम: कलह की पृष्ठभूमि

​करणपुर दक्षिणी पंचायत निवासी पुकारी देवी (65 वर्ष) पिछले कुछ समय से गंभीर रूप से बीमार थीं। उनके चार बेटे थे, जिनमें रामबाबू सहनी (35 वर्ष) सबसे छोटा था। रामबाबू जन्म से ही मूकबधिर था, लेकिन अपनी मां के प्रति उसका समर्पण किसी भी सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक था। वह बोल नहीं सकता था, सुन नहीं सकता था, लेकिन अपनी मां की हर तकलीफ को वह उनकी आंखों से पढ़ लेता था। घर पर मनोज और रामबाबू ही रहते थे, जबकि दो अन्य भाई दिल्ली में मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते थे।

​जब पुकारी देवी की तबीयत ज्यादा बिगड़ी, तो दिल्ली से भाई चंद्रमणि घर लौटा ताकि मां की सेवा कर सके। घर में अपनों का जमावड़ा था, लेकिन मन मिले हुए नहीं थे। गुरुवार की रात एक अजीबोगरीब वाकया हुआ जो इस त्रासदी की नींव बना। मनोज को लगा कि मां की स्थिति बहुत नाजुक है और वे अंतिम सांसें ले रही हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वह मां के पास अगरबत्ती दिखाने पहुँचा। चंद्रमणि को यह बात नागवार गुजरी; उसे लगा कि मनोज मां को जीवित रहते ही ‘मृत’ मान रहा है। इसी बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी शुरू हो गई, जो रात भर सुलगती रही।

मूकबधिर भाई का ‘मूक’ बलिदान: शुक्रवार की वह खूनी सुबह

​शुक्रवार की सुबह होते-होते भाइयों के बीच की कड़वाहट हिंसा में तब्दील हो गई। मनोज और चंद्रमणि के बीच मारपीट शुरू हो गई। घर के भीतर चीख-पुकार मच गई। मूकबधिर रामबाबू, जो केवल अपनी आंखों से इस नफरत को देख रहा था, वह तड़प उठा। वह अपने भाइयों को लड़ते हुए नहीं देख सकता था। वह भागते हुए उनके पास पहुँचा और अपनी मूक भाषा में, हाथों के इशारों से उन्हें रोकने की कोशिश करने लगा। वह दोनों के बीच ढाल बनकर खड़ा हो गया ताकि एक भाई का प्रहार दूसरे को न लगे।

​इसी धक्का-मुक्की के दौरान, गुस्से में पागल भाइयों का एक जोरदार धक्का रामबाबू को लगा। रामबाबू असंतुलित होकर जमीन पर गिरा और उसका सिर किसी सख्त चीज से टकरा गया। वह निढाल होकर गिर पड़ा। मूकबधिर भाई, जो कभी किसी से शिकायत नहीं कर सकता था, वह उस सुबह भी बिना कुछ बोले अचेत हो गया। आनन-फानन में ग्रामीण और परिजन उसे बोचहां अस्पताल ले जाने के लिए दौड़े, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। अस्पताल पहुँचने से पहले ही रास्ते में रामबाबू की धड़कनें थम गईं।

मां की ममता का करुण अंत: जब बेटे का शव देख फट गया कलेजा

​जब रामबाबू का बेजान शरीर वापस घर पहुँचा, तो पूरे गांव में मातम छा गया। लेकिन असली त्रासदी तो अभी बाकी थी। बीमार बिस्तर पर पड़ी पुकारी देवी, जो पहले से ही जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थीं, जैसे ही उन्होंने अपने सबसे छोटे और लाडले बेटे का शव देखा, उनकी रही-सही हिम्मत भी जवाब दे गई। रामबाबू वही बेटा था जो उनकी परछाई बनकर रहता था।

​जवान बेटे की लाश सामने देख मां का कलेजा फट गया। वह सदमे में चली गईं। ग्रामीणों के अनुसार, रामबाबू के घर पहुँचने के कुछ ही देर बाद पुकारी देवी ने भी लंबी सांस ली और हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं। एक ही पल में उस घर से दो रक्षक चले गए—एक वह जो बेजुबान होकर भी सबकी रक्षा करता था, और दूसरी वह जिसने इस परिवार को जन्म दिया था। घर के आंगन में अब दो लाशें थीं और उन दो लाशों के बीच खड़े थे वे दो भाई, जिनके गुस्से ने यह सब तबाह कर दिया था।

गांव की पंचायत और प्रायश्चित की राह: बॉन्ड पर सुलह

​इस दोहरे हत्याकांड के बाद गांव में भारी तनाव व्याप्त हो गया। पुलिस को सूचना दी गई, लेकिन ग्रामीणों का मानना था कि कानून की सजा से ज्यादा जरूरी इन भाइयों को उनके कृत्य का अहसास कराना है। मुखिया प्रतिनिधि सरोज सहनी, जदयू प्रखंड अध्यक्ष रामइकबाल सिंह और ग्रामीण अभिमन्यु मौर्य विक्रम सहित कई प्रबुद्ध लोग मौके पर पहुँचे।

​पंचायत बैठी और दोनों भाइयों, मनोज और चंद्रमणि को उनकी गलती का अहसास कराया गया। वे दोनों अपने भाई और मां की लाश के पास बैठकर फूट-फूटकर रो रहे थे। समाज के दबाव और अपने पश्चाताप के बीच दोनों भाइयों से एक ‘बॉन्ड’ भरवाया गया कि वे भविष्य में कभी एक-दूसरे से विवाद नहीं करेंगे और शांति से रहेंगे। यह एक प्रतीकात्मक सजा थी, लेकिन इसका उद्देश्य उस नफरत को खत्म करना था जिसने दो जिंदगियां लील लीं। इसके बाद गांव वालों ने मिलकर मां और बेटे की अर्थी तैयार की।

एक साथ उठीं दो अर्थियां: सिसक पड़ा बोचहां

​करणपुर दक्षिणी पंचायत के इतिहास में यह सबसे दुखद दिन था। एक ही चिता की आग में मां और बेटे का अंतिम संस्कार किया गया। रामबाबू और पुकारी देवी की एक साथ उठती अर्थियों को देखकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। रामबाबू का वह मूक चेहरा सबको याद आ रहा था, जो बिना कुछ कहे सबकी मदद के लिए तैयार रहता था। गांव के लोगों का कहना था कि रामबाबू भले ही बोल नहीं सकता था, लेकिन वह पूरे परिवार की धड़कन था।

​जब श्मशान घाट पर दोनों के शवों को मुखाग्नि दी गई, तो पीछे खड़े दोनों भाई सिर झुकाए अपनी बर्बादी का मंजर देख रहे थे। जिस मां की सेवा के लिए चंद्रमणि दिल्ली से आया था, उसी मां को उसने अपने झगड़े के कारण खो दिया। और जिस रामबाबू ने हमेशा उनका साथ दिया, उसे उन्होंने अपने हाथों से मौत की नींद सुला दिया।

सुशासन और सामाजिक चेतना का सवाल

​बोचहां की यह घटना हमारे समाज की उस कड़वी हकीकत को दर्शाती है जहाँ छोटे-छोटे विवाद और अहंकार बड़े-बड़े परिवारों को उजाड़ देते हैं। मुजफ्फरपुर पुलिस इस मामले की कानूनी जांच तो करेगी, लेकिन जो सामाजिक क्षति हुई है, उसकी भरपाई नामुमकिन है। यह घटना हमें सिखाती है कि संवाद और संयम ही रिश्तों को बचा सकते हैं।

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