
बीजिंग/नई दिल्ली: वैश्विक तेल बाजार में जारी उथल-पुथल के बीच चीन ने एक बार फिर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी है। खास बात यह है कि महज 15 दिनों के भीतर यह दूसरी बार है जब ईंधन दरों में इजाफा किया गया है। इस फैसले के पीछे अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सप्लाई चेन में बाधाओं को मुख्य कारण माना जा रहा है।
NDRC का फैसला, बुधवार से लागू नई दरें
चीन की शीर्ष आर्थिक नियामक संस्था नेशनल डेवलपमेंट एंड रिफॉर्म कमीशन (NDRC) ने घोषणा की है कि पेट्रोल और डीजल की नई कीमतें तत्काल प्रभाव से लागू होंगी। आयोग के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव के कारण घरेलू कीमतों में संशोधन जरूरी हो गया था।
कितनी बढ़ीं कीमतें?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पेट्रोल की कीमत में लगभग 420 युआन प्रति टन और डीजल में करीब 400 युआन प्रति टन की वृद्धि की गई है। इससे पहले भी मार्च के अंत में ईंधन दरों में बढ़ोतरी की गई थी, जिससे आम उपभोक्ताओं और उद्योगों पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
तेल कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के निर्देश
सरकार ने देश की प्रमुख तेल कंपनियों – चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन, चाइना पेट्रोकेमिकल कॉर्पोरेशन और चाइना नेशनल ऑफशोर ऑयल कॉर्पोरेशन – को उत्पादन बनाए रखने और सप्लाई चेन को सुचारू रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही बाजार में किसी भी तरह की कालाबाजारी या मूल्य हेरफेर पर सख्त निगरानी के आदेश भी जारी किए गए हैं।
होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ती निर्भरता चिंता का कारण
रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन अपनी तेल जरूरतों का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, जिसमें से करीब 45 प्रतिशत सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव या बाधा चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा असर डाल सकती है।
वैश्विक असर की आशंका
चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है, इसलिए वहां ईंधन कीमतों में बदलाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ती कीमतें वैश्विक महंगाई को और बढ़ा सकती हैं, खासकर उन देशों में जो पहले से ही ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय: चीन पर असर सीमित
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि चीन के पास वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत और रूस जैसे देशों के साथ दीर्घकालिक गैस समझौते हैं, जिससे उसे अन्य देशों की तुलना में कम झटका लग सकता है। फिर भी, लंबे समय तक कीमतों में तेजी बनी रही तो इसका असर उद्योग और आम लोगों पर पड़ना तय है।


